Sushant Sinha Desh Ki Pathshala: उद्धव-ममता के बाद राहुल गांधी, केजरीवाल की बारी, मोदी से भिड़ते इंडी का फुल पैकअप हो जाएगा?

ममता बनर्जी की पार्टी का जो हाल हुआ है, उससे इंडी वाले तिलमिला रहे हैं. ममता बनर्जी की पार्टी का नाम, सिंबल सब चला गया. नंदीग्राम उपचुनाव का कैंडिडेट भी फुर्र हो गया. ममता बनर्जी ऐसे में कहीं की ना रही. उनकी राजनीति का फुलपैकअप दिख रहा है. ममता बनर्जी का वैसा ही हाल दिख रहा है जैसा उद्धव ठाकरे का हुआ था. इंडी में ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे ये वो नेता थे जो आए दिन कहते रहते थे कि नरेंद्र मोदी को आज कुर्सी से गिरा देंगे, कल कुर्सी से हटा देंगे, लेकिन आज की डेट में इनकी खुद की राजनीति निपट गई है. इसी तरह की बातें राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल भी करते हैं. सवाल है कि क्या अब राहुल और केजरीवाल का नंबर है, क्योंकि आप देखिए कि एक तरफ यूपी चुनाव आने वाले हैं जहां सबसे बड़ा टेस्ट है और दूसरी तरफ पंजाब का चुनाव है जहां केजरीवाल का टेस्ट है.
जून 2026 में पश्चिम बंगाल से दिल्ली तक एक खबर ने विपक्ष की सियासत का गणित हिला दिया. तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग रुख अपनाया और NDA को समर्थन देने की बात कही. शुरुआत में इन सांसदों की तरफ से लोकसभा स्पीकर को अपने नए राजनीतिक रुख की जानकारी देने की बात सामने आई थी. यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि कौन किसके साथ जा रहा है, लेकिन बंगाल में उपचनाव से पहले पूरी कहानी ही पलट गई है.
ममता के पास कितनी ताकत बचेगी?
अब तो सवाल उठ रहे हैं कि TMC का नाम और निशान बचेगा भी या नहीं? और क्या जिस तरह बंगाल में पार्टी हारी उसी तरह TMC अपना अस्तित्व भी खो देगी? बंगाल चुनाव से पहले जो ममता बनर्जी केंद्र से बीजेपी को उखाड़ फेंकने की बात कर रही थी अब सवाल है कि ममता के पास दिल्ली में अपनी आवाज कितनी बचेगी?
लोकसभा में सांसदों की संख्या किसी भी क्षेत्रीय दल की राष्ट्रीय ताकत का एक अहम हिस्सा होती है, लेकिन यहां कहानी में एक और मोड़ है. ये 20 बागी सांसद बाद में Nationalist Citizens Party of India यानी NCPI में चले गए और अब सितंबर में इन्हीं में से कुछ सांसदों के बीजेपी में जाने की अटकलें भी सामने आ गई है. और अब सबसे बड़ा टिवस्ट ये है कि क्या दूर्जा पूजा के बाद ममता की पार्टी का ही विसर्जन हो जाएगा? ऐसे विसर्जन सही शब्द नहीं है, लेकिन बंगाल में बीजेपी को लेकर जो खबर आ रही है, वो ममता की पार्टी को एक और बड़ा झटका दे सकता है.
पीएम मोदी का दुर्गा पूजा प्रोग्राम
पश्चिम बंगाल में बीजेपी के सत्ता हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जून में दो दिन के दौरे पर गए थे. और सूत्रों की मानें तो पीएम मोदी दूर्गा पूजा में बंगाल फिर जा रहे हैं. दावा है कि उनके कार्यक्रम के लिए ईडन गार्डन में बुकिंग भी हुई है और इस कार्यक्रम में TMC के बागी 20 सासंद भी शिकरत करेंगे और ऐसी संभावना जताई जा रही है कि इसी कार्यक्रम में TMC के बागियों को लेकर बड़ा टिवस्ट सामने आ सकता है.
यानी ममता बनर्जी की पार्टी में टूट की कहानी अभी किसी एक मंजिल पर जाकर रुकी नहीं है, लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि बंगाल में ममता की पूरी सियासत खत्म हो गई. वो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रही हैं. विपक्ष की दिल्ली की राजनीति की स्पॉट लाइट रहीं. उधर TMC में बंटवारे का मामला पहुंचने के बाद ममता बनर्जी गुट सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. विवाद के केंद्र में TMC का नाम और उसका चुनाव चिह्न है. चुनाव आयोग ने 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों से पहले इन पर रोक लगा दी है.
