आखिर क्या कर रहे हैं राज्य ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक और कोटा के प्रहलाद मीणा? मई की मौतों से अब तक नहीं मिला जवाब

कोटा. राजस्थान में प्रसूताओं की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है. मई से जून के बीच कोटा, बीकानेर, बांसवाड़ा और भीलवाड़ा समेत कई जगहों पर प्रसव के बाद महिलाओं की मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे. उस समय दवाओं की गुणवत्ता से लेकर अस्पतालों में संक्रमण और इलाज के तरीके तक, कई पहलुओं की जांच हुई. कमेटियां बनीं, डॉक्टरों पर कार्रवाई हुई और जांच रिपोर्टों के आधार पर कुछ निष्कर्ष भी सामने आए. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन मौतों की वजह क्या थी और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था ने क्या ठोस कदम उठाए?
अब कोटा में एक बार फिर प्रसूताओं की मौत का मामला सामने आने के बाद वही सवाल फिर उठने लगे हैं. जांच में सामने आया कि सिजेरियन डिलीवरी के बाद महिलाओं को इंजेक्शन लगाए जाने के तुरंत बाद तेज कंपकंपी छूटने लगी थी. इसके बाद ड्रग विभाग ने संबंधित इंजेक्शन समेत छह दवाओं के इस्तेमाल और सप्लाई पर रोक लगा दी. इन दवाओं के सैंपल लेकर जांच के लिए भेजने की तैयारी है. यानी एक बार फिर शक दवाओं पर है. ऐसे में राज्य ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक और कोटा के ड्रग कंट्रोलर प्रहलाद मीणा की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है. क्या विभाग समय रहते दवाओं की गुणवत्ता और सप्लाई की निगरानी कर रहा था? क्या अस्पतालों में इस्तेमाल हो रही दवाओं की जांच की गई थी? और अगर जांच हुई थी, तो फिर ऐसे हालात दोबारा कैसे बने?
कोटा कांड के बाद छह दवाओं पर रोक, लेकिन यह नौबत फिर आई ही क्यों?कोटा में हालिया घटना के बाद ड्रग विभाग ने छह दवाओं के खास बैच की सप्लाई और इस्तेमाल पर रोक लगाई है.
दो बैच के मेरोपेनम इंजेक्शन
एनएस 100 एमएल
हाइड्रोकोर्टिसोन सोडियम सक्सीनेट इंजेक्शन
डोपामाइन हाइड्रोक्लोराइड इंजेक्शन
पैरासिटामोल इन्फ्यूजन शामिल हैं.
विभाग की ओर से इन दवाओं के सैंपल लिए गए हैं, जिन्हें लैब में जांच के लिए भेजा जाना है. यह कदम जरूरी है, क्योंकि जब किसी दवा या इंजेक्शन के इस्तेमाल के बाद मरीजों की हालत बिगड़ने की बात सामने आती है, तो उसकी गुणवत्ता और बैच की जांच होना जरूरी है. लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी है. क्या केवल सप्लाई रोक देने से जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? अगर लैब रिपोर्ट में किसी दवा का बैच मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो आगे कार्रवाई किसके खिलाफ होगी? निर्माता, सप्लायर, खरीद प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी या निगरानी करने वाले विभाग के खिलाफ? और अगर सभी दवाएं मानकों के अनुरूप पाई जाती हैं, तो फिर महिलाओं की हालत बिगड़ने की वजह क्या थी? क्या संक्रमण की आशंका की जांच होगी, अस्पताल में दवाओं को रखने और इस्तेमाल करने के तरीके की पड़ताल होगी या दूसरे कारणों पर ध्यान दिया जाएगा?
मई में भी दवाओं पर उठे थे सवाल, फिर क्या निकला?कोटा में पहले हुई प्रसूताओं की मौतों के बाद भी दवाओं की गुणवत्ता पर संदेह जताया गया था. उस समय अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का एक बैच गुणवत्ता जांच में फेल पाया गया था. लेकिन जांच कमेटियों को ऐसा ठोस सबूत नहीं मिला, जिससे उस इंजेक्शन को प्रसूताओं की मौतों का मुख्य या एकमात्र कारण माना जा सके. घटना के शुरुआती दौर में एक आईवी फ्लूइड पर भी संदेह जताया गया था. हालांकि, उसकी पिछली जांच रिपोर्ट में वह तय मानकों के अनुरूप पाया गया था. इससे यह साफ होता है कि किसी दवा पर संदेह होना और उसी दवा से मौत होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. किसी बैच का जांच में फेल होना गंभीर मामला है, लेकिन मौतों से उसका सीधा संबंध साबित करने के लिए अलग से ठोस जांच जरूरी है. अब फिर कोटा में दवाओं के छह बैच संदेह के घेरे में हैं. ऐसे में सवाल यह नहीं कि दवाओं की जांच क्यों हो रही है, बल्कि यह है कि पहले की घटनाओं के बाद निगरानी व्यवस्था में क्या बदलाव किए गए? क्या अस्पतालों तक पहुंचने वाली दवाओं के बैच की जांच और रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था मजबूत हुई? क्या संदिग्ध दवाओं की पहचान के लिए कोई साफ प्रक्रिया तय की गई? और क्या पुराने मामलों से मिले सबक को जमीन पर लागू किया गया? अगर इन सवालों के जवाब उपलब्ध नहीं हैं, तो विभाग की कार्यपरणाली की समीक्षा जरूरी हो जाती है.
