Udaipur News: सदियों पुरानी परंपरा आज भी जिंदा, उदयपुर के मंदिरों में जल घड़ी से तय होता है पूजा का समय

Last Updated:October 31, 2026, 13:47 IST
Ancient Water Clock: उदयपुर के मंदिरों में आज भी सदियों पुरानी जल घड़ी की परंपरा जीवित है. लकड़ी के बॉक्स, पीतल के पात्र और तांबे की छोटी कटोरी से चलने वाली यह अनोखी घड़ी पानी की बूंदों के जरिए समय बताती है. कभी इसी जल घड़ी के संकेत पर मंदिरों में पूजा-अर्चना और आरती का समय तय होता था. डिजिटल दौर में भी मेवाड़ की यह अनूठी परंपरा लोगों को पुराने समय के विज्ञान और पूर्वजों की समझदारी से रूबरू करा रही है.
उदयपुर. आज के दौर में समय देखने के लिए हर किसी के हाथ में घड़ी या मोबाइल है, लेकिन पुराने जमाने में जब घड़ियां नहीं हुआ करती थी, तब समय का पता लगाने के लिए भी अनोखे तरीके अपनाए जाते थे. खास बात यह है कि मेवाड़ के उदयपुर में आज भी समय बताने का ऐसा ही एक पुराना तरीका देखने को मिलता है. यहां कुछ मंदिरों में सदियों पुरानी जल घड़ी की परंपरा आज भी कायम है. इसी जल घड़ी के आधार पर मंदिरों में पूजा-अर्चना और धार्मिक गतिविधियों का समय तय किया जाता था. दरअसल, पुराने समय में मंदिरों में पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता था, दिनभर की धार्मिक गतिविधियां अलग-अलग पहर के हिसाब से होती थी. ऐसे में उस समय घड़ियां नहीं होने के कारण जल घड़ी के जरिए समय का हिसाब रखा जाता था. यह परंपरा केवल समय बताने का माध्यम नहीं थी, बल्कि मंदिरों की दिनचर्या का भी एक अहम हिस्सा हुआ करती थी.
इस जल घड़ी को देखने पर पता चलता है कि पुराने समय के लोगों ने कितनी समझदारी से समय मापने का तरीका विकसित किया था. इसमें लकड़ी का एक विशेष बॉक्स होता है. इसके अंदर पीतल का एक बड़ा पात्र रखा जाता है, जिसमें पानी भरा रहता है. इसी पानी में तांबे की एक छोटी कटोरी रखी जाती है. इस कटोरी के नीचे एक छोटा सा छेद होता है, पानी धीरे-धीरे इस छेद के जरिए कटोरी के अंदर भरता है और कुछ समय बाद कटोरी पानी में डूब जाती है. जैसे ही यह छोटी कटोरी डूबती है, एक निश्चित समय यानी एक घटी पूरी होने का संकेत मिलता है. इसके बाद मंदिर परिसर में घंटी बजाई जाती है. इसी संकेत के आधार पर पहर का समय जाना जाता था.
मंदिर में मौजूद लोग समझ जाते थे कि अब पूजा-अर्चना या दूसरी धार्मिक गतिविधियों का अगला समय हो गया है. पुराने समय में दिन और रात को अलग-अलग पहरों में बांटा जाता था. इसी हिसाब से मंदिरों में पूजा और आरती की व्यवस्था होती थी. खास बात यह है कि आज मोबाइल और डिजिटल घड़ियों के दौर में भी इस पारंपरिक व्यवस्था को पूरी तरह भुलाया नहीं गया है. उदयपुर के मंदिरों में आज भी जल घड़ी के जरिए समय मापने की यह परंपरा जीवित है. यह केवल एक पुरानी वस्तु नहीं, बल्कि मेवाड़ की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है. जल की बूंदों से समय बताने वाली यह व्यवस्था बताती है कि हमारे पूर्वजों ने विज्ञान और परंपरा को किस तरह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ रखा था. आज की पीढ़ी के लिए भी यह जल घड़ी किसी आश्चर्य से कम नहीं है.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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Udaipur,Rajasthan
First Published :
October 31, 2026, 13:47 IST