ममता बनर्जी गुट ने सुप्रीम कोर्ट में नाम और निशान बचाने के लिए दो याचिका दायर की है. पहली याचिका में चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें उनके गुट को AITMC नाम और असली चुनाव चिन्ह देने से इनकार किया गया. दूसरी याचिका में पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर और 10 बागी विधायकों को अयोग्य ठहरने की याचिकाओं पर फैसला लेने में हो रही देरी से जुड़ी है.
ममता के उम्मीदवार के भागने से क्यों टेंशन में केजरीवाल?
इसलिए असली सवाल है कि क्या बंगाल से TMC की विदाई के साथ उसकी राष्ट्रीय ताकत भी कमजोर हो गई है? और अगर हुई तो क्या ये विपक्ष के बिखरने के सबसे बड़ी पहली तस्वीर है? क्योंकि DMK की कनिमोझी एक के बाद एक क्षेत्रीय नेताओं से मुलाकात कर रही हैं. पहले उद्धव ठाकरे… फिर शरद पवार और सुप्रिया सुले और फिर ममता बनर्जी से मुलाकात. इन मुलाकातों के बाद कांग्रेस के बिना एक नए क्षेत्रीय मोर्चे की चर्चा तेज हो गई है. लेकिन बंगाल से शुरू हुई टूट की कहानी मुंबई, दिल्ली होते हुई चेन्नई तक पहुंच गई है. यानी विपक्ष के सामने सवाल सिर्फ ये नहीं है कि कितने सांसद बचे हैं? सवाल ये भी है जो बचे हैं, वो किसके साथ खड़े होंगे? क्योंकि दिल्ली की राजनीति में संख्या जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरी है उस संख्या को एक साथ रखने की भी है… क्योंकि इधर TMC बिखर रही है तो उधर महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी पहले ही टूट चुकी है.
इधर ममता बनर्जी की पार्टी का सिंबल फ्रिज हुआ. बंगाल में हो रहे उपचुनाव में उनके उम्मीदवार भागने लगे. उधर राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल फूफा बन गए . ममता दीदी की पार्टी में विद्रोह उनके साथियों ने की. टीएमसी पर दावा ममता से अलग हुए गुट ने किया. और राहुल-केजरीवाल आरोप चुनाव आयोग से लेकर बीजेपी तक पर लगा रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि ममता की पार्टी टूटी तो राहुल क्यों परेशान हैं? ममता के उम्मीदवार के भागने से केजरीवाल क्यों टेंशन में हैं?
तो इसका जवाब है साल 2027 में होने वाले देश के दो बड़े राज्यों के विधानसभा चुनाव. 2027 में देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव है, तो दूसरी ओर पंजाब में जहां फिलहाल केजरीवाल के आम आदमी पार्टी की सरकार है. राहुल के सामने यूपी में कांग्रेस को पिछले चुनाव से बेहतर कराने की चुनौती है तो केजरीवाल को पंजाब में सरकार की चिंता. यही नहीं आज जैसे ममता बनर्जी की पार्टी टूटी है. ऐसी टूट कांग्रेस में सालों से होती रही है. ममता ने भी कांग्रेस से ही अलग होकर टीएमसी बनाई थी . ऐसा ही केजरीवाल के साथ भी होता रहा है. केजरीवाल के साथ वाले भी समय-समय पर उनका साथ छोड़कर जाते रहे हैं.
राहुल गांधी की अजीब हरकतें
ऐसे में अब एक सवाल जो आज देश की राजनीति में सबसे ज़्यादा चर्चा में है. वो ये है कि क्या अब विपक्ष के इन दो सबसे बड़े चेहरों की बारी है? क्योंकि एक तरफ राहुल गांधी जो पूरे देश में बीजेपी के खिलाफ सबसे मुखर आवाज़ बने हुए हैं. और विपक्ष की आवाज बनने के चक्कर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी अजीब-अजीब हरकत कर रहे हैं. राहुल गांधी का इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम था. बीजेपी ने छात्रों की गूंज के मंच पर PM मोदी और उनकी मां के अपमान का आरोप लगाया है.
यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘कांग्रेस के युवराज ने भी कल अपने झूठ की गूंज में जिस प्रकार का आचरण किया, पूरी नारी शक्ति का वह अपमान है. जो भारत और भारतीयता का अपमान करना अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लेते हैं. उनसे ये अपेक्षा करना की वो वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव को समझ सकें या यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः के भाव को समझ सकें. मुझे लगता है कि देश को उनसे उम्मीद करना ही छोड़ देना चाहिए.’
वहीं बीजेपी ने दावा किया है कि राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम में पीएम मोदी का मजाक उड़ाया गया. इतना ही नहीं बीजेपी नेताओं ने दावा किया है कि कार्यक्रम में बिना वजह पीएम मोदी का स्वर्गीय मां को भी खींचा गया, जो बेहद निंदनीय है.
दरअसल राहुल के कार्यक्रम में स्टैंडअप कॉमेडियन पुलकित मणि ने नकल करने के चक्कर में अजीब-अजीब हरकत की और राहुल गांधी भी उनके साथ हंसते नजर आए. बीजेपी का कहना है कि मां राजनीति का विषय नहीं होती, अमर्यादित बात पर हंसना इनका संस्कार दिखाता है.
उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कहा, ‘देशवासियों को इससे बहुत ख़राब लगा है और जिस प्रकार से एक बूढ़ी मां को लेकर प्रधानमंत्री जी का मजाक बनाना और हमारी बुजुर्ग माताओं का बहनों का, मातृ शक्ति के प्रति उनके मन में किस प्रकार की सोच है. ये राहुल गांधी की भी कांग्रेस की भी ये दर्शाती है.’
मतलब एक तरफ खुद को विपक्ष का चेहरा बनाने के चक्कर में परेशान राहुल गांधी अजीबोगरीब हरकत कर रहे हैं. तो दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल जिनकी राजनीति दिल्ली से निकलकर पंजाब तक सिमट गई है. अब दोनों के सामने चुनावी मैदान है और दोनों को पता है कि मैदान में सिर्फ भाषण नहीं, नतीजे मायने रखते हैं. और स्ट्राइक रेट बताता है कि हाल में हुए चुनावो में मोदी के सामने कोई टीक नहीं पा रहा.
अगर सिर्फ दो साल यानी 2025-26 की बात करें तो 2025 से 2026 में दिल्ली, बिहार, असम, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जीत हुई और इन जीत के साथ देश में एनडीए की दो केन्द्र शासित प्रदेश सहित 22 राज्यों में सरकारें बन गई है. मोदी की आंधी में 10 साल पुरानी दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार पत्तों की तरह उड़ गई तो पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने 15 साल पुराने ममता बनर्जी के अभेद्य माने जा रहे किले को ढहा दिया. अब 2027 में यूपी में राहुल और पंजाब में केजरीवाल का लिटमस टेस्ट है.
2027 में UP में राहुल पास होंगे या फेल?
खासकर यूपी में राहुल गांधी का सबसे बड़ा इम्तिहान है. राहुल गांधी लगातार बीजेपी पर हमला बोल रहे हैं. संविधान, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय और स्टूडेंट्स के मुद्दे उनकी राजनीति के केंद्र में हैं.लेकिन उत्तर प्रदेश में सवाल सिर्फ मुद्दों का नहीं, संगठन और भीड़ को वोट में बदलने की क्षमता का भी है. यूपी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए अहम इसलिए है क्योंकि पिछले कई चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा है.
सिर्फ 2022 की बात करें तो 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी 399 सीटों पर चुनाव लड़ी थी लेकिन सिर्फ 2 सीटों पर जीत पाई. कांग्रेस को पूरे प्रदेश में 21,51,234 वोट मिले थे जो कुल वोट प्रतिशत का महज 2.33% था.
कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता यूपी होकर जाता है. कांग्रेस 2029 में राहुल को विपक्ष का चेहरा बनाने की मुहिम में लगी हुई है. दूसरी ओर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस की हालत पतली है. विधानसभा चुनावों में कांग्रेस अमेठी और रायबरेली जैसे अपने पुराने गढ़ की सीटें भी हारती है. ऐसे में अगर कांग्रेस को 2022 जैसे रिजल्ट नहीं चाहिए तो समाजवादी पार्टी की बैसाखी का सहारा लेने के सिवा उनके पास कोई दूसरा चारा नहीं है. लेकिन यहां भी राहुल की पार्टी का रास्ता आसान नहीं दिखता.
