आखिर दिवाली पर क्यों पूजती हैं महिलाएं मतीरा? चंद्रमा से जुड़ी मान्यता और दो महीने तक बाजार में रहती है धूम

Last Updated:November 03, 2026, 15:24 IST
Matira Significance in Diwali: किशन नाथ बताते हैं कि मतीरे की दीपावली पर खरीदारी और पूजा करने के पीछे पुरानी मान्यता जुड़ी हुई है. पहले इस मौसम में स्थानीय स्तर पर मतीरा ही प्रमुख फल हुआ करता था. इसे चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है.
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बीकानेर. दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा तो देशभर में होती है, लेकिन बीकानेर में इस पूजा की एक परंपरा कुछ अलग और खास है. यहां दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के दौरान मतीरे को विशेष रूप से शामिल किया जाता है. महिलाएं मतीरे की पूजा करती हैं और इसे ऋतुफल के रूप में देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है. रेगिस्तान की धरती पर उगने वाला यह फल केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि बीकानेर की पुरानी परंपरा और संस्कृति का भी प्रतीक बन चुका है.
लोग इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे दरअसल, दीपावली के आसपास बीकानेर के ग्रामीण क्षेत्रों में मतीरे की पैदावार होती है. यही वजह है कि इस समय बाजारों में मतीरों की आवक बढ़ जाती है. स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले के समय में दीपावली के आसपास दूसरे फल आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे. ऐसे में स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाला मतीरा ही पूजन में ऋतुफल के रूप में शामिल किया जाता था. धीरे-धीरे यह परंपरा बन गई और आज भी लोग इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं.
दीपावली के लक्ष्मी पूजन में इसे विशेष स्थान दियास्थानीय जानकार किशन नाथ बताते हैं कि मतीरे की दीपावली पर खरीदारी और पूजा करने के पीछे पुरानी मान्यता जुड़ी हुई है. पहले इस मौसम में स्थानीय स्तर पर मतीरा ही प्रमुख फल हुआ करता था. इसे चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि मतीरे में अमृत तत्व प्राप्त करने की क्षमता होती है. यही कारण है कि दीपावली के लक्ष्मी पूजन में इसे विशेष स्थान दिया गया है.
मतीरे की अलग-अलग किस्में बाजार में पहुंच रहीउन्होंने बताया कि बीकानेर जिले के राजासर सहित कई ग्रामीण क्षेत्रों में मतीरे की खेती की जाती है. किसान मतीरे के बीजों को अन्य फसलों के साथ बोते हैं। इस मौसम में इसकी अच्छी पैदावार होती है. यहां तैयार होने वाले मतीरे आसपास के बाजारों के साथ दूसरे शहरों तक भी भेजे जाते हैं. इस बार भी मतीरे की अलग-अलग किस्में बाजार में पहुंच रही हैं.
दो महीने तक बाजार में इनकी उपलब्धता रहती मतीरे की मिठास भी उसकी खेती के तरीके पर निर्भर करती है. स्थानीय किसानों के अनुसार मोठ और बाजरे की फसल के साथ उगने वाले मतीरे ग्वार के साथ उगाए गए मतीरों की तुलना में अधिक मीठे होते हैं. यही वजह है कि लोग इनकी मांग ज्यादा करते हैं. दीपावली के आसपास इनकी बिक्री बढ़ जाती है और करीब दो महीने तक बाजार में इनकी उपलब्धता रहती है.
मतीरे को इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी-देवताओं की पूजा में षोडशोपचार पद्धति का विशेष महत्व है. इस पद्धति में सोलह प्रकार की सामग्रियों से पूजन किया जाता है. इसमें नैवेद्य के साथ ऋतु के अनुसार उपलब्ध फलों को भी अर्पित करने का विधान है. बीकानेर में मतीरे को इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है. यही वजह है कि दीपावली के अवसर पर मतीरा यहां केवल एक फल नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बन जाता है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Bikaner,Rajasthan
First Published :
November 03, 2026, 15:24 IST



