‘मैं कल मरने वाला हूं…’ निधन से पहले ही नाना पाटेकर की वो बात, जो आज सच हो गई

नई दिल्ली. बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे. 8 अक्टूबर 2026 को 75 साल की उम्र में गोवा में उनका निधन हो गया. उनके निधन की खबर आते ही पूरी फिल्म इंडस्ट्री में सन्नाटा छा गया. इंडस्ट्री के कई जाने-माने लोगों ने अपनी गहरी संवेदनाएं जताईं. नाना पाटेकर सिर्फ एक एक्टर ही नहीं थे, बल्कि थिएटर और सिनेमा के एक ऐसे पिलर थे जिनकी स्क्रीन पर मौजूदगी ही एक अनोखी गंभीरता भर देती थी. ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘तिरंगा’, ‘अपहरण’ और ‘वेलकम’ जैसी अनगिनत फिल्मों के जरिए, उन्होंने सीरियस ड्रामा से लेकर जबरदस्त कॉमेडी तक, हर जॉनर में अपनी महारत साबित की. गोवा में उनके आखिरी दिन और उनके शांति से चले जाने से उनके फैंस के दिलों में एक कभी न भरने वाला खालीपन आ गया है.
‘मैं कल मरने वाला हूं…’
अपने गुजरने से कुछ महीने पहले CNN- के साथ अपने एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में नाना पाटेकर ने मौत और जिंदगी के मतलब पर गहरी बातें शेयर की थीं. जिंदगी की अनिश्चितता के बारे में बात करते हुए, नाना की बातें उनके गुजरने के बाद अब और भी ज्यादा काम की और दिल को छूने वाली लगती हैं. नाना ने कहा था, ‘हम अक्सर ऐसे जीते हैं जैसे हम कभी मरने वाले ही नहीं हैं और हम अपनी जिंदगी बस चीजें जमा करने में बिता देते हैं. हम हर दिन पैसे कमाने के लिए कमर्शियल और फालतू काम करते हैं, लेकिन अगर मैं यह मान लूं कि ‘मैं कल मरने वाला हूं…’, तो मैं आज ज्यादा खूबसूरती, सादगी और शांति से जी सकता हूं.’ नाना का मानना था कि मौत का एहसास ही इंसान को ज्यादा सच्चा और बेहतर इंसान बनाता है. जब इंसान को अपनी मौत का एहसास होता है, तो वह लालच और दिखावे से दूर हो जाता है और आज के पल को पूरी तरह से जीता है.
इसी बातचीत के दौरान, नाना पाटेकर ने एक जाने-माने और असरदार एक्टर के तौर पर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी पर भी जोर दिया. उन्होंने साफ-साफ माना कि एंटरटेनमेंट और पैसे के लिए फिल्में बनाना अच्छी बात है, लेकिन एक सच्चे आर्टिस्ट का फर्ज है कि वह सिनेमा जैसे बड़े प्लेटफॉर्म का सही इस्तेमाल करे. नाना ने कहा, ‘कभी-कभी ‘वेलकम’ जैसी हल्की-फुल्की कॉमेडी फिल्में करना ठीक है. वे पैसे और एंटरटेनमेंट दोनों लाती हैं. लेकिन, जब मेरे पास सिनेमा जैसा इतना बड़ा और असरदार मीडियम है, अगर मैं इसका इस्तेमाल समाज की कड़वी सच्चाई के बारे में बोलने के लिए नहीं करता, तो एक्टर होने का कोई मतलब नहीं है.’ उनका मानना था कि सिनेमा सिर्फ बॉक्स ऑफिस कलेक्शन का जरिया नहीं है, बल्कि उन मुद्दों और दर्द को आवाज देने का एक जरिया है जिनका सामना आम लोग हर दिन करते हैं. अगर कोई आर्टिस्ट अपनी कला के जरिए समाज के दर्द को जाहिर नहीं कर सकता, तो उसकी कला अधूरी है.
नाना पाटेकर के लिए, एक्टिंग कोई प्रोफेशन या सिर्फ गुजारे का जरिया नहीं था, बल्कि अपनी अंदर की भावनाओं को जाहिर करने का एक तरीका था. वह अपने आस-पास हो रही घटनाओं से आसानी से प्रभावित हो जाते थे और कैमरे के सामने अपना दर्द बयां कर देते थे. एक इंटरव्यू में एक्टिंग की परिभाषा समझाते हुए उन्होंने कहा था, ‘हमारे आस-पास जो कुछ भी हो रहा है, अन्याय या दुख, उससे मुझे दर्द होना चाहिए. एक इंसान और एक आर्टिस्ट के तौर पर अगर मुझे दर्द महसूस नहीं होता, तो मैं एक्टिंग कैसे कर सकता हूं? और उस दर्द को दूर करने का सिर्फ एक ही तरीका है- कैमरा. कैमरे के सामने आकर हम अपनी अंदर की सच्चाई को सामने लाते हैं. एक्टिंग सच में हमारे अंदर जमा हो रही सामाजिक या निजी घुटन को दूर करने का एक तरीका है. अगर मैं उन कहानियों का हिस्सा नहीं बनता जो दिल को छू जाती हैं, तो एक्टर होने का क्या मतलब है?’
नाना पाटेकर ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कैसे आज का इंसान मौत से बेखबर, सुख और सुविधाओं के पीछे भाग रहा है. उन्होंने बहुत ही प्रैक्टिकल उदाहरणों का इस्तेमाल करके जिंदगी की पल-पल की न होने वाली बात को समझाया. नाना के शब्द थे, ‘इंसान सोचता है कि उसकी सांसें अमर हैं. हम बस जोड़ते रहते हैं, दौलत जमा करते रहते हैं और फिर एक दिन अचानक खबर आती है कि फलां इंसान की समय से पहले मौत हो गई. लोग कहते हैं, ‘अरे हम तो कल रात साथ बैठे थे, खाया-पिया, हंसे-मजाक किया, और सुबह उठे ही नहीं. जिंदगी इतनी अनिश्चित है.’ आज जब नाना पाटेकर खुद उसी अनिश्चितता का शिकार होकर दुनिया को अलविदा कह चुके हैं, तो उनकी ये बातें उनकी अपनी जिंदगी पर बिल्कुल फिट बैठती हैं.