राज्य ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक और कोटा के प्रहलाद मीणा क्या कर रहे?दवाओं की गुणवत्ता और उनकी सप्लाई पर निगरानी ड्रग कंट्रोल व्यवस्था की अहम जिम्मेदारियों में शामिल है. ऐसे में कोटा की घटना के बाद राज्य ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक और जिले के ड्रग कंट्रोलर प्रहलाद मीणा की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं. विभाग से यह पूछना जरूरी है कि उसने अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए क्या कदम उठाए. क्या ड्रग कंट्रोलर की टीम ने संबंधित अस्पताल का पहले निरीक्षण किया था? अगर किया था, तो कब और किन दवाओं की जांच की गई? अस्पताल में इस्तेमाल हो रहे इंजेक्शन और आईवी फ्लूइड की सप्लाई किस रास्ते से हुई? संबंधित बैच की खरीद और वितरण का रिकॉर्ड क्या कहता है? क्या दवाओं के स्टॉक और बैच नंबर का मिलान किया गया? और क्या पहले की घटनाओं के बाद अस्पतालों में विशेष जांच अभियान चलाया गया था?
निगरानी भी हो रही यह सब कुछ हवाहवाई?इन सवालों का जवाब देना ही होगा. केवल यह कह देना कि दवाओं के सैंपल ले लिए गए हैं, पूरे मामले का जवाब नहीं है. असली बात यह है कि संदिग्ध दवा अस्पताल तक कैसे पहुंची, उसकी निगरानी किस स्तर पर हुई और अगर कहीं नियमों की अनदेखी हुई, तो उसे समय रहते क्यों नहीं पकड़ा गया.
पहले संक्रमण को माना गया था मुख्य वजह, फिर डॉक्टरों पर कार्रवाई क्यों हुई?मई में हुई मौतों के बाद शुरुआती जांच में अस्पताल में संक्रमण को एक अहम कारण माना गया था. डॉक्टरों की प्रारंभिक जांच और कमेटियों के निष्कर्षों में सिजेरियन ऑपरेशन की प्रक्रिया में ऐसी चिकित्सीय लापरवाही सामने नहीं आई, जिसे मौतों का सीधा कारण माना जा सके. संक्रमण के कारण मरीजों का ब्लड प्रेशर गिरने और किडनी पर गंभीर असर पड़ने की बात भी सामने आई थी. घटना के शुरुआती दौर में सरकार ने तीन वरिष्ठ डॉक्टरों को निलंबित किया था. इनमें गायनी विभाग के प्रोफेसर डॉ. बीएल पाटीदार, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. खुशबू मीणा और सर्जरी विभाग के एक डॉक्टर शामिल थे. बाद में चार जांच कमेटियों की रिपोर्ट में डॉक्टरों की चिकित्सीय लापरवाही नहीं माने जाने के बाद अक्टूबर 2026 में तीनों को निलंबन के करीब पांच महीने बाद बहाल कर दिया गया.
पूर्व में हुई घटनाओं से विभाग ने सबक क्यों नहीं ली?यह घटनाक्रम अपने आप में कई सवाल खड़े करता है. अगर जांच में चिकित्सीय लापरवाही नहीं मिली, तो शुरुआती कार्रवाई किन तथ्यों के आधार पर की गई थी? अगर संक्रमण मौतों की मुख्य वजह था, तो संक्रमण के स्रोत की पहचान कहां तक पहुंची? अस्पताल के वार्ड, उपकरणों, साफ-सफाई, दवाओं के इस्तेमाल और मरीजों की देखभाल से जुड़े पहलुओं की जांच में क्या निकला? और सबसे अहम, ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए क्या बदलाव किए गए? डॉक्टरों की बहाली अपने आप में यह साबित नहीं करती कि व्यवस्था के हर स्तर पर कोई कमी नहीं थी. इसलिए कुछ चीजें जान लेना बहुत जरूरी है. जरूरत इस बात की है कि जांच के निष्कर्ष साफ तौर पर सामने आएं और यह बताया जाए कि गलती अगर हुई, तो किस स्तर पर हुई.
