इस बार किस करवट बैठेगी गांवों की सत्ता, बीजेपी या कांग्रेस में कौन होगा काबिज?

झुंझुनूं. राजस्थान के शेखावाटी इलाके में आने वाले झुंझुनूं जिले की राजनीति का अपना अलग मिजाज रहा है. यहां के चुनावों पर सिर्फ जिले की ही नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी नजर रहती है. खासकर जिला परिषद चुनाव की बात करें तो झुंझुनूं लंबे समय तक कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है. जिला प्रमुख की कुर्सी पर भी कई दशकों तक कांग्रेस का कब्जा रहा. लेकिन 2020 में पहली बार भाजपा ने यहां अपना जिला प्रमुख बनाकर पुराने सियासी समीकरण बदल दिए.
अब पंचायत राज चुनाव को लेकर एक बार फिर सवाल खड़ा है कि क्या भाजपा जिला परिषद में अपना कब्जा बरकरार रख पाएगी या कांग्रेस पुराने गढ़ में वापसी करेगी? इस बार गांवों की सत्ता किसके हाथ में जाएगी, इसका जवाब चुनाव नतीजों से ही मिलेगा. लेकिन झुंझुनूं के जिला प्रमुखों का इतिहास बताता है कि यहां कांग्रेस की जड़ें लंबे समय तक मजबूत रही हैं और भाजपा को जिला परिषद की कुर्सी तक पहुंचने के लिए काफी इंतजार करना पड़ा.
1959 से 2020 तक कांग्रेस का दबदबा
झुंझुनूं जिला परिषद के इतिहास पर नजर डालें तो कांग्रेस का दबदबा साफ दिखाई देता है. उपलब्ध विवरण के अनुसार, 1959 में श्रीराम बासोतिया जिला प्रमुख बने थे. उनका कार्यकाल 1961 तक रहा. इसके बाद शीशराम ओला ने जिला प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली और 1961 से 1977 तक इस पद पर रहे. यानी करीब 16 साल तक जिला प्रमुख की कुर्सी पर शीशराम ओला का कब्जा रहा.
1977 से 1982 के बीच जिला परिषद में प्रशासक रहा. इसके बाद 1982 में हरदेव सिंह भारू जिला प्रमुख बने और 1988 तक पद पर रहे. फिर बृजेन्द्र सिंह ओला ने 1988 से 1991 तक जिला प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली. वर्ष 1991 से 1995 तक एक बार फिर प्रशासक का कार्यकाल रहा.
1995 में प्रह्लाद सिंह यादव जिला प्रमुख बने. वे 1999 तक इस पद पर रहे. इसके बाद 1999 से 2000 तक मदन सिंह गिल जिला प्रमुख रहे. वर्ष 2000 में बृजेन्द्र सिंह ओला दोबारा इस कुर्सी पर पहुंचे और 2005 तक जिला प्रमुख रहे.
लगातार चुनावों में कांग्रेस ने बनाए जिला प्रमुखवर्ष 2005 में डॉ. राजबाला ओला जिला प्रमुख बनीं. उन्होंने 2010 तक जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद 2010 से 2015 तक हनुमान प्रसाद जिला प्रमुख रहे. वर्ष 2015 में हुए चुनाव के बाद सुमन रायला को जिला प्रमुख बनाया गया. उनका कार्यकाल 2020 तक रहा. इस तरह 1959 से लेकर 2020 तक जिला प्रमुख की कुर्सी पर कांग्रेस का दबदबा बना रहा. इस दौरान बीच-बीच में प्रशासक भी नियुक्त रहे, लेकिन निर्वाचित जिला प्रमुखों में कांग्रेस के नेताओं का ही नाम सामने आता है. यही वजह है कि झुंझुनूं को लंबे समय तक कांग्रेस के मजबूत राजनीतिक गढ़ के रूप में देखा जाता रहा है.
2020 में भाजपा ने बदला चुनावी इतिहासझुंझुनूं जिला परिषद की राजनीति में बड़ा बदलाव 2020 में देखने को मिला. इस चुनाव में भाजपा की हर्षिनी कुलहरी जिला प्रमुख बनीं. इसके साथ ही पहली बार भाजपा जिला परिषद की इस कुर्सी पर काबिज हुई. इससे पहले उपलब्ध सूची में किसी भाजपा नेता के जिला प्रमुख बनने का जिक्र नहीं है. हर्षिनी कुलहरी 2020 से अब तक जिला प्रमुख हैं.
बहुत अहम रही है यह जीतभाजपा के लिए यह जीत इसलिए भी अहम रही, क्योंकि झुंझुनूं में लंबे समय से कांग्रेस का दबदबा रहा था. जिला प्रमुख की कुर्सी पर भाजपा की पहुंच ने जिले के सियासी समीकरण बदल दिए. अब आगामी चुनाव में भाजपा के सामने अपने इस प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती होगी. दूसरी ओर कांग्रेस के लिए यह चुनाव अपनी पुरानी राजनीतिक पकड़ वापस हासिल करने का मौका है. पार्टी के सामने सवाल यही है कि क्या वह फिर से जिला परिषद में अपना जिला प्रमुख बना पाएगी या भाजपा अपना कब्जा कायम रखेगी.
कांग्रेस के सामने पुराना गढ़ बचाने की चुनौती, भाजपा की नजर कुर्सी परझुंझुनूं की राजनीति में कांग्रेस का इतिहास मजबूत रहा है. लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी जिले में कांग्रेस का प्रभाव चर्चा में रहा है. जिला परिषद के रिकॉर्ड में भी लंबे समय तक कांग्रेस के जिला प्रमुख बनते रहे. ऐसे में कांग्रेस इस चुनाव में अपने पुराने प्रदर्शन और संगठन की ताकत के सहारे वापसी की उम्मीद करेगी. भाजपा के लिए 2020 की जीत को दोहराना अहम होगा. पार्टी ने पहली बार जिला प्रमुख की कुर्सी हासिल की थी और अब उसकी कोशिश इस जीत को आगे भी कायम रखने की होगी.
इस बार किसके हाथ आएगी गांवों की सत्ता?झुंझुनूं जिला परिषद का इतिहास कांग्रेस के लंबे दबदबे और 2020 में भाजपा की पहली जीत की कहानी बताता है. 1959 से 2020 तक उपलब्ध विवरण में कांग्रेस के जिला प्रमुखों का सिलसिला रहा, जबकि 2020 में हर्षिनी कुलहरी के जिला प्रमुख बनने के साथ भाजपा ने पहली बार यह कुर्सी हासिल की. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा इस बार भी जिला परिषद में अपना बोर्ड बनाकर जिला प्रमुख की कुर्सी बचा पाएगी या कांग्रेस अपने पुराने गढ़ में वापसी करेगी. झुंझुनूं में गांवों की सत्ता का फैसला सिर्फ एक पद की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह दोनों दलों की स्थानीय राजनीतिक पकड़ और चुनावी तैयारी की भी परीक्षा होगी.



