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क्या है डायमंड हार्बर मॉडल? अभिषेक बनर्जी अब इसे पूरे पश्चिम बंगाल में लागू करने की क्यों बना रहे योजना

नई दिल्‍ली. ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने पिदले लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया. इसमें उनके भतीजे और पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी की भी अहम भूमिका रही. बनर्जी ने डायमंड हार्बर मॉडल को एक लोकसभा क्षेत्र में लागू किया, जो कामयाब रहा. अब वो इसे पूरे पश्चिम बंगाल में लागू करना चाहते हैं. यह एक एक विकास और प्रशासनिक रणनीति है. यह मॉडल स्थानीय स्तर पर विकास, जनसंपर्क और संगठनात्मक दक्षता को बढ़ाने पर केंद्रित है.

अभिषेक का मानना है कि डायमंड हार्बर मॉडल न सिर्फ टीएमसी के लिए एक गेम-चेंजर हो सकता है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल को विकास और प्रशासनिक कुशलता में अग्रणी राज्य बना सकता है. उनकी योजना इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की है, ताकि हर जिले में इसकी सफलता दोहराई जा सके. इसे एक ऐसी कार्यप्रणाली के रूप में देखा जाता है जो बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अवसरों को बेहतर करने के साथ-साथ जनता की शिकायतों को त्वरित समाधान प्रदान करने पर जोर देती है.

विकास पर फोकस: डायमंड हार्बर मॉडल के तहत सड़कें, पानी की आपूर्ति, स्वास्थ्य सुविधाएं और स्कूलों का विकास तेजी से किया गया. उदाहरण के लिए क्षेत्र में अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या ढ़ाई गई और साथ ही सड़कों का जाल बिछाया गया.

जनसंपर्क और शिकायत निवारण: अभिषेक ने “एक दाके अभिषेक” जैसे कार्यक्रम शुरू किए, जिसमें 24×7 हेल्पलाइन के जरिए लोगों की समस्याओं को सुना और हल किया जाता है. इससे जनता के बीच उनकी पहुंच और विश्वसनीयता बढ़ी.

संगठनात्मक मजबूती: टीएमसी के कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर सक्रिय रखने और पार्टी की नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक कॉर्पोरेट-शैली का अनुशासन लाया गया.

चुनावी सफलता: इस मॉडल की बदौलत अभिषेक ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में डायमंड हार्बर से भारी अंतर से जीत हासिल की. 2024 में उन्होंने 7 लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जो इस मॉडल की लोकप्रियता का सबूत है.

अभिषेक बनर्जी इसे पूरे पश्चिम बंगाल में क्यों लागू करना चाहते हैं?

सिद्ध सफलता: डायमंड हार्बर में इस मॉडल ने न केवल विकास को गति दी, बल्कि टीएमसी को राजनीतिक रूप से मजबूत भी किया. 2021 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र की सभी सात सीटें टीएमसी ने जीतीं, जो इसकी प्रभावशीलता को दर्शाता है.

पार्टी का विस्तार: ममता बनर्जी के बाद पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले अभिषेक इसे एक ब्लूप्रिंट के रूप में देखते हैं, जिससे टीएमसी का प्रभाव पूरे बंगाल में बढ़ाया जा सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां विपक्ष मजबूत है.

लोकतांत्रिक जवाबदेही: यह मॉडल जनता की शिकायतों को सुनने और तुरंत कार्रवाई करने पर जोर देता है, जिससे सरकार और जनता के बीच विश्वास बढ़ता है. अभिषेक इसे राज्यव्यापी स्तर पर लागू कर टीएमसी की छवि को और मजबूत करना चाहते हैं.

भविष्य की तैयारी: ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी के रूप में देखे जाने वाले अभिषेक इस मॉडल के जरिए अपनी नेतृत्व क्षमता को साबित करना चाहते हैं. इसे पूरे राज्य में लागू करना उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है.

विपक्ष को चुनौती: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का वोट शेयर बंगाल में बढ़ रहा है. इस मॉडल के जरिए अभिषेक न केवल विकास का वादा पूरा करना चाहते हैं, बल्कि विपक्ष के “हवाई मुद्दों” को बेनकाब कर जनता का भरोसा जीतना चाहते हैं.

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