अपने तो ‘अपने’ होते हैं, कार्यकर्ताओं का क्या? नेताओं ने लगा दी रिश्तेदारों की लाइन

जयपुर. राजस्थान में पंचायत चुनाव की सियासत में एक बार फिर परिवारों का दबदबा चर्चा में है. गांवों की सरकार में जगह बनाने के लिए नेताओं ने अपने बेटे-बेटियों, पत्नियों, बहनों और दूसरे रिश्तेदारों को चुनावी मैदान में उतारा है. जिला प्रमुख की कुर्सी हो या पंचायत समिति के प्रधान का पद, कई जगह दिग्गज नेताओं के परिवार के सदस्य दावेदारी कर रहे हैं. भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सालों तक पार्टी का झंडा उठाने, चुनाव प्रचार करने और बूथ संभालने वाले कार्यकर्ताओं का नंबर कब आएगा?
पंचायत चुनाव नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने का मौका माने जाते हैं, लेकिन नेताओं के रिश्तेदारों की दावेदारी ने परिवारवाद बनाम कार्यकर्ता की बहस को फिर तेज कर दिया है. हालांकि, किसी नेता का रिश्तेदार होना जीत की गारंटी नहीं है. उम्मीदवार की योग्यता और जनसमर्थन भी मायने रखते हैं, लेकिन टिकट वितरण में आम कार्यकर्ताओं को मिलने वाले अवसरों पर सवाल जरूर उठ रहे हैं.
जिला प्रमुख की कुर्सी पर भी रिश्तेदारों की नजर
जिला प्रमुख पद की दावेदारी में कई बड़े नेताओं के परिजन शामिल हैं. नागौर में मंत्री डॉ. मंजू बाघमार की जेठ की बेटी श्वेता पंवार भाजपा से चुनाव लड़ रही हैं. इसी जिले में कांग्रेस की पूर्व विधायक मंजू मेघवाल के जेठ शंकरलाल भी कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं. सीकर में भाजपा जिलाध्यक्ष मनोज बाटड़ की पत्नी गणपति और भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष हरिराम रणवां के छोटे भाई की पत्नी सुनीता रणवां चुनाव लड़ रही हैं.
बांसवाड़ा में कांग्रेस विधायक अर्जुन बामनिया के बेटे विकास बामनिया मैदान में हैं. कोटा में देहात कांग्रेस जिलाध्यक्ष भानुप्रताप सिंह की पत्नी निकिता कांग्रेस से, जबकि पूर्व जिला परिषद सदस्य डॉ. बद्री गोचर की पत्नी रंजना गोचर भाजपा से चुनाव लड़ रही हैं. बीकानेर में पूर्व मंत्री गोविंदराम मेघवाल की बेटी सरिता चौहान कांग्रेस की उम्मीदवार हैं. भीलवाड़ा में पूर्व मंत्री कालूलाल गुर्जर की पत्नी सरोज देवी गुर्जर भाजपा से चुनावी मैदान में हैं. इन नामों से साफ है कि जिला परिषद की राजनीति में भी नेताओं के परिवार अपनी जगह बनाने में जुटे हैं.
कहीं पत्नी-बेटा, कहीं बहन और भतीजी मैदान में
पंचायत समिति प्रधान पद की दावेदारी में भी नेताओं के परिवार पीछे नहीं हैं. नागौर में सांसद हनुमान बेनीवाल की बहन डाकू देवी आरएलपी से चुनाव लड़ रही हैं. श्रीमाधोपुर में यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा की पत्नी शांति देवी और बेटे अजय खर्रा भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परिवार का एक बेटा निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर भी पंचायत समिति सदस्य का चुनाव लड़ रहा है. सीकर जिले के खंडेला में पूर्व केंद्रीय मंत्री महादेव सिंह खंडेला की पत्नी पार्वती कांग्रेस से चुनाव लड़ रही हैं.
पिपराली में सैनिक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष प्रेमसिंह बाजौर के भाई बाबूसिंह बाजौर भाजपा के उम्मीदवार हैं. बीकानेर के छत्तरगढ़ में पूर्व मंत्री गोविंदराम मेघवाल के बेटे गौरव चौहान कांग्रेस से मैदान में हैं. वहीं डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा में विधायक शंकरलाल डेचा की बेटी शांति डेण्डोर और पूर्व सांसद कनकमल कटारा की भतीजी वर्षा कटारा भाजपा से चुनाव लड़ रही हैं. सीमलवाड़ा में पूर्व सांसद ताराचंद भगोरा के बेटे महेंद्र भगोरा कांग्रेस से मैदान में हैं. आहड़ा में पूर्व जिला प्रमुख माधवलाल बरहट की पत्नी नीरूदेवी बरहट और आसपुर में पूर्व विधायक गोपीचंद मीणा के बेटे जितेंद्र मीणा भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं.
नागौर से उदयपुर तक परिवारों की सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश
नागौर जिला परिषद के वार्ड 15 से पूर्व विधायक सुखराम नेतड़िया भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. उदयपुर जिले में मावली विधायक पुष्कर लाल डांगी के बेटे शांतिलाल जिला परिषद सदस्य का चुनाव लड़ रहे हैं. उन्हें जिला प्रमुख पद का दावेदार भी बताया गया है. इससे पता चलता है कि पंचायत चुनाव कई राजनीतिक परिवारों के लिए स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर भी हैं. हालांकि, टिकट मिलने से जीत तय नहीं होती. उम्मीदवारों को मतदाताओं का भरोसा जीतना होगा. लेकिन जब टिकट वितरण में नेताओं के परिजनों के नाम सामने आते हैं, तो लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है.
अब जनता की अदालत में होगा फैसला
राजनीतिक दलों में कार्यकर्ता चुनाव की सबसे अहम कड़ी होते हैं. वे घर-घर प्रचार करते हैं, बूथों पर जिम्मेदारी संभालते हैं और पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय रहते हैं. पंचायत चुनाव उनके लिए स्थानीय राजनीति में आगे बढ़ने का बड़ा अवसर होते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वर्षों की मेहनत और संगठन के प्रति निष्ठा टिकट पाने का आधार बनती है, या कई जगह राजनीतिक रसूख ज्यादा असरदार साबित होता है? राजस्थान पंचायत चुनाव 2026 में भाजपा, कांग्रेस और आरएलपी से जुड़े नेताओं के परिजनों की दावेदारी ने परिवारवाद बनाम कार्यकर्ता की बहस को फिर हवा दी है. अब मतदाता तय करेंगे कि राजनीतिक परिवारों का प्रभाव कितना काम आता है और स्थानीय काम, जनसंपर्क तथा उम्मीदवार की छवि कितनी अहम साबित होती है. फिलहाल सवाल यही है कि पार्टी के लिए मेहनत कार्यकर्ता करे, लेकिन चुनाव लड़ने का मौका नेताओं के रिश्तेदारों को मिले, तो आम कार्यकर्ता आखिर जाए कहां?



