Dholpur News: 1857 की क्रांति में धौलपुर में मचा था हड़कंप, क्रांतिकारियों को रोकने के लिए बुलानी पड़ी बाहरी सेना

Last Updated:October 10, 2026, 11:24 IST
Revolution of 1857 in Dholpur: 1857 की क्रांति की गूंज धौलपुर रियासत तक पहुंची थी, जहां क्रांतिकारियों ने तोपों और बारूद पर कब्जा कर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. हालात बिगड़े तो महाराजा राना भगवंत सिंह को पटियाला से करीब 2 हजार सिख सैनिक बुलाने पड़े. जानिए तात्या टोपे, सेनापति देवहंस सुआ और धौलपुर में हुई बगावत की ऐतिहासिक कहानी.
धौलपुर. जब देश में 1857 की क्रांति की चिंगारी भड़की, तो उसकी गूंज धौलपुर रियासत तक भी पहुंची. यहां ग्वालियर और इंदौर से आए क्रांतिकारी सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. रियासत के कई सैनिकों और अधिकारियों ने भी क्रांतिकारियों का साथ दिया. हालात ऐसे बन गए कि धौलपुर में रियासत का प्रशासन अस्त-व्यस्त हो गया, आखिरकार क्रांतिकारियों को काबू में करने और व्यवस्था बहाल करने के लिए पटियाला रियासत से सेना बुलानी पड़ी. धौलपुर राजस्थान की ऐसी रियासत थी, जहां क्रांतिकारियों को दबाने के लिए बाहरी सेना की मदद लेनी पड़ी.
इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि 1857 की क्रांति का राजस्थान की अलग-अलग रियासतों में भी असर दिखाई दिया था. धौलपुर का इतिहास भी इस क्रांति से जुड़ा हुआ है. उस समय धौलपुर के महाराजा राना भगवंत सिंह के अंग्रेजी हुकूमत से अच्छे संबंध थे. वे अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। जब क्रांतिकारियों ने उनसे सहयोग मांगा, तो उन्होंने उनका साथ देने से इनकार कर दिया. इसके बाद क्रांतिकारियों ने धौलपुर रियासत की पीतल की तोपों और बारूद पर कब्जा कर लिया.
सेनापति देवहंस सुआ भी क्रांतिकारियों के साथ मिल गए
जून 1857 में क्रांतिकारी नेता तात्या टोपे करीब 5 हजार सैनिकों के साथ धौलपुर रियासत के सरमथुरा पहुंचे. उस समय अंग्रेजी हुकूमत का दबाव इतना था कि महाराजा भगवंत सिंह को तात्या टोपे के खिलाफ अभियान के लिए अपनी सेना भेजनी पड़ी. इतिहासकार अरविंद शर्मा कहते है जब धौलपुर की सेना तात्या टोपे के खिलाफ अभियान में गई, तो धौलपुर रियासत का स्थानीय प्रशासन कमजोर पड़ गया. धौलपुर की जनता के साथ रियासत के सेनापति देवहंस सुआ भी क्रांतिकारियों के साथ मिल गए. इससे अंग्रेजी हुकूमत और धौलपुर महाराज की मुश्किलें बढ़ गई. अंग्रेजों के दबाव में सेनापति देवहंस सुआ को पद से हटा दिया गया और रियासत से निष्कासित कर दिया. बाद में 1861 में उन्हें गिरफ्तार कर बनारस में फांसी दे दी गई. बिगड़ते हालात के बीच महाराज राना भगवंत सिंह ने अपने समधी पटियाला के शासक से मदद मांगी.
इसके बाद पटियाला से करीब 2 हजार सिख सैनिक धौलपुर भेजे गए यह सेना करीब छह महीने तक धौलपुर में रही. उसने क्रांतिकारियों पर दबाव बनाया और धौलपुर रियासत को दोबारा व्यवस्थित करने में मदद की. क्रांतिकारियों के कब्जे में गई तोपें और बारूद भी वापस रियासत को सौंप दिए, इसके बाद यहां सरकारी कामकाज फिर से शुरू हो सका. 1857 की क्रांति में धौलपुर के लोगों और सैनिकों की भूमिका इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इस दौरान कई लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया और देश की आजादी के लिए अपना योगदान दिया. धौलपुर की यह कहानी बताती है कि 1857 की क्रांति का असर केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं था, बल्कि छोटी रियासतों में भी इसकी गूंज सुनाई दी थी.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
और पढ़ेंLocation :
Dhaulpur,Rajasthan
First Published :
October 10, 2026, 11:24 IST



