आरक्षण ने बदल दिया पूरा सियासी गणित, उलझे समीकरणों में कौन मारेगा बाजी?

कोटा. शहरी सरकार एक बार फिर चुनावी मोड में है. इस बार मुकाबला सिर्फ पार्षदों की 100 सीटों का नहीं, बल्कि उस महापौर की कुर्सी का भी है जो पहली बार OBC महिला के लिए आरक्षित हुई है. परिसीमन के बाद कोटा में दो नगर निगमों की जगह फिर एक नगर निगम बन चुका है. यहां वार्डों की संख्या 150 से घटकर 100 हो गई है. ऐसे में इस बार का चुनाव पिछले चुनाव से पूरी तरह अलग राजनीतिक गणित लेकर आया है. कोटा में महापौर का पद आरक्षित होने से पूरा गेम ही बदल गया है. इससे कई पुराने राजनीतिक समीकरण सीधे प्रभावित हुए हैं.
अब भाजपा और कांग्रेस दोनों को ऐसा चेहरा तलाशना होगा जो OBC वर्ग से हो और महिला हो. एक ऐसा चेहरा चुनाव जीतने की क्षमता भी रखता हो. संगठन में स्वीकार्य हो. अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के समीकरण साध सके और सबसे महत्वपूर्ण पार्षदों के बीच बहुमत जुटाने में सक्षम हो. स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक दोनों प्रमुख दलों में संभावित महिला चेहरों को लेकर मंथन शुरू हो गया है. हालांकि अभी तक दोनों पार्टियों ने महापौर के लिए कोई आधिकारिक नाम घोषित नहीं किया है.
100 वार्डों का यह है विधानसभावार गणित
दो नगर निगमों से एक नगर निगम बने कोटा में परिसीमन के बाद यहां का राजनीतिक भूगोल भी बदल गया है. यहां के नगर निगम में कोटा दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में 40 वार्ड आते हैं. यहां से विधायक भाजपा के संदीप शर्मा हैं. जबकि कांग्रेस की ओर से राखी गौतम प्रमुख राजनीतिक चेहरा हैं. कोटा उत्तर में 30 वार्ड हैं. यहां विधायक कांग्रेस के पूर्व मंत्री शांति धारीवाल है. उनका यहां प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है. यहां भाजपा की तरफ से विधानसभा चुनाव में प्रमुख चेहरा रहे नेताओं का संगठनात्मक प्रभाव है.
लाडपुरा और रामगंजमंडी का इलाका भी निगम क्षेत्र में हैलाडपुरा में 24 वार्ड हैं. यहां विधायक बीजेपी की कल्पना देवी हैं और कांग्रेस की तरफ से नईमुद्दीन गुड्डू जैसे नेता सक्रिय हैं. रामगंजमंडी के भी 6 वार्ड निगम में शामिल है. यह क्षेत्र शिक्षा मंत्री और भाजपा विधायक मदन दिलावर का है. वे यहां से विधायक हैं. यहां उनका प्रभाव है. यहां कांग्रेस की ओर से महेंद्र राजोरिया प्रमुख चेहरा रहे हैं. इस तरह 100 वार्डों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी कोटा दक्षिण की है. इसलिए दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के पार्षदों का समर्थन महापौर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है.
कांग्रेस ने दोनों निगमों में अपने बोर्ड बनाए थेपिछली बार 2020 के चुनाव में कोटा उत्तर में कांग्रेस ने 47 वार्ड जीते थे, जबकि भाजपा 14 सीटों पर रही. बाकी सीटों पर निर्दलीय/अन्य उम्मीदवार विजयी हुए. बोर्ड आसानी से कांग्रेस का बन गया. कोटा दक्षिण नगर निगम में कांग्रेस और भाजपा दोनों को 36-36 सीटें मिलीं थी. 8 वार्ड निर्दलियों के खाते में गए. दक्षिण में महापौर की चाबी निर्दलीयों के हाथ में चली गई थी. इस निगम में भी सत्तारुढ़ कांग्रेस बोर्ड बनाने में सफल रही थी.
राजीव अग्रवाल कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गएराजनीतिक गणित के बीच कांग्रेस ने उत्तर में मंजू मेहरा और दक्षिण में राजीव अग्रवाल भारती को महापौर बनाया. भाजपा की तरफ से दक्षिण में विवेक राजवंशी महापौर पद के प्रत्याशी थे. लेकिन पांच साल में समीकरण पूरी तरह बदल गए. राजीव अग्रवाल भारती 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. इसके बाद कोटा दक्षिण में एक असामान्य राजनीतिक स्थिति बन गई.
