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2 साल तक खरीदार को तरसा, फिर जीवन बीमा गिरवी रख बनाई पहली मूवी, रातों-रात बना ग्लोबल स्टार

Last Updated:May 02, 2026, 05:31 IST

डायरेक्टर की पहली फिल्म भारतीय सिनेमा का मील का पत्थर है, लेकिन इसे बनाने के लिए डायरेक्टर को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा था. जब फिल्म को 2 साल तक कोई खरीदार नहीं मिला, तो डायरेक्टर ने अपनी जीवन बीमा पॉलिसी गिरवी रख दी और स्केच वाली नोटबुक लेकर प्रोड्यूसर्स के चक्कर लगाए. तमाम मुश्किलों के बावजूद साल 1955 में रिलीज हुई फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ ने ग्लोबल लेवल पर पॉपुलैरिटी पाई. वे कान्स फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित हुई. सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें ऑस्कर और भारत रत्न से नवाजा गया.

सत्यजीत रे भारतीय सिनेमा का एक ऐसा नाम हैं, जिनकी चमक आज भी फीकी नहीं पड़ी है. उनकी पहली फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ को ग्लोबल सिनेमा में एक मील का पत्थर माना जाता है. लेकिन इस महान फिल्म को बनाने के पीछे सत्यजीत रे को बहुत बड़े आर्थिक संकट और स्ट्रगल का सामना करना पड़ा था. यह फिल्म आज जितनी आसान लगती है, इसे बनाना उतना ही मुश्किल था.

फिल्म के लिए प्रोड्यूसर्स को मनाने के लिए सत्यजीत रे अपने साथ एक खास नोटबुक लेकर जाते थे. इस नोटबुक में उन्होंने फिल्म के अहम सीन के बेहद खूबसूरत स्केच बनाए थे. वे चाहते थे कि निर्माता इन चित्रों के जरिए फिल्म की गहराई को समझ सकें. लेकिन इसके बावजूद कोई भी फिल्ममेकर उन पर पैसा लगाने को तैयार नहीं हुआ. (फोटो साभार: AI से जेनरेटेड इमेज)

जब कहीं से मदद नहीं मिली, तो भी सत्यजीत रे ने हार नहीं मानी और एक बड़ा जोखिम उठाया. उन्होंने फिल्म की फंडिंग के लिए अपनी जीवन बीमा पॉलिसी तक गिरवी रख दी. इसके अलावा, उन्होंने अपने कुछ मित्रों और रिश्तेदारों से भी पैसे उधार लिए. यह फिल्म के प्रति उनके जुनून और समर्पण का ही नतीजा था कि उन्होंने अपनी जमा-पूंजी तक लगा दी. (फोटो साभार: AI से जेनरेटेड इमेज)

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सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कोलकाता के एक परिवार में हुआ था. उन्हें बचपन से ही फिल्मों, संगीत और पेंटिंग का बहुत शौक था. अपनी मां के कहने पर वे 1940 में शांतिनिकेतन गए और वहां चित्रकला सीखी. इसके बाद, उन्होंने करीब 13 साल तक एक विज्ञापन एजेंसी में जूनियर विजुअलाइजर के तौर पर नौकरी भी की. (फोटो साभार: IANS)

सत्यजीत रे ने लंदन ट्रिप के दौरान ‘बाइसिकल थीफ’ फिल्म देखी, जिसने उनके सोचने का तरीका बदल दिया. उन्होंने तय किया कि वे रियलिस्टिक फिल्में बनाएंगे जो जीवन की सच्चाई दिखाए. इसके लिए, उन्होंने विभूति भूषण बंदोपाध्याय की मशहूर किताब ‘पाथेर पांचाली’ के अधिकार खरीदे. वे करीब दो साल तक फिल्म के लिए फाइनेंसर तलाशते रहे. (फोटो साभार: IMDb)

फिल्म का पहला सीन 27 अक्टूबर 1952 को रविवार की छुट्टी के दिन शूट किया गया था. यह वही मशहूर सीन था जिसमें अपू और दुर्गा काश के खेत में रेलगाड़ी देखने के लिए भागते हैं. पैसे खत्म हो जाने की वजह से फिल्म की शूटिंग कई बार बीच में ही रुक गई थी. अपू के किरदार के लिए उन्होंने अखबार में विज्ञापन दिया और बहुत मुश्किल से ‘बिजोया’ नाम के लड़के को चुना. (फोटो साभार: IMDb)

तमाम मुश्किलों को पार करते हुए ‘पाथेर पांचाली’ 26 अगस्त 1955 को रिलीज हुई और सुपरहिट रही. 1956 में इस फिल्म ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में ‘बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट’ का अवॉर्ड जीता. इस सफलता ने सत्यजीत रे को रातों-रात ग्लोबल लेवल पर मशहूर कर दिया. उनकी फिल्में गरीबी, भूख और सामाजिक मुद्दों की सच्ची तस्वीर पेश करती थीं.(फोटो साभार: IMDb)

सत्यजीत रे ने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और ‘चारुलता’ जैसी कई महान फिल्में बनाईं. उनकी फिल्मों में कमर्शियल सिनेमा की चमक नहीं, बल्कि आम भारतीय जीवन की सच्चाई होती थी. साल 1992 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए ऑस्कर और भारत रत्न से नवाजा गया. (फोटो साभार: IMDb)

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