औरंगजेब के फरमान के बाद वृंदावन से जयपुर पहुंची थीं ठाकुरजी की मूर्तियां, जानें चौड़ा रास्ता स्थित मदन गोपाल जी मंदिर का है अनूठा इतिहास

Last Updated:October 08, 2026, 11:28 IST
Jaipur Madan Gopal Temple: जयपुर के चौड़ा रास्ता स्थित श्री मदन गोपाल जी मंदिर का इतिहास वृंदावन और उड़ीसा से जुड़ा है. मुगल बादशाह औरंगजेब ने जब मंदिरों को तोड़कर मूर्तियों को बाट के रूप में कसाइयों को देने का फरमान सुनाया था, तब मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम वृंदावन से ठाकुर जी, राधा रानी और सखी ललिता जी की अष्टधातु की मूर्तियों को सुरक्षित जयपुर लाए थे. संवत 1590 में सनातन गोस्वामी द्वारा वृंदावन में प्रतिष्ठित इन विग्रहों के लिए राधा और ललिता जी की मूर्तियां उड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र के पुत्र ने भिजवाई थीं. आज इस मंदिर में गौड़ीय संप्रदाय के अनुसार पूजा होती है.
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जयपुर. गुलाबी नगरी जयपुर अपने ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. खासतौर पर जयपुर के परकोटे यानी चारदीवारी बाजार में कई ऐसे मंदिर मौजूद हैं, जिनका सीधा संबंध भगवान श्रीकृष्ण की नगरी वृंदावन के साथ जुड़ा हुआ है. आज भी इन प्राचीन मंदिरों के प्रति श्रद्धालुओं में गहरी आस्था बनी हुई है और रोजाना हजारों की संख्या में भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. ऐसा ही एक ऐतिहासिक मंदिर जयपुर के चौड़ा रास्ता में स्थित ठाकुर जी श्री मदन गोपाल जी का है. करीब 16वीं शताब्दी से जुड़े इस प्राचीन मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधा रानी और उनकी ज्येष्ठ सखी प्रिया श्री ललिता जी के अद्भुत विग्रह विराजमान हैं.
मंदिर में कई पीढ़ियों से पूजा-सेवा कर रहे पुजारी के अनुसार, श्री मदन गोपाल जी के इस मंदिर का इतिहास वृंदावन और उड़ीसा के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है. सेवा प्रकाट्य और इष्ट लाभ नामक प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों में भी इस मंदिर और यहां के विग्रहों का विशेष उल्लेख मिलता है. ग्रंथों के मुताबिक, संवत 1590 में पूज्यपाद श्री सनातन गोस्वामी जी ने वृंदावन के महावन में रहने वाले श्री परशुराम चौबे के घर से ठाकुर जी श्री मदन गोपाल जी महाराज के दिव्य श्री विग्रह को प्राप्त किया था. इसके पश्चात माघ शुक्ल द्वितीया तिथि को वृंदावन में इस दिव्य मूर्ति की विधि-विधान से प्रतिष्ठा की गई थी.
उड़ीसा के राजकुमार को स्वप्न में मिला था दिव्य संकेतमंदिर के इतिहास से जुड़ी एक बेहद रोचक कथा उड़ीसा के राजपरिवार से भी संबंधित है. जब वृंदावन में ठाकुर जी विराजमान हुए, तब उड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र देव के पुत्र श्री पुरुषोत्तम जाना को स्वप्न में यह ज्ञात हुआ कि वृंदावन में ठाकुर जी श्री विहीन यानी अकेले विराजमान हैं. इसके बाद राजकुमार ने ठाकुर जी के साथ प्रतिष्ठित करने के लिए प्रिया श्री राधा रानी और उनकी ज्येष्ठ सखी श्री ललिता जी के अष्टधातु से निर्मित अत्यंत सुंदर विग्रह तैयार करवाकर भिजवाए, जिन्हें बाद में ठाकुर जी के साथ ही विराजमान किया गया.
औरंगजेब के क्रूर फरमान के बाद जयपुर लाई गईं मूर्तियांमुगल काल के दौरान जब बादशाह औरंगजेब ने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने और भगवान की मूर्तियों को तोड़कर उन्हें तौलने वाले बाट के रूप में कसाइयों को देने का क्रूर फरमान जारी किया, तब वृंदावन के मंदिरों पर बड़ा संकट आ गया था. उस कठिन समय में आमेर और जयपुर के तत्कालीन शासक मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम ने धर्म की रक्षा करते हुए वृंदावन के प्रमुख विग्रहों को सुरक्षित जयपुर लाकर स्थापित करवाया था. इसी क्रम में ठाकुर जी श्री मदन गोपाल, राधा रानी और सखी ललिता जी के अष्टधातु मयी विग्रहों को भी वृंदावन से जयपुर लाकर प्रतिष्ठित किया गया.
गौड़ीय संप्रदाय के अनुसार होती है सेवा-पूजापुराने समय की स्थापत्य शैली में बने इस शिखरबंध मंदिर में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अत्यंत मनमोहक और अन्य मंदिरों से बिल्कुल अलग है. इस मंदिर में गौड़ीय संप्रदाय की परंपरा के अनुसार ठाकुर जी की अष्टयाम सेवा और पूजा-अर्चना की जाती है. जयपुर के प्रमुख बाजार में स्थित होने के कारण स्थानीय भक्तों के साथ-साथ देश-विदेश से जयपुर भ्रमण पर आने वाले पर्यटक भी बड़ी संख्या में यहां दर्शन के लिए आते हैं. भक्तों के दर्शनार्थ यह ऐतिहासिक मंदिर प्रतिदिन सुबह और शाम दोनों समय खुलता है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Jaipur,Jaipur,Rajasthan
First Published :
October 08, 2026, 11:27 IST



