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Water Chestnut Farming: तालाब नहीं है तो भी खेत में कर सकते हैं सिंघाड़े की खेती, कम लागत में कमाएं 3 लाख तक का मुनाफा

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किसानों के लिए शानदार बिजनेस! कम लागत में सिंघाड़े की खेती से कमाएं 3 लाख तक

Last Updated:July 04, 2026, 06:41 IST

Water Chestnut Singhara Farming Benefits Profit and Process: मानसून के आगमन के साथ ही सिंघाड़े की खेती की तैयारियां तेज हो गई हैं. किसान अब अपने खेतों में 3-4 फीट ऊंची मेड़ और पॉन्ड बनाकर भी इसकी खेती कर सकते हैं. जुलाई-अगस्त में रोपाई के बाद महज 3 महीने में इसकी फसल तैयार हो जाती है, जिससे प्रति हेक्टेयर 70 से 100 क्विंटल तक की उपज मिलती है. कम लागत और कम जोखिम वाली इस खेती से किसान भाई सुखाकर आटा बेचने या कच्चे फल बेचकर सालभर में 2 से 3 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा सकते हैं.

प्रगतिशील किसान गेनाराम ने बताया कि सिंघाड़े की रोपाई जुलाई से अगस्त माह के बीच की जाती है. इस समय में बारिश शुरू हो जाती है. सिंघाड़े की अच्छी ग्रोथ के लिए पानी की जरूरत होती है. पारंपरिक फसलों की खेती से इसमें कम लागत और नुकसान का खतरा रहता है. बड़े स्तर पर खेती करने पर एक हैक्टेयर में 2 से 3 लाख तक की इनकम इस खेती से हो सकती है.

सिंघाड़े की खेती के लिए जलभराव या तालाब होना जरूरी है. अगर आप खेत में इसकी खेती करना चाहते हैं, तो सही भूमि का चयन करने के बाद मेड़बंदी करना जरूरी है. मानसून में नेचुरल तरीके से बारिश के पानी को रोकने की क्षमता रखने वाली चिकनी या दोमट मिट्टी इसके लिए सही होती है. पहले खेत की गहरी जुताई करने के बाद खेत के चारों ओर 3–4 फीट ऊंची और मजबूत मेड़ बनाकर बारिश के पानी को रोका जाता है.

खेत तैयार करने के बाद सिंघाड़े के बीजों से पौध तैयार किए जाते हैं. जुलाई के बीच से पौधों को तैयार कर उनकी रोपाई शुरू कर दी जाती है. जब पौधे एक महीने के हो जाते हैं, तो ये खेत में लगाने लायक हो जाते हैं. रोपाई के समय पौधों की जड़ों को पानी के नीचे कीचड़ वाली मिट्टी में दबा दिया जाता है, ताकि पानी के बहाव से पौधे को नुकसान न हो.

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सिंघाड़े की फसल में वाटर चेस्टनट बीटल (Water Chestnut Beetle) कीट के लगने का खतरा रहता है. इसके नियंत्रण के लिए कृषि अधिकारी से सलाह लेकर समय पर उचित कीटनाशक का उपयोग किया जा सकता है. इसके साथ ही, पानी की स्वच्छता और उसमें ऑक्सीजन का स्तर बनाए रखना भी बेहद जरूरी है. इसके लिए खेत में जमा सड़ी हुई घास, काई और पानी के अन्य खरपतवारों को नियमित रूप से बाहर निकालते रहना चाहिए, ताकि पौधे की बेल को फैलने में कोई दिक्कत न हो और फसल स्वस्थ रहे.

रोपाई के लगभग 3 महीने में जब सिंघाड़े गहरे हरे और लाल रंग के फल तैयार हो जाते हैं, तो इसकी तुड़ाई शुरू कर दी जाती है. गहरे पानी में उतरकर सिंघाड़े के फलों को बेल से तोड़ा जाता है. एक हेक्टेयर में अगर रोपाई की जाती है, तो 70 क्विंटल से 100 क्विंटल तक सिंघाड़े की उपज मिलती है.

कम जगहों पर ही इसकी खेती होने से इसकी मार्केट में डिमांड ज्यादा रहती है. वहीं सीजन में इसकी डिमांड ज्यादा होती है. ऐसे में किसान सिंघाड़े की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकता है. कच्चे सिंघाड़े को सुखाकर उसका आटा बनाकर भी बेचा जा सकता है, जो बाजार में काफी महंगे दाम में मिलता है. इसका उपयोग व्रत का भोजन बनाने में होता है.

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