Sushant Sinha Desh Ki Pathshala: यूपी में ओवैसी की नई चाल, सपा-बसपा की बढ़ी बेचैनी, मुस्लिम वोटों पर किसका दावा?

उत्तर प्रदेश, देश की सबसे बड़ी आबादी और सबसे बड़ी विधानसभा वाला राज्य. उत्तर प्रदेश… जिसे सत्ता की सबसे बड़ी सियासी प्रयोगशाला माना जाता है. यहां चुनाव भले ही दूर हों लेकिन हर पार्टी अपने-अपने समीकरण सेट करने में जुट गई है. एक तरफ योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में बीजेपी है, जो सरकार के कामकाज, कानून-व्यवस्था और अपनी विकास योजनाओं के दम पर जनता के बीच जाने की तैयारी में है. दूसरी तरफ अखिलेश यादव हैं. जिन्होंने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण को अपनी राजनीति का आधार बनाया है. तो कांग्रेस भी गठबंधन की राजनीति के जरिए अपनी जगह मजबूत करना चाहती है.और मायावती.जो अपने पुराने राजनीतिक आधार को दोबारा मजबूत करने की कोशिश में हैं.
लेकिन अब इस चतुष्कोणीय मुकाबले में असदुद्दीन ओवैसी ने भी अपनी दावेदारी तेज कर दी है. ओवैसी का निशाना सिर्फ बीजेपी नहीं , बल्कि विपक्ष की वो राजनीति भी है, जिसमें मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए समाजवादी पार्टी सबसे मजबूत दावेदार मानी जाती रही है. ओवैसी इसी समीकरण को चुनौती देना चाहते हैं.
ओवैसी की नजर मुस्लिम वोटों के जरिए यूपी में अपनी राजनीतिक पकड़ बढ़ाने पर है. अब ओवैसी कैसे अखिलेश को टेंशन दे रहे हैं. ओवैसी की एंट्री से मुसलमानों के समर्थन का दम भरने वाले अखिलेश, राहुल से लेकर मायावती तक की बेचैनी कैसे बढ़ सकती है. ये भी समझेंगे, लेकिन उससे पहले ये समझना जरूरी है कि कैसे 2027 की लड़ाई 2026 में ‘अयोध्या’ पर कैसे फोकस हो गई.
योगी को चैलेंज देकर फंस गए अखिलेश?
दरअसल 8 अक्टूबर को समाजवादी पार्टी के विधायक पवन पांडे के भागवत कथा कार्यक्रम में सपा प्रमुख अखिलेश यादव पहुंचे थे. वहां पर अखिलेश ने सीएम योगी को अयोध्या से चुनाव लड़ने का चैलेंज क्या दिया. अयोध्या यूपी में 2027 की चुनावी जंग का केंद्र बन गई.
यूपी की राजनीति में इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात को लेकर है, कि क्या योगी के चैलेंज स्वीकार करने के बाद, अब अखिलेश यादव भी योगी का चैलेंज स्वीकार करेंगे या नहीं? क्योंकि सीएम योगी ने अखिलेश यादव की चुनौती स्वीकार करते हुए, उनके सामने एक बड़ा चैलेंज ज़रूर रख दिया है.
अब तक अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के नेताओं की तरफ से जिस तरह के बयान आ रहे हैं, उनसे ऐसी कोई संभावना नज़र नहीं आती कि अयोध्या में 2027 में अखिलेश यादव और सीएम योगी एक-दूसरे के सामने होंगे. क्योंकि अखिलेश अयोध्या से बलिया पहुंचते ही पलट भी गए. बोले- मैंने चुनौती नहीं दी थी बल्कि ये तो मेरी योगी को सलाह थी.
अब योगी को चुनाव लड़ने की चुनौती देकर अखिलेश यादव फंसते जरूर दिख रहे हैं, लेकिन उनके बयान ने अयोध्या को यूपी की सियासत के केन्द्र में एक बार फिर जरूर लाकर खड़ा कर दिया है. क्योंकि अखिलेश के अयोध्या दौरे की चर्चा सिर्फ उनके इस बयान को लेकर नहीं है. उनकी तस्वीरों के लेकर भी है. श्रीमद्भागवत कथा में पहुंचे अखिलेश यादव के एक हाथ में भगवान शिव का त्रिशूल और दूसरे हाथ में भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र दिखाई दिया. शंख ध्वनि के बीच संतों की मौजूदगी में अखिलेश त्रिशूल और डमरू के साथ नजर आए, तो उनका ये वीडियो वायरल हो गया. पीतांबरी ओढ़े हुए अखिलेश का वीडियो वायरल हुआ तो इसपर राजनीति भी शुरू हो गई.
