17 साल तक हकलाहट से जूझे हिमांशु सिंह, आज राजस्थान सरकार में हैं अधिकारी

झुंझुनू. जिस उम्र में बच्चे खुलकर बोलना और अपनी बात रखना सीखते हैं, उस उम्र में हिमांशु सिंह के लिए सामान्य बातचीत करना, कक्षा में सवालों के जवाब देना और अपना परिचय देना भी चुनौतीपूर्ण था. छह साल की उम्र में शुरू हुई हकलाहट के कारण उन्हें लंबे समय तक परेशानी का सामना करना पड़ा. कक्षा में बोलने की बारी आने पर शब्द अटक जाते थे और साथियों के मजाक से उनका आत्मविश्वास भी प्रभावित होता था. हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी. निरंतर अभ्यास, स्पीच थेरेपी और दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने इस चुनौती का सामना किया और उसी आवाज को अपनी पहचान बना लिया, जिसे लेकर कभी उन्हें संकोच होता था.
आज विश्व हकलाहट दिवस के अवसर पर हिमांशु सिंह का सफर उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो हकलाहट के कारण बोलने में परेशानी और आत्मविश्वास की कमी का सामना कर रहे हैं. हिमांशु वर्तमान में राजस्थान सरकार में जिला जनसंपर्क अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं. आकाशवाणी से लेकर दूरदर्शन तक काम करने का अनुभव रखने वाले हिमांशु अब हकलाहट से जूझ रहे बच्चों की मदद भी कर रहे हैं.
23 साल की उम्र तक किया संघर्ष, फिर शुरू किए गंभीर प्रयासहिमांशु को करीब 17 साल तक हकलाहट की समस्या का सामना करना पड़ा. लगभग 23 साल की उम्र तक यह परेशानी उनके साथ रही. इस दौरान सामान्य बातचीत से लेकर सार्वजनिक रूप से बोलने तक कई चुनौतियां सामने आईं. बाद में उन्होंने समस्या में सुधार के लिए गंभीर प्रयास शुरू किए. उन्होंने स्पीच थेरेपी ली, हकलाहट से संबंधित विषयों का अध्ययन किया और नियमित अभ्यास को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया. धीरे-धीरे बोलने में सुधार होने लगा और आत्मविश्वास भी बढ़ा. उन्होंने बार-बार माइक के सामने बोलने का अभ्यास किया और अपनी झिझक दूर करने की कोशिश जारी रखी. इसी मेहनत का परिणाम रहा कि वर्ष 2015 में उन्होंने आकाशवाणी का ऑडिशन पास किया. इसके बाद वे आकाशवाणी के युववाणी कार्यक्रम में उद्घोषक के रूप में भी जुड़े.
जिस आवाज से झिझकते थे, उसी से बनाई पहचानहिमांशु का सफर बताता है कि किसी चुनौती को अपनी कमजोरी मानकर रुक जाने के बजाय लगातार प्रयास करना जरूरी है. कभी अपना परिचय देने में भी परेशानी महसूस करने वाले हिमांशु ने रेडियो और टेलीविजन जैसे माध्यमों में काम करके अपनी अलग पहचान बनाई. उनकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि उन बच्चों और युवाओं के लिए भी उम्मीद की किरण है, जो हकलाहट के कारण दूसरों के सामने बोलने से कतराते हैं. हिमांशु अपने अनुभव को केवल अपनी उपलब्धि तक सीमित नहीं रखना चाहते. वे हकलाहट से परेशान बच्चों को निशुल्क स्पीच थेरेपी के माध्यम से मदद कर चुके हैं और इस समस्या से जुड़े विषयों पर परामर्श भी देते हैं. उनका प्रयास है कि बच्चों को बोलने का अभ्यास कराने के साथ ऐसा वातावरण भी मिले, जहां उनकी बात धैर्यपूर्वक सुनी जाए. हकलाहट के कारण किसी बच्चे का मजाक उड़ाने या उसे कमतर समझने के बजाय उसे प्रोत्साहित किया जाए, ताकि उसका आत्मविश्वास बना रहे.
सही मार्गदर्शन और सहयोग से खुल सकते हैं आगे बढ़ने के रास्तेहकलाहट से जूझ रहे बच्चों के लिए परिवार, शिक्षक और समाज का व्यवहार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. बोलते समय बच्चे के शब्द अटकने पर उसे जल्दी बोलने के लिए कहना, उसकी बात बीच में काटना या उसका मजाक उड़ाना उसकी परेशानी बढ़ा सकता है. इसके बजाय उसे अपनी बात पूरी करने का समय देना और ध्यान से सुनना चाहिए. हिमांशु सिंह का अनुभव इस बात को रेखांकित करता है कि हकलाहट के बावजूद व्यक्ति अपनी क्षमताओं को विकसित कर सकता है. उचित मार्गदर्शन, निरंतर अभ्यास और सहयोग से आत्मविश्वास बढ़ाने तथा अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है.
हकलाहट को केवल डर या गलत आदत मानना सही नहींऑडियोलॉजिस्ट एवं स्पीच लैंग्वेज थेरेपिस्ट डॉ. अमित किराड़ ने बताया कि हकलाहट बोलने के प्रवाह से जुड़ी एक जटिल समस्या है, जिसके पीछे कई कारक हो सकते हैं. इसे केवल डर, गलत आदत या सांस के तालमेल में गड़बड़ी का परिणाम मानना सही नहीं है. प्रशिक्षित स्पीच लैंग्वेज थेरेपिस्ट से मूल्यांकन और मार्गदर्शन लेना उपयोगी हो सकता है. हकलाने वाले व्यक्ति पर जल्दी बोलने का दबाव डालने के बजाय उसे धैर्यपूर्वक सुनना चाहिए. परिवार और समाज का सहयोग भी महत्वपूर्ण है. हिमांशु सिंह का सफर बताता है कि सही मार्गदर्शन, निरंतर अभ्यास और सकारात्मक माहौल से हकलाहट का सामना कर रहे लोगों को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है.