पहले पांच मौतें, फिर दोबारा वही चिंता, लेकिन जिम्मेदारी किसकी?
मई से जून के बीच राजस्थान के कई जिलों में प्रसूताओं की मौतों की घटनाओं ने लोगों को चिंता में डाल दिया था. उस समय कुछ महिलाओं को हाई रिस्क श्रेणी का बताया गया था. लेकिन किसी मरीज का हाई रिस्क होना अपने आप में मौत की पूरी वजह नहीं बताता. ऐसे मामलों में यह देखना भी जरूरी होता है कि इलाज के दौरान कौन-कौन से कदम उठाए गए, संक्रमण की रोकथाम के लिए क्या व्यवस्था थी और मरीज की हालत बिगड़ने पर कितनी जल्दी जरूरी उपचार दिया गया.
कोटा ने फिर वही घटना, विभाग इतना लापरवाह कैसे?अब कोटा में फिर मौतों की खबर आने से यह सवाल और बड़ा हो गया है कि पहले की घटनाओं के बाद व्यवस्था ने क्या सीखा. क्या हाई रिस्क मरीजों की पहचान और निगरानी के लिए व्यवस्था बेहतर हुई? क्या ऑपरेशन के बाद महिलाओं की हालत पर नजर रखने के तरीके की समीक्षा की गई? क्या संक्रमण नियंत्रण के नियमों का पालन सुनिश्चित किया गया? और क्या दवाओं की सप्लाई तथा गुणवत्ता की जांच पहले से ज्यादा सख्त हुई? इन सवालों का जवाब दिए बिना हर नई घटना के बाद जांच कमेटी बनाना और सैंपल लेना लोगों की चिंता दूर नहीं कर सकता. जांच जरूरी है, लेकिन उसके साथ यह भी जरूरी है कि जांच पूरी होने के बाद नतीजे सामने आएं और सुधार की कार्रवाई दिखाई दे.
अब केवल जांच नहीं, मरीजों और तीमारदारों को साफ जवाब चाहिएकोटा की ताजा घटना में छह दवाओं के बैच संदेह के घेरे में हैं. उनकी लैब रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा कि वे तय मानकों पर खरी उतरती हैं या नहीं. लेकिन यह मामला ड्रग कंट्रोल विभाग से उसकी निगरानी व्यवस्था पर जवाब मांगने के लिए पर्याप्त है. राज्य ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक और कोटा के ड्रग कंट्रोलर प्रहलाद मीणा से यह जानना जरूरी है कि पहले की घटनाओं के बाद क्या कदम उठाए गए, संबंधित अस्पतालों का निरीक्षण हुआ या नहीं, दवाओं की गुणवत्ता और सप्लाई की निगरानी कैसे की गई. स्वास्थ्य विभाग को भी यह साफ करना होगा कि मई-जून की घटनाओं से लेकर कोटा के नए मामले तक, संक्रमण की रोकथाम, दवाओं की जांच और मरीजों की सुरक्षा के लिए क्या बदलाव किए गए. यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों की अनदेखी सामने आती है, तो कार्रवाई केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. जिम्मेदारी तथ्यों और जांच के आधार पर तय होनी चाहिए.
सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम के भरोसे का क्या?प्रसूताओं की मौत का मामला सिर्फ आंकड़ों या विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं है. हर मौत के पीछे एक परिवार है, जो अस्पताल में सुरक्षित इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचता है. लोगों को यह जानने का हक है कि आखिर हुआ क्या, उसकी वजह क्या थी और दोबारा ऐसा न हो, इसके लिए क्या किया जा रहा है. अब जरूरत केवल एक और जांच की नहीं, बल्कि ऐसे जवाब की है जो पिछली घटनाओं और मौजूदा मामले की कड़ियों को जोड़े. दवाएं सही थीं तो वजह क्या थी? दवा में गड़बड़ी थी तो वह अस्पताल तक कैसे पहुंची? संक्रमण था तो उसका स्रोत क्या था? और अगर पहले की जांचों के बाद व्यवस्था दुरुस्त कर दी गई थी, तो फिर वही चिंता दोबारा क्यों सामने आई?