अखिलेश ने अपने इस वीडियो के साथ एक कविता भी X पर पोस्ट कर दी. जिसमें उन्होंने लिखा,‘मानवता की रक्षा है सामूहिक ज़िम्मेदारीजब भेदभाव के शूल का चुभना रहे जारी अपमानों का बने निशाना दुखी मां-नारीयुवाओं के सपनों पर तलवार चले दुधारीजब सत्ता करे अत्याचार वंचितों पर भारीतब तू उठा त्रिशूल और बन सुदर्शनधारी!
इसके अलावा अखिलेश का अयोध्या का एक और वीडियो भी वायरल है, जिसमें वो गदा लेकर स्टेज पर खड़े हैं. लेकिन अयोध्या पहुंचने के बावजूद अखिलेश यादव राम मंदिर में रामलला के दर्शन करने नहीं गए. BJP ने इसे लेकर उन पर सवाल उठाए हैं.
सवाल अखिलेश के एक बयान पर भी है जिसमें उन्होंने राम और कृष्ण को एक बताते हुए राम मंदिर न जाने पर सफ़ाई दी. उन्होंने कहा, ‘जहां भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण हमारा तो कई बार आपने और हम लोगों ने सुना होगा हमारे लिए तो प्रभू श्री राम ही श्री कृष्ण हैं और प्रभू श्री कृष्ण ही श्री राम हैं.’
मतलब ये कि अखिलेश यादव राम मंदिर नहीं जाएंगे. रामलला के दर्शन नहीं करेंगे, लेकिन उनको हिंदू धर्म के लोगों का वोट जरूर चाहिए. यही वजह है कि वो राम-कृष्ण करने पर मजबूर हैं. मतलब अखिलेश यादव को भी उसी लाइन पर चलना पड़ रहा है, जिसको लेकर वो बीजेपी पर निशाना साधते रहे हैं. और इसकी वजह है. बीजेपी की तरफ से यूपी में योगी का चेहरा, जिसकी काट अबतक विपक्ष ढूंढ नहीं पाया है.
2017 में पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ 2022 में दोबारा सत्ता में लौटे. वे पहले मुख्यमंत्री बने जो पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करके फिर चुनकर आए. 2022 में BJP गठबंधन ने 403 में से 273 सीटें जीतीं, जिनमें अकेले BJP की 255 थीं, और उसका वोट शेयर करीब 41 प्रतिशत रहा. अब बीजेपी 2027 में योगी सरकार का विकास, कानून-व्यवस्था और विकास योजनाओं को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है. साथ में ये दावा भी कि. योगी सरकार और ज्यादा प्रचंड बहुमत के साथ वापसी करेगी.
PDA के भरोसे अखिलेश!
अखिलेश यादव बीच-बीच में कृष्ण का नाम लेकर हिंदू मतदाताओं को मैसेज जरूर देते रहते हैं. लेकिन अखिलेश का मेन फॉर्मुला PDA और गठबंधन ही है. PDA फॉर्मूला मतलब- पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक. 2024 के लोकसभा चुनाव में यही समीकरण सपा के काम आया. यूपी की 80 में से सपा ने 37 सीटें जीतीं और कांग्रेस ने 6, जो लोकसभा चुनाव में एक तरह से सपा का अब तक का सबसे अच्छे प्रदर्शनों मे से एक रहा है. इसी भरोसे पर अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ पुराने गठबंधन को बनाए रखना चाहते हैं. 2 अक्टूबर को लखनऊ में AIMIM से गठबंधन के सवाल पर उन्होंने साफ किया कि जो गठबंधन पहले था, वही आगे रहेगा.
कांग्रेस की कलह ख़त्म क्यों नहीं होती?
एक तरफ अखिलेश यादव अपने पुराने गठबंधन यानी कांग्रेस के साथ मिलकर मोदी-योगी को चुनौती देने का प्लान बना रहे हैं, दूसरी ओर कांग्रेस की अंदरूनी कहल खत्म ही नहीं हो रही. अब ये देखिए… लखनऊ कांग्रेस कार्यालय में आराधना मिश्रा के यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण कार्यक्रम के दौरान ही मारपीट हो गई. पूर्व अध्यक्ष अजय राय और वर्तमान अध्यक्ष आराधना मिश्रा के समर्थकों के बीच जमकर हंगामा, धक्का-मुक्की और मारपीट हुई. अब अध्यक्ष पद से हटाए गए अजय राय कह रहे हैं कि कुछ ऐसे लोग हैं जो पार्टी विरोधी काम कर रहे हैं. ऐसे लोगों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए.
अजय राय ने कहा, ‘पार्टी आगे बढ़े हमारी शुभकामनाएं है… हमारे कार्यकर्ता खुश हैं. वो तो समय है परिवर्तनशील है. आता है जाता है. और ये सतत प्रक्रिया है और कोई बात नहीं है. निश्चित तौर पर ऐसे लोग हैं जो पार्टी विरोधी कार्य कर रहे हैं उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. ‘
अब सोचिए जरा, जो कांग्रेस अपना अंदरूनी कलह नहीं खत्म करा पा रही. वो चुनाव में सपा को क्या मदद करेगी.