यूपी चुनाव के सिर्फ 5 महीने बचे हैं. जैसे जैसे टाइम करीब आ रहा है, वैसे वैसे हलचल बढ़ती जा रही है. अखिलेश यादव नए नए प्लान लेकर आ रहे हैं. अखिलेश यादव अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगे हैं. दूसरी ओर कांग्रेस जमीन पर बहुत ज्यादा नहीं दिखती. वहीं राहुल गांधी अलग अलग राज्यों में घूमकर छात्रों के साथ गूंज संवाद करने में लगे हैं. ऐसे में अखिलेश…कांग्रेस के चक्कर में अपना नुकसान शायद ही कराना चाहेंगे.
केजरीवाल के हाथ से दिल्ली गई, पंजाब भी जाएगा?
ममता बनर्जी की पार्टी में टूट…पार्टी का नाम और सिंबल छीनने से देश की राजनीति का एक और नेता ज्यादा टेंशन में हैं. और वो है अरविंद केजरीवाल. और इसकी दो वजहें हैं. एक केजरीवाल के सामने पंजाब की चुनौती. और दूसरी इस बात का डर कि कहीं उनका भी ममता जैसा हाल ना हो जाए?
दरअसल 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को करारी शिकस्त मिली. 10 साल तक सत्ता में रहने वाली आप को 2025 के चुनाव में महज 22 सीटें मिलीं. केजरीवाल और उनकी पार्टी अभी इस हार से उबर भी नहीं पाए थे कि पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने बग़ावत कर दी. और पार्टी छोड़कर चले गए. अब केजरीवाल के सामने 2027 में पंजाब में सरकार बचाने की चुनौती है.
दरअसल अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने पंजाब में सरकार बनाई. अब अगला विधानसभा चुनाव उनके शासन के कामकाज की परीक्षा माना जाएगा. आम आदमी पार्टी की सरकार कानून-व्यवस्था, नशे के खिलाफ अभियान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अपनी उपलब्धियां गिनाती है. लेकिन विपक्ष रोजगार, किसानों, वित्तीय स्थिति और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाता रहा है. खासकर बीजेपी ने पंजाब की भागवंत मान सरकार के लिए खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.
पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू अपने काफिले पर हुए हमले के एक दिन बाद शनिवार को लुधियाना में मुख्यमंत्री भगवंत मान का विरोध करने के लिए पहुंचे. रवनीत सिंह बिट्टू ने हाथ में टमाटर और अंडे लेकर विरोध जताया.
बिट्टू ने कहा, ‘अगर हिम्मत थी तो खुद आते, ये सारे अंडे जो गाड़ियों पर मारे थे. अरे सेहतमंद और मज़बूत लोगों को भेजते जो भाग सकते. जब पकड़ लिए तो आज मुख्यमंत्री बचके निकलता. साथ में शराब भी दे दी कि रात में पीकर सो जाते. तुम ने सारा पंजाब को नशे में ढकेल दिया और अंडे मरवा रहे हो. क्योंकि तुम नशे के व्यपारी के साथ मिले हुए हो.’
मतलब पंजाब में मुकाबला सिर्फ राजनीतिक नहीं, सरकार के रिपोर्ट कार्ड पर भी होगा. और भागवंत मान सरकार पर विपक्ष गंभीर आरोप लगाता रहा है. अब देखना होगा कि केजरीवाल की हालत ममता और उद्धव जैसी हो जाती है या उनका कद एक बार फिर बढ़ जाता है. गौर करने वाली बात ये भी है INDI गठबंधन में कई दल हैं, लेकिन हर राज्य की राजनीति अलग है. और ये आपस में लड़ते रहते हैं. यूपी में समाजवादी पार्टी प्रमुख खिलाड़ी है जबकि कांग्रेस अपनी भूमिका बढ़ाना चाहती है. उसी तरह पंजाब में कांग्रेस और AAP सीधे प्रतिद्वंद्वी हैं. यानी राष्ट्रीय स्तर पर साथ दिखने का दिखावा करने वाले दल कई राज्यों में आमने-सामने भी हैं. सवाल है कि क्या बंटा हुआ विपक्ष मोदी का मुकाबला नहीं कर पाता तो आरोप लगाने लगता है.



