नागौर में अंग्रेजों के खिलाफ उठी थी हुंकार, 6 हजार क्रांतिकारी पहुंचे थे आउवा, 1857 में ऐसे दी थी अंग्रेजों को चुनौती

नागौर: आजादी की कहानी सिर्फ उन बड़े नामों तक सीमित नहीं है, जिन्हें इतिहास की किताबों में जगह मिली. राजस्थान के गांवों और कस्बों में भी ऐसे अनेक लोग रहे, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष में अपनी भूमिका निभाई. नागौर और मेड़ता क्षेत्र भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इसी प्रतिरोध की अहम कड़ी बने. यहां के ठाकुरों, ग्रामीणों, व्यापारियों और आम लोगों ने क्रांतिकारियों को समर्थन दिया, रसद पहुंचाई और जरूरत पड़ने पर गुप्त सूचनाएं भी उपलब्ध कराई.
1857 की क्रांति के दौरान नागौर मुख्य रूप से मारवाड़ रियासत का हिस्सा था. उस समय जोधपुर दरबार अंग्रेजों के पक्ष में था, लेकिन क्षेत्र के कई स्थानीय सामंतों और ग्रामीणों ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ खड़े क्रांतिकारियों का साथ दिया. मेड़ता और आसपास के क्षेत्रों में क्रांतिकारियों को सैनिक सहायता के साथ रसद उपलब्ध कराने की भूमिका भी निभाई गई. दिल्ली की ओर बढ़ने वाले क्रांतिकारियों को स्थानीय लोगों ने रास्ते में सहयोग दिया और अंग्रेजों से जुड़ी गुप्त जानकारियां भी पहुंचाई.
करीब 6 हजार क्रांतिकारी पहुंचे आउवा
इतिहास के जानकार नरेंद्रसिंह शेखावत के अनुसार, आलनियावास के ठाकुर अजीतसिंह, आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह और आउवा के ठाकुर कुशालसिंह जैसे स्थानीय नेतृत्व ने क्रांतिकारी गतिविधियों को मजबूती दी. लांबियां, भीमलियां, राडावास, ऐरनपुरा, गूलर, रिड़, आलनियावास और परबतसर तहसील के बाजवास सहित आसपास के गांवों में क्रांतिकारी जुटे और आगे की रणनीति पर विचार किया. बताया जाता है कि इन क्षेत्रों से करीब छह हजार क्रांतिकारी ऐरनपुरा होते हुए आउवा पहुंचे. यहां ठाकुर कुशालसिंह की अगुवाई में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना और जोधपुर की सेना को चुनौती दी. आउवा का संघर्ष 1857 के दौर में मारवाड़ के सबसे चर्चित प्रतिरोधों में शामिल रहा. इस घटनाक्रम ने अंग्रेजी प्रशासन को यह एहसास करा दिया था कि मारवाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में विद्रोह की चिंगारी तेजी से फैल सकती है.
तात्या टोपे की खबर से अंग्रेजों में बढ़ी चौकसी
1857 के संघर्ष में तात्या टोपे का नाम अंग्रेजों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था. राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में उनके आवागमन की खबरें अंग्रेज अधिकारियों तक पहुंचती थीं. नागौर क्षेत्र में भी उनके आने की सूचनाओं ने ब्रिटिश प्रशासन की चिंता बढ़ा दी थी. इसके बाद नागौर और बीकानेर की सीमाओं पर अतिरिक्त निगरानी और चौकसी बढ़ाई गई. हालांकि नागौर में कोई बड़ी सैनिक छावनी नहीं थी, लेकिन स्थानीय लोगों और व्यापारियों का अप्रत्यक्ष सहयोग क्रांतिकारियों के लिए अहम हिस्सा माना गया.
गूलर का गढ़ आज भी समेटे है संघर्ष के निशान
परबतसर क्षेत्र के गूलर गांव का गढ़ आज भी उस दौर की घटनाओं की याद दिलाता है. बताया जाता है कि अंग्रेजी सेना और क्रांतिकारियों के बीच हुए संघर्ष के दौरान दागे गए गोलों के निशान इसकी दीवारों पर मौजूद हैं. इतिहास की ये निशानियां भले ही आज आम चर्चा का हिस्सा न हों, लेकिन क्षेत्र के लोकगीतों में इन वीरों की गाथाएं अब भी जीवित हैं.