खैर चुनौती सिर्फ कांग्रेस के सामने नहीं. बसपा प्रमुख मायावती के सामने भी है. एक समय था जब बसपा का प्रभाव पूरे देश में था. अलग-अलग राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां मायावती की बसपा के साथ गठबंधन कर के अपनी सीटें बढ़ाना चाहती थी.
मायावती की मजबूती का आंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि 2007 में BSP ने अकेले दम पर 206 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी. लेकिन 2022 में पार्टी सिर्फ 1 सीट पर सिमट गई और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका खाता भी नहीं खुला. अब मायावती कांशीराम की विरासत और अपने पारंपरिक दलित वोटबैंक के सहारे वापसी की कोशिश कर रही हैं.
ओवैसी की एंट्री, टेंशन में कौन-कौन?
अब बात उस मोर्चे की, जिसने यूपी में सबसे ज्यादा हलचल मचा रखी है. और वो है AIMIM की. AIMIM ने सपा और कांग्रेस के सामने गठबंधन का खुला प्रस्ताव रखा था और 2 अक्टूबर तक की समय सीमा तय की. जवाब में अखिलेश ने पुराने गठबंधन के साथ ही चलने की बात कही.
यानी AIMIM के लिए दरवाजा बंद . इसके बाद ओवैसी ने भी सीधे-सीधे कह दिया कि AIMIM यूपी में जरूर लड़ेगी, संगठन पहले से मजबूत हुआ है और इस बार उसके कई विधायक जीत सकते हैं.
यूपी चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी ने धमाकेदार एंट्री और अखिलेश यादव को टेंशन देने वाला प्लान तैयार कर लिया है. दरअसल ओवैसी ने सपा और कांग्रेस को यूपी चुनाव में गठबंधन के लिए जो डेडलाइन दी थी. वो 2 अक्टूबर को खत्म हो चुकी है. ऐसे में ओवैसी ने अब यूपी में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है.
AIMIM सूत्रों के मुताबिक, ओवैसी यूपी में कम से कम 200 विधानसभा सीटों पर कैंडिडेट उतारने की तैयारी कर रहे हैं. इनमें से 100 विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुल इलाकों की हैं. ओवैसी उन मुस्लिम नेताओं को कैंडिडेट बनाने का प्लान तैयार कर रहे हैं, जिनके टिकट अखिलेश यादव काट देंगे.
आप भी सुनिए यूपी के श्रावस्ती में एक रैली के दौरान ओवैसी ने इंस्टाग्राम के कमेंट्स का हवाला देते हुए खुद को बीबी पगलू बताया और इस बहाने कैसे पीएम मोदी, सीएम योगी और अखिलेश पर हमला बोला.
एक तरफ ओवैसी धमकाने वाले अंदाज में अखिलेश यादव को गठबंधन का ऑफर दिया था लेकिन साथ में वो मुसलमान वोटर्स को ये भी बता रहे हैं कि अखिलेश को उनसे नहीं सिर्फ उनके वोट से मतलब है.
दरअसल ओवैसी यूपी चुनाव को लेकर कितने सीरियस हैं वो देखिए. एक तरफ वो इंडी वालों के साथ गठबंधन का दांव चल रहे हैं. वहीं वो मुस्लिम वोटर्स के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के लिए ताबड़तोड़ दौरे भी कर रहे हैं. ओवैसी का संदेश है कि जिन मुसलमानों को अखिलेश यादव टिकट नहीं देंगे, AIMIM उन्हें टिकट देगी.
दरअसल ये रणनीति नई नहीं है. 2021 में AIMIM ने जेल में बंद मुख्तार अंसारी को मऊ से टिकट का ऑफर दिया था, उसी दिन जब BSP ने उन्हें दोबारा टिकट ना देने की घोषणा की थी. तब भी AIMIM का आरोप था कि सपा और BSP मुस्लिम नेताओं का इस्तेमाल करके बाद में उन्हें छोड़ दिया.
अब ओवैसी के दावे में कितना दम है ये तो 2027 के चुनावी रिजल्ट बताएंगे. लेकिन ये भी सच है कि बिहार में ओवैसी ने ऐसा ही ऑफर आरजेडी को दिया था. आरजेडी ने गठबंधन नहीं किया. ओवैसी अकेले चुनाव लड़े. 2020 में सीमांचल की पांच सीटें जीत ली और 2025 में भी पांच सीट जीतकर आरजेडी को तगड़ा झटका दिया.
वैसे यूपी और बिहार में अंतर है, लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि 2011 की जनगणना के अनुसार यूपी में मुस्लिम आबादी करीब 19 प्रतिशत है. और अगर ओवैसी का जादू चल गया तो कई लोगों का सपना-सपना ही बन कर र जाएगा.



