भारत में दिल की धड़कन क्यों होने लगी है तेज, किस बीमारी के हैं ये संकेत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानिए इसके खतरे

Atrial Fibrillation : हम जो खाना खाते हैं, उससे पोषक तत्व निकलते हैं. ये पोषक तत्व खून में मिल जाते हैं. खून शरीर के कतरे-कतरे तक इस पोषक तत्व को पहुंचा देता है. इसी से हम जिंदा रहते हैं. इस खून को पूरे शरीर में पहुंचाने और वहां से अशुद्ध खून को लाने का काम एक पंपिंग मशीन करती है. इस पंपिंग मशीन को हार्ट कहा जाता है. जब तक हमारी जिंदगी है तब तक यह हार्ट बिना रुके और बिना थके खून को पंप करता रहता है. हार्ट की एक लयात्मक गति होती है. एक मिनट में हमारा हार्ट 60 से 100 बार धड़कता है जिसका मतलब है कि इतनी बार खून को पंप करता है. लेकिन कई कारणों से हार्ट रेट उपर नीचे हो सकती है. इससे हार्ट पर परेशानी बढ़ जाती है. आजकल भारत में यह बीमारी बढ़ने लगी है. यानी दिल की धड़कन के अनियमित होने का खतरा बढ़ने लगा है. आखिर यह कौन सी बीमारी है, यह कितना गंभीर है और इससे बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए, इस विषय पर हमने फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट में वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट एंड इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिस्ट डॉ. अपर्णा जायसवाल से बात की. आइए इसे विस्तार से समझते हैं.
किस बीमारी के हैं संकेत
डॉ. अपर्णा जायसवाल ने बताया कि जब हमारे हार्ट की धड़कन अनियमित हो जाती है तो इस बीमारी को एट्रियल फेब्रिलेशन AFib कहा जाता है. आजकल एट्रियल फिब्रलेशन के मामले बढ़ते जा रहे हैं. इसमें अचानक स्ट्रोक और हार्ट फेल्योर का भी खतरा रहता है. एट्रियल फ्रिब्रिलेशन को समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि हमारा हार्ट किस तरह से काम करता है.
हार्ट के काम करने का तरीका
हार्ट हमारे शरीर का नेचुरल पंपिंग मशीन है जो इलेक्ट्रिक सिग्नल की मदद से लगातार धड़कता रहता है. हार्ट में चार कमरे या 4 चैंबर्स होते हैं. उपर वाले चैंबर्स को एट्रिया कहते हैं. एक बायां और एक दायां. इसी तरह नीचे दो कमरे होते हैं जिसे बायां और दायां वेंट्रिकल्स कहा जाता है. पूरे शरीर का बिना ऑक्सीजन वाला खून उपर के दाएं कमरे में आता है जबकि बाएं एट्रिया में फेफड़े से शुद्ध खून आकर जमा रहता है. अब यह समझिए कि हार्ट कैसे काम करता है. दिल के दाहिने एट्रियम यानी ऊपरी कमरे के कोने में एक नेचुरल स्पार्क प्लग होता है. इसे साइनोएट्रियल नोड कहते हैं. यही नेचुरल पेसमेकर होता है. इसमें अपने आप बिजली का झटका पैदा होता है. जैसे ही बिजली का झटका बनता है उपर का दोनों कमरा सिकुड़ जाता है. इन एट्रयिम के सिकुड़ते ही बाएं कमरे में फेफड़े से आया शुद्ध खून नीचे वाले वेंट्रिकल कमरे में आ जाता है. वहीं दाये एट्रियम वाले कमरे में शरीर के विभिन्न हिस्से से आया अशुद्ध खून और कार्बनडायऑक्साइड नीचे वाले दायें वेंट्रिकल में आ जाता है. अब बिजली का सिग्नल नीचे आने से पहले बीच में बने एक स्टेशन पर पहुंचता है ताकि ऊपर का सारा खून सही से नीचे के कमरों में भर जाए. इसके बाद नीचे वाले दोनों कमरे में सिग्नल पहुंचता है. नीचे जैसे यहां सिग्नल पहुंचता है दोनों वेंट्रिकल्स जोर से सिकुड़ता है. इनके सिकुड़ते ही बाएं हिस्से में जमा शुद्ध खून पूरे शरीर में जोर से पंप हो जाता है जबकि दाएं वाला अशुद्ध खून फेफड़े में दोबारा से ऑक्सीजन भरने के लिए चला जाता है.
एट्रियल फिब्रिलेशन है क्याडॉ. अपर्णा जायसवाल कहती हैं कि हार्ट का यह क्रम जिंदगी भर बिना रूके और थके अपनी गति से चलता रहता है. एक सामान्य हार्ट एक मिनट में करीब 60 से 100 बार धड़कता है. लेकिन जब किसी को एट्रियल फिब्रिलेशन (AFib) की बीमारी होती है तो धड़कन अनियमित हो जाती है. मतलब हार्ट में जो इलेक्ट्रिक सिग्नल है वह नियत समय पर स्पार्क करने के बजाय बहुत तेज गति से और बिना किसी नियम से स्पार्क होने लगता है. इसका नतीजा यह होता है कि हार्ट की धड़कनें भी बहुत ज्यादा आगे-पीछे करने लगती है. इसमें आमतौर पर एक मिनट में दिल 450 से 600 बार धड़कता है. इससे एट्रिया के सिकुड़न की गति बुरी तरह प्रभावित होने लगती है.
