Tesu Jhanjhi Festival | भरतपुर में महाभारत काल की परंपरा

Last Updated:October 03, 2026, 11:37 IST
Tesu Jhanjhi Festival: भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में महाभारत काल से जुड़ी टेसू-झांझी की प्राचीन लोक परंपरा आज भी पूरी तरह से जीवंत है. शाम होते ही गांवों में छोटे बच्चों की टोलियां रंग-बिरंगे टेसू और झांझी लेकर घर-घर पहुंचती हैं. बच्चे पारंपरिक लोकगीत गाकर लोगों से अनाज या रुपए दान में मांगते हैं. लोक मान्यताओं में टेसू को महाभारत के वीर योद्धा बर्बरीक से जोड़ा जाता है, जिन्होंने श्रीकृष्ण को अपना शीश दान किया था. आज बाजारों में भी टेसू बिकते हैं. यह परंपरा ब्रज और ग्रामीण संस्कृति की एक खूबसूरत झलक है.
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भरतपुर: भरतपुर जिले के ग्रामीण अंचलों में आज भी कई ऐसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लोक परंपराएं हैं, जो आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी पूरी चमक और जीवंतता के साथ कायम हैं. इन्हीं में से एक बेहद खास और अनूठी परंपरा है टेसू-झांझी का खेल. इन दिनों भरतपुर के गांवों की गलियों और मोहल्लों में शाम ढलते ही यह नजारा आम हो जाता है. छोटे-छोटे बच्चों की टोलियां अपने हाथों में रंग-बिरंगे टेसू और झांझी लेकर घर-घर पहुंचते हैं. बच्चे बड़े ही सुरीले अंदाज में पारंपरिक लोकगीत गाते हैं और लोगों से दान मांगते हैं. ग्रामीण परिवेश में लोग भी इन बच्चों को निराश नहीं करते और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें बाजरा, अनाज या नकद रुपए देकर विदा करते हैं.
स्थानीय लोक मान्यताओं और जानकारों के अनुसार, टेसू-झांझी की इस अनोखी परंपरा का सीधा जुड़ाव द्वापर युग यानी महाभारत काल से माना जाता है. लोककथाओं में टेसू को महाभारत के महान और अजेय वीर योद्धा बर्बरीक का प्रतीक मानकर देखा जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वीर बर्बरीक ने कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में शामिल होने से पहले भगवान श्रीकृष्ण से यह वरदान मांगा था कि वह युद्ध में हमेशा हारने वाले पक्ष की ओर से ही लड़ेंगे. भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि इससे युद्ध का परिणाम बदल सकता है. इसलिए उन्होंने बर्बरीक की वीरता और वचनबद्धता की कड़ी परीक्षा लेने के बाद अंत में दान स्वरूप उनसे उनका शीश मांग लिया था. इसी महान बलिदान और लोक मान्यता को आधार मानकर आज भी टेसू की इस गौरवशाली परंपरा को ग्रामीण अंचलों में बड़ी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है.
बच्चों में भारी उत्साह और झांझी का खेलटेसू के साथ-साथ झांझी की परंपरा भी ग्रामीण बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय और उत्साहजनक है. शाम होते ही गांव के बच्चे एक समूह या टोली बनाते हैं. इसके बाद वे पूरे गांव की गलियों में निकलते हैं. बच्चे जब पारंपरिक लोकगीत गाते हुए ग्रामीण घरों के दरवाजे पर पहुंचते हैं, तो पूरा माहौल उल्लास से भर जाता है. बच्चे वहां पहुंचकर टेसू-झांझी का अनोखा खेल भी दिखाते हैं. ग्रामीण परिवार भी सदियों से चली आ रही इस लोक परंपरा का पूरा सम्मान करते हुए बच्चों का उत्साहवर्धन करते हैं. वे खुशी-खुशी बच्चों को खाने-पीने की चीजें, अनाज या पैसे दान करते हैं. यह दृश्य गांव के आपसी प्रेम और भाईचारे को भी दर्शाता है.
बाजारों में भी मिलने लगे रंग-बिरंगे टेसूइस परंपरा में समय के साथ कुछ बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं. एक समय था जब गांव के लोग या बच्चे अपने घरों में ही बांस की खपच्चियों, कागज और मिट्टी से पारंपरिक तरीके से टेसू तैयार किया करते थे. लेकिन आज के बदलते दौर में अब बाजारों में भी कई तरह के रेडीमेड और रंग-बिरंगे टेसू बिकने लगे हैं. आधुनिकता की इस चकाचौंध के बावजूद सबसे अच्छी बात यह है कि गांवों के बच्चे और उनकी टोलियां आज भी इस लोक परंपरा को पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा रही हैं. टेसू-झांझी अब सिर्फ बच्चों का कोई साधारण खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह भरतपुर और ब्रज क्षेत्र के ग्रामीण अंचल की लोक संस्कृति, गहरी आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध परंपराओं की एक बहुत ही खूबसूरत और जीवंत झलक पेश करता है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bharatpur,Bharatpur,Rajasthan
First Published :
October 03, 2026, 11:37 IST



