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करौली में आज भी जीवंत है 250 साल पुरानी सांझी परंपरा, श्राद्ध पक्ष में 15 दिनों तक गोबर और रंगों से सजती हैं आकृतियां

Last Updated:October 10, 2026, 12:50 IST

250 Year Old Sanji Tradition Live in Karauli: करौली में श्राद्ध पक्ष के दौरान 250 साल पुरानी ‘सांझी’ परंपरा आज भी पूरी आस्था से निभाई जा रही है. भूड़ारा बाजार और वैशाली नगर सहित कई इलाकों में महिलाएं 15 दिनों तक गाय के गोबर, रंगों और फूलों से सांझी बनाकर पूजा करती हैं. इस दौरान भजन, महिला संगीत और पारंपरिक नृत्य का आयोजन होता है. श्री मदनमोहन जी मंदिर से जुड़ी यह परंपरा करौली की लोक संस्कृति और सामूहिक एकजुटता की अनूठी मिसाल है.

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Amazon Prime DayTop Deals Insideकरौली में आज भी कायम है 250 साल पुरानी सांझी परंपराZoomKarauli News: करौली में आज भी कायम है 250 साल पुरानी सांझी परंपरा

करौली: राजस्थान के करौली जिले में आधुनिकता के इस दौर में भी सदियों पुरानी लोक संस्कृति और धार्मिक परंपराएं पूरी शिद्दत के साथ कायम हैं. करौली शहर में श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) के अवसर पर निभाई जाने वाली लगभग 250 साल पुरानी ‘सांझी’ बनाने की ऐतिहासिक परंपरा आज भी अपनी पूरी रंगत और आस्था के साथ देखने को मिल रही है. पूरे श्राद्ध पक्ष के दौरान शहर के भूड़ारा बाजार, वैशाली नगर सहित विभिन्न मोहल्लों और ग्रामीण इलाकों में महिलाएं अपने घरों के आंगन व दीवारों पर गाय के गोबर और प्राकृतिक रंगों से आकर्षक सांझी तैयार कर पूजा-अर्चना कर रही हैं.

सनातन रीति-रिवाजों और लोक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर अमावस्या तक लगातार 15 दिनों तक सांझी बनाने और उसके पूजन की परंपरा निभाई जाती है. महिलाएं और नवविवाहिताएं प्रतिदिन सुबह व शाम के समय गाय के गोबर से सुंदर कलाकृतियां उभारती हैं और फिर उन्हें रंग-बिरंगे ताजे फूलों, पत्तियों व प्राकृतिक रंगों से सजाती हैं. हर दिन सांझी को एक नया और अलग रूप दिया जाता है, जिसे देखने और पूजा करने के लिए आसपास की महिलाएं एकत्र होती हैं.

भजन, महिला संगीत और नृत्य से गूंजते हैं मोहल्लेसांझी पूजन के दौरान करौली शहर के मोहल्लों में उत्सव जैसा माहौल नजर आता है. शाम की पूजा-आरती के बाद महिलाएं समूह में एकत्रित होकर सांझी के पारंपरिक लोकगीत, भजन और महिला संगीत का आयोजन करती हैं. ढोलक की थाप पर लोकगीत गाते हुए महिलाएं नृत्य कर इस लोक आस्था को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए हुए हैं. सांझी परंपरा का समापन पितृ अमावस्या पर विशेष धार्मिक आयोजनों के साथ होता है. अंतिम दिन महिलाएं केवल रंगों और अबीर-गुलाल से भव्य सांझी बनाती हैं और हाथों में मेहंदी रचाकर नृत्य-संगीत के साथ इस उत्सव को मनाती हैं.

मदनमोहन जी मंदिर से जुड़ा है सांझी का सांस्कृतिक महत्वकरौली की इस सांझी परंपरा का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व प्रसिद्ध आराध्य देव भगवान श्री मदनमोहन जी मंदिर से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. करौली में यह लोक परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह महिलाओं को एक सूत्र में पिरोने और स्थानीय राजस्थानी संस्कृति व लोक कला को सहेजने का भी बड़ा माध्यम है. बुजुर्गों से सीखकर नई पीढ़ी की बालिकाएं और महिलाएं आज भी इस 250 साल पुरानी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को पूरे गर्व और उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही हैं.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…

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Karauli,Karauli,Rajasthan

First Published :

October 10, 2026, 12:50 IST

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