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Runa Khan: कौन हैं मैग्सेसे अवॉर्ड पाने वाली रूना खान, बना दिया चलता फ‍िरता स्‍कूल और अस्‍पताल

Runa Khan Ramon Magsaysay Award 2026: बांग्लादेश के दूर-दराज इलाकों में जहां पहुंचना भी आसान नहीं था वहां नाव को अस्पताल बनाया गया और स्कूलों को भी ऐसा बनाया गया जिन्हें बाढ़ या नदी का कटाव आने पर कुछ ही घंटों में दूसरी जगह ले जाया जा सके. जलवायु परिवर्तन से प्रभावित और गरीब लोगों तक स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी जरूरी सुविधाएं पहुंचाने का यह काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता रूना खान को अब एशिया के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में शामिल रैमोन मैग्सेसे अवॉर्ड 2026 से सम्मानित किया गया है.

उन्हें यह सम्मान बांग्लादेश के दूरदराज, नदी के कटाव से प्रभावित और जलवायु संकट से जूझ रहे लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने में दशकों तक किए गए काम के लिए दिया गया है.रूना खान बांग्लादेश की सामाजिक, मानवतावादी और लेखिका हैं.वह Friendship नाम की सामाजिक संस्था की संस्थापक और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं. 2002 में शुरू हुई यह संस्था आज स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु, रोजगार, आपदा प्रबंधन, नागरिक अधिकार और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे कई क्षेत्रों में काम कर रही है.

कौन हैं रूना खान?

रूना खान का जन्म 7 नवंबर 1958 को ढाका में हुआ था.उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे बांग्लादेश के पुराने और संपन्न परिवारों में गिना जाता था.उनके परिवार का संबंध बंगाल के जमींदार परिवारों से बताया जाता है. बचपन में उनका माहौल भी काफी अलग था. उनके पिता के घर में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से विचारक, कलाकार, धार्मिक और आध्यात्मिक लोग तथा राजनयिक आते-जाते थे.इस माहौल ने बचपन से ही रूना खान को अलग-अलग विचारों और समाज को समझने का मौका दिया हालांकि उनका बचपन सुविधाओं के बीच बीता, लेकिन आगे चलकर उन्होंने अपना काम समाज के उन लोगों के बीच चुना जिनके पास बुनियादी सुविधाएं भी आसानी से नहीं पहुंच पाती थीं.

कहां से पढ़ाई की रूना खान ने?

रूना खान की पढ़ाई एक ही जगह नहीं हुई. उन्होंने शुरुआती शिक्षा तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में फॉर्मव्‍यू इंटरनेशनल स्‍कूल (Farmview International School)से ली और बाद में पाकिस्तान के मरी स्थित सेंट डेंस हाई स्‍कूल (St. Denys High School)में पढ़ाई की. इसके बाद वह उच्च शिक्षा के लिए भारत आईं.उन्होंने कोलकाता के लेडी ब्राबौन कॉलेज (Lady Brabourne College)से भूगोल में ऑनर्स के साथ बैचलर डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने ढाका के इडेन मोहिला कॉलेज (Eden Mohila College)से ह्यूमैनिटीज में दूसरी बैचलर डिग्री पूरी की. वर्ष 2013 में उन्होंने हॉवर्ड बिजनेस स्‍कूल के स्‍ट्रैटजिक प्रॉस्‍पैक्‍टिव्‍स इन नॉन प्रोफ‍िट मैनेजमेंट (Strategic Perspectives in Nonprofit Management)कार्यक्रम में हिस्सा लिया. इसके बाद 2018 में उन्होंने हॉवर्ड केंडी स्‍कूल (Harvard Kennedy School)का लीडरशिप फॉर सिस्‍टम चेंज कार्यक्रम पूरा किया.इस तरह उन्‍होंने भूगोल और ह्यूमैनिटीज की दो बैचलर डिग्रियां की हैं. जबकि बाद में उन्होंने दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों से लीडरशिप और संस्थाओं के प्रबंधन से जुड़े कार्यक्रम भी किए.

पढ़ाई के बाद क्या किया, कैसे शुरू हुआ सफर?

रूना खान का करियर सीधे किसी बड़े एनजीओ से शुरू नहीं हुआ था. उन्होंने पहले शिक्षक के तौर पर काम किया.1979 में चटगांव में किंडरगार्टन बच्चों को पढ़ाने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को सिर्फ चीजें याद कराने पर ज्यादा जोर था जबकि उन्हें समझने और सवाल पूछने के मौके कम मिलते थे. इस अनुभव ने उनके भीतर शिक्षा के क्षेत्र में कुछ अलग करने की इच्छा पैदा की.बाद में उन्होंने बच्चों के लिए किताबें और शैक्षणिक सामग्री लिखने का काम किया. वह लेखन और शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहीं. उन्होंने बच्चों के लिए कहानी की किताबें लिखीं और शिक्षकों तथा बच्चों के लिए कई शैक्षणिक संसाधन तैयार किए.इसके अलावा उन्होंने महिलाओं और कारीगरों के लिए भी काम किया. 1988 में उन्होंने स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों को काम देने के उद्देश्य से एक बुटीक शुरू किया. बाद में वह अपने परिवार के प्रिंटिंग और पब्लिशिंग कारोबार से भी जुड़ीं और इडेन प्रेस के प्रबंधन और प्रशासन की जिम्मेदारी संभाली.

वह घटना जिसने रूना खान की जिंदगी बदल दी

रूना खान के जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने बांग्लादेश के नदी वाले इलाकों में रहने वाले लोगों की स्थिति को करीब से देखा.1997 में ब्रह्मपुत्र नदी के एक चार इलाके की यात्रा ने उन्हें काफी प्रभावित किया.बांग्लादेश में ‘चार’ उन रेत वाले नदी द्वीपों या उभरती जमीनों को कहा जाता है जो नदियों के बहाव और कटाव के साथ लगातार बदलते रहते हैं. यहां रहने वाले लोगों के लिए अस्पताल, स्कूल और दूसरी जरूरी सेवाओं तक पहुंचना बेहद मुश्किल होता है.रूना खान ने महसूस किया कि अगर लोग अस्पताल तक नहीं पहुंच सकते तो अस्पताल को ही उनके पास ले जाना होगा. इसी सोच ने आगे चलकर उनके सबसे बड़े सामाजिक प्रयोग की नींव रखी.

2002 में बनाई फ्रेंडशिप, नाव पर बना दिया अस्पताल

रूना खान ने 2002 में फ्रेंडशिप की स्थापना की. संस्था ने शुरुआत में बांग्लादेश की नदी के बीच बसे और बेहद पिछड़े इलाकों के लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए फ्लोटिंग हॉस्पिटल यानी नाव पर अस्पताल का मॉडल शुरू किया.यह मॉडल इसलिए खास था क्योंकि नदी से कटे इलाकों में रहने वाले लोगों को अस्पताल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी.फ्रेंडशिप ने इसके उलट स्वास्थ्य सेवाओं को नाव के जरिए उनके दरवाजे तक पहुंचाने की कोशिश की.धीरे-धीरे यह पहल केवल स्वास्थ्य सेवा तक सीमित नहीं रही. संस्था ने शिक्षा, रोजगार, जलवायु , आपदा राहत, नागरिक अधिकार और सामाजिक विकास को भी अपने काम का हिस्सा बना लिया.

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