कोटा में वार्डों की संख्या 150 से घटकर 100 हो गई
अब फिर एक कोटा 100 वार्ड हो गए हैं. मार्च 2025 में राजस्थान सरकार ने कोटा उत्तर और कोटा दक्षिण को फिर से मिलाकर नगर निगम कोटा बनाने का फैसला किया. इसके साथ ही परिसीमन के बाद कोटा में वार्डों की संख्या 150 से घटकर 100 हो गई. कैथून नगरपालिका और तीन ग्राम पंचायतों को भी नए नगर निगम क्षेत्र में शामिल किया गया. यानी इस बार शहर की सरकार 100 पार्षदों से बनेगी. सबसे बड़ा बदलाव निगम महापौर का पद OBC महिला के लिए आरक्षित होना रहा है
किन चेहरों पर नजर?इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महापौर का पद सीधे जनता के वोट से नहीं बल्कि चुने हुए पार्षदों के बीच होने वाले चुनाव से तय होगा. इसलिए महापौर की दावेदारी के साथ-साथ पार्षदों के टिकट और चुनाव बाद की बाड़ेबंदी भी अहम होगी. फिलहाल भाजपा और कांग्रेस में OBC महिला चेहरों की तलाश चल रही है. मीडिया रिपोर्टों में कुछ पूर्व महिला पार्षदों और संगठन से जुड़ी महिलाओं के नाम चर्चा में बताए गए हैं, लेकिन साफ तौर पर कोई नाम अभी सामने नहीं आया है. यही वजह है कि इस बार असली लड़ाई ‘कौन चुनाव जीतता है’ और ‘कौन पार्षदों का समर्थन जुटाता है की भी होगी.
यूं बदलता रहा कोटा नगर निगम
2019 – एक नगर निगम को दो हिस्सों में बांटा गया.2020 – उत्तर और दक्षिण में अलग-अलग चुनाव हुए.2020-25 – दोनों निगमों में कांग्रेस का बोर्ड बना.2024 – दक्षिण के महापौर राजीव अग्रवाल भारती कांग्रेस छोड़ भाजपा में चले गए.2025 – दोनों निगमों का फिर विलय हुआ.2026 – 100 वार्डों में होगा चुनाव और महापौर का पद OBC महिला के लिए आरक्षित हुआ.
भाजपा के लिए क्या है चुनौती?भाजपा इस समय राज्य में सत्ता में है. इसके अलावा कोटा की चारों विधानसभा सीटों के राजनीतिक समीकरण में भाजपा का मजबूत प्रभाव है. लेकिन नगर निगम चुनाव विधानसभा चुनाव जैसा सीधा मुकाबला नहीं होगा. यहां टिकट वितरण, स्थानीय चेहरा, वार्ड की जातीय संरचना, पुराने पार्षदों का प्रदर्शन और बागी उम्मीदवार बड़ा फैक्टर होंगे. भाजपा ने चुनाव की तैयारी तेज करते हुए कोटा नगर निगम के लिए आनंद गर्ग को प्रभारी बनाया है. इससे संकेत है कि पार्टी चुनावी संगठन को सक्रिय कर चुकी है.
कांग्रेस के सामने है दोहरी चुनौतीकांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने की है. निकाय चुनाव से ठीक पहले कोटा कांग्रेस में संगठनात्मक स्तर पर इस्तीफों की खबरें भी सामने आई हैं. इसके बावजूद कांग्रेस के पास कोटा उत्तर में पिछले निगम चुनाव की मजबूत विरासत है. 2020 में उत्तर में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला था. अब पार्टी उसी प्रदर्शन को नए 100 वार्ड वाले निगम में दोहराने की कोशिश करेगी.
50 मौजूदा/पूर्व पार्षदों के लिए चुनावी मैदान छोटा हो गया हैभाजपा के पक्ष में सत्ता, विधानसभा स्तर पर मजबूत स्थिति और संगठनात्मक मशीनरी है. वहीं कांग्रेस के पक्ष में कोटा उत्तर में पिछला मजबूत प्रदर्शन, स्थानीय संगठन और पुराने पार्षदों का नेटवर्क है. लेकिन सबसे बड़ा फैक्टर होगा टिकट वितरण और बगावत पर पार पाना. 150 वार्ड से घटकर 100 वार्ड होने का मतलब है कि करीब 50 मौजूदा/पूर्व पार्षदों के लिए चुनावी मैदान छोटा हो गया है. इसलिए दोनों पार्टियों में टिकट को लेकर अंदरूनी खींचतान की संभावना बढ़ गई है.



