औरंगजेब से बचाने के लिए घास में छिपाई थी भगवान गोपीनाथ की प्रतिमा, सीकर पहुंचते ही मिला राजा का दर्जा

Last Updated:September 12, 2026, 13:39 IST
Sikar Gopinath Ji Temple: सीकर शहर के सुभाष चौक स्थित गोपीनाथजी को सीकर के राजा के रूप में पूजा जाता है. यह परंपरा 302 साल पुरानी है, जब तत्कालीन शासक राजा शिवसिंह ने उन्हें राजगद्दी सौंपकर स्वयं को उनका सेवक माना था.
Sikar News: सीकर शहर के सुभाष चौक स्थित गोपीनाथजी को सीकर के राजा के रूप में पूजा जाता है. इस संबोधन के पीछे 302 साल पुराना इतिहास छिपा है. गोपीनाथजी को यह उपाधि भक्तों ने नहीं दी, बल्कि सीकर के तत्कालीन शासक राजा शिवसिंह ने दी थी. उन्होंने बाकायदा उन्हें गोपीनाथजी को राजगद्दी सौंपकर स्वयं को उनका सेवक माना था. तभी से गोपीनाथजी को सीकर का वास्तविक शासक मानने की परंपरा शुरू हुई, जो आज तक चली आ रही है.
इतिहासकार महावीर पुरोहित के अनुसार, मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल के बिष्णुपुर स्थित गोपीनाथ मंदिर पर संकट आ गया था. वर्ष 1663 में औरंगजेब ने अपने मामा शाइस्ता खां को बंगाल का सूबेदार बनाया था. इसी दौरान काले पहाड़ को बिष्णुपुर में अधिकारी नियुक्त किया गया. मंदिर और भगवान गोपीनाथजी की मूर्ति को नुकसान पहुंचाने की आशंका के चलते मंदिर के गोस्वामी महंत ने मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का निर्णय लिया.
गोपीनाथजी की मूर्ति को मुगल सैनिकों से बचाने के लिए बेहद गोपनीय तरीके से घास के गठरों में छिपाया गया. इसके बाद बैलगाड़ी से यात्रा शुरू हुई. रास्ते में कई स्थानों पर शरण लेने में परेशानी आई, लेकिन महंत मूर्ति को बचाते हुए लगातार आगे बढ़ते रहे. करीब 1600 किलोमीटर की लंबी यात्रा के बाद यह मूर्ति सीकर तक पहुंची. सीकर पहुंचने के बाद गोपीनाथजी को शरण देने का सवाल सामने आया.
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तत्कालीन शासक राव दौलत सिंह ने औरंगजेब से टकराव की आशंका के कारण पहले असमर्थता जताई. उनका मानना था कि मुगल सत्ता से विरोध मोल लेना सीकर के लिए संकट खड़ा कर सकता है. इसी बीच उनके पुत्र युवराज शिवसिंह ने पिता को समझाया कि जो भगवान पूरी सृष्टि को शरण देते हैं, उन्हें शरण देना सौभाग्य की बात है. आखिरकार राव दौलत सिंह तैयार हुए और गोपीनाथजी को घास की कुटिया में विराजमान किया गया.
समय बीतने के साथ युवराज शिवसिंह सीकर के शासक बने. उन्होंने गोपीनाथजी के लिए भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प लिया. इसी दौरान काबुल से चांदी लेकर ऊंटों का एक काफिला सीकर होते हुए आगरा की ओर जा रहा था. शिवसिंह ने उस काफिले को अपने कब्जे में ले लिया. इससे दिल्ली दरबार नाराज हुआ और जानिसार खां के नेतृत्व में सेना को सीकर की ओर भेजने की तैयारी हुई. हालांकि जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के हस्तक्षेप से बड़ा संकट टल गया.
इस संकट के टलने को राजा शिवसिंह ने गोपीनाथजी की कृपा माना. इसके बाद उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करते हुए संवत 1781 में सुभाष चौक पर गोपीनाथजी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया. मंदिर बनने के बाद उन्होंने गोपीनाथजी को सीकर की राजगद्दी सौंप दी. शिवसिंह ने स्वयं को भगवान का शासक नहीं, बल्कि उनका सेवक माना. यहीं से सीकर में एक ऐसी राजपरंपरा शुरू हुई, जिसमें सत्ता के शीर्ष पर भगवान को माना गया.
गोपीनाथजी को सीकर का राजा घोषित किए जाने के बाद रियासत के शासकों ने स्वयं को उनका सेवक मानकर राजकीय कामकाज चलाया. राजशाही खास अवसरों पर भी भगवान की सर्वोच्चता का विशेष ध्यान रखा गया. यह परंपरा केवल राजमहल तक सीमित नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे आम लोगों की आस्था का हिस्सा बन गई. आज भी सुभाष चौक के गोपीनाथजी को श्रद्धालु सीकर के राजा’ और गोपीनाथ राजा कहकर पुकारते हैं. इस तरह 302 साल पुरानी राजपरंपरा आज भी सीकर की पहचान में जीवित है.
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September 12, 2026, 13:39 IST