दिल की धड़कन क्यों अनियंत्रित हो जाती हैडॉ. अपर्णा जायसवाल कहती हैं कि वैसे तो इसका मुख्य कारण उम्र है. यानी जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है एट्रिया में परिवर्तन होने लगता है. ठीक वैसे ही जैसे हमारी स्किन में झुर्रियां आने लगती है. इस बदलाव का असर हार्ट के इलेक्ट्रिक सिग्नल पर भी देखा जा सकता है. उम्र के अलावा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां, स्लीप एप्निया सिंड्रोम और कोरोनरी हार्ट डिजीज आदि के कारण भी हार्ट के इलेक्ट्रिक सिग्नल में दिक्कत हो सकती है और उससे एट्रिया फिब्रिलेशन की बीमारी हो सकती है. जिन लोगों में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, फेफड़ों की बीमारी और स्लीप एपनिया जैसी बीमारियां हैं उन लोगों को इस बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है. वहीं कुछ मामलों में यह जेनेटिक भी हो सकता है. इसके लिए किसी बीमारी की जरूरत नहीं होती है.
भारत में क्यों बढ़ रही है यह बीमीरडॉ. अपर्णा जायसवाल के मुताबिक भारत में एट्रियल फिब्रिलेशन (AFib) के मामले बढ़ते जा रहे हैं. इसकी मुख्य वजह लोगों में उम्र का बढ़ना है. AFib मुख्य रूप से बुजुर्गों में होने वाली बीमारी है और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां इसके खतरे को और बढ़ा देती हैं. भारत की आबादी की औसत उम्र बढ़ रही है. लोग ज्यादा लंबा जीवन जी रहे हैं और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसे में आने वाले समय में AFib से प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ने की आशंका है. अनुमान के मुताबिक 60 साल की उम्र में करीब 3–4 प्रतिशत लोगों और 80 साल की उम्र में लगभग 8 प्रतिशत लोगों में एट्रियल फिब्रिलेशन विकसित हो सकता है. इसलिए AFib को मुख्य रूप से उम्रदराज लोगों में होने वाली बीमारी माना जाता है.
क्या AFib से मौत का खतरा बढ़ जाता हैनिश्चित रूप से एट्रियल फिब्रिलेशन गंभीर बीमारी है. कई बार अचानक इसमें स्ट्रोक ही आ जाता है. AFib के कारण होने वाले स्ट्रोक अक्सर काफी बड़े होते हैं. इसमें बचने के बाद भी मरीज के अपंग होने का खतरा ज्यादा रहता है. इतना ही नहीं AFib में हार्ट फेल्योर का खतरा भी ज्यादा रहता है जिसमें मौत का जोखिम बड़ जाता है.
AFib के लक्षण खुद से कैसे पहचानेंअगर व्यक्ति की धड़कन तेज या अनियमित है, व्यक्ति को चलने में कठिनाई होती है, सांस फूलता है, थकान रहती है तो ऐसे मरीजों को तुरंत जांच की आवश्यकता पड़ सकती है. ऐसे मरीज देर न करें तुरंत डॉक्टर से मिलें. इसका सबसे आम लक्षण दिल का बहुत तेज धड़कना है. इसे कोई भी पहचान सकता है. हालांकि, कुछ लोगों में कोई लक्षण दिखाई ही नहीं देता. उन्हें पता भी नहीं होता कि उन्हें AFib है और कई बार इस बीमारी का पहला संकेत स्ट्रोक के रूप में सामने आता है.
AFib के लिए कौन सा जांच हैएट्रियल फिब्रिलेशन की जांच के लिए सबसे पहले ECG (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) किया जाता है. इसके बाद होल्टर मॉनिटर की मदद से कुछ समय तक हार्ट की धड़कनों को परखा जाता है. जरूरत पड़ने पर एक्सटेंडेड लूप रिकॉर्डर का इस्तेमाल किया जा सकता है. यह मूल रूप से लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाने वाला होल्टर मॉनिटर है, जो 3,5, 7 या 15 दिनों तक हार्ट की रिदम रिकॉर्ड कर सकता है. कुछ मरीजों में इंसर्टेबल लूप रिकॉर्डर भी लगाया जाता है जो 3 से 5 साल तक हार्ट की धड़कन और रिदम की निगरानी कर सकता है.
AFib से कैसे बचा जाएएट्रियल फिब्रिलेशन से बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि लाइफस्टाइल को सही किया जाए. रोजाना एक्सरसाइज, योग, मेडिटेशन और सही खान-पान इस बीमारी से बचने का सबसे बेहतर तरीका है. व्यक्ति अगर खुद को हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज से बचा के रखें तो इस बीमारी के होने का खतरा कम हो जाता है. इसलिए साल में एक बार इन सबकी जांच जरूर करानी चाहिए. इसके साथ ही कोरोनरी आर्टरी डिजीज से बचाव भी महत्वपूर्ण है. अगर यह बीमारी हो जाती है तो उसका उचित इलाज कराना चाहिए.
डॉक्टर के पास कब जाएअगर आपको लगता है कि आपको एट्रियल फिब्रिलेशन हो सकता है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. इस स्थिति को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है, क्योंकि कई बार AFib का पहला संकेत स्ट्रोक या हार्ट फेलियर हो सकता है. इसलिए, AFib का संदेह होने पर बिना देरी के डॉक्टर से दिखाना चाहिए.



