क्यों होती है 22 गज की क्रिकेट पिच, क्या हैं इसके पीछे का साइंस, ‘गंटर्स चेन’ के इस्तेमाल से तय की गई लंबाई

नई दिल्ली. हाल ही में जापान के खिलाफ भारतीय टीम को जब स्ट्रगल करते देखा तो पहला सवाल यहीं जेहन में आया कि संजू सैमसन, अभिषेक, ईशान, श्रेयस सभी वहीं बैट लेकर गए है तो छक्के क्यों नहीं लग रहे गेंद भी वहीं है तो फिर क्या बदल गया.. जवाब है पिच यानि 22 गज की वो पट्टी जो अपना रंग बदल दे तो बड़े बड़े खिलाड़ी पसीना छोड़ देते है. अब जरा सोचिए अगर क्रिकेट की पिच 22 यार्ड की जगह सिर्फ 20 यार्ड की होती या फिर गेंदबाज और बल्लेबाज के बीच की दूरी बढ़ाकर 25 यार्ड कर दी जाती. क्या क्रिकेट का रोमांच वैसा ही रहता? शायद नहीं.
क्रिकेट में हर रन, हर गेंद और हर शॉट के पीछे पिच की लंबाई का भी बड़ा खेल है. लेकिन सवाल है कि आखिर क्रिकेट की पिच की लंबाई 22 यार्ड ही क्यों तय हुई? इसके पीछे की कहानी करीब 300 साल पुरानी है और इसकी जड़ें 18वीं सदी के इंग्लैंड में मिलती हैं. क्रिकेट की पिच की लंबाई आज पूरी दुनिया में 22 यार्ड यानी 20.12 मीटर तय है. टेस्ट हो, वनडे हो या टी20, पिच की लंबाई में कोई बदलाव नहीं होता. यही वह दूरी है, जहां एक तरफ गेंदबाज अपनी रफ्तार और स्विंग से बल्लेबाज को चुनौती देता है तो दूसरी तरफ बल्लेबाज अपने टाइमिंग, तकनीक और फुटवर्क से उसका जवाब देता है.
गंटर्स चेन से निकला 22 गज की पट्टी का रास्ता
18वीं सदी के इंग्लैंड में जमीन की पैमाइश के लिए गंटर चेन (Gunter’s chain) का इस्तेमाल किया जाता था. यह चेन 66 फीट यानी 22 गज लंबी होती थी. इसमें 100 कड़ियां होती थीं और जमीन की दूरी नापने के लिए इसे बेहद उपयोगी माना जाता था. क्रिकेट उस दौर में धीरे-धीरे संगठित रूप ले रहा था. माना जाता है कि मैदान और पिच की माप तय करने में उस समय इस्तेमाल होने वाली यही पारंपरिक माप व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण रही. 22 गज की दूरी क्रिकेट की पिच की मानक लंबाई बन गई और बाद में नियमों में इसे औपचारिक रूप से जगह मिलती चली गई. यानी आज जिस 22 यार्ड की पिच पर विराट कोहली, रोहित शर्मा, जो रूट या बाबर आजम जैसे बल्लेबाज दुनिया के तेज गेंदबाजों का सामना करते हैं, उसके पीछे आधुनिक इंजीनियरिंग से ज्यादा पुरानी ब्रिटिश माप व्यवस्था की कहानी छिपी है.
22 यार्ड की दूरी में से बैट-बॉल का बैलेंस
क्रिकेट खेल में 22 यार्ड सिर्फ एक ऐतिहासिक संयोग नहीं है. यही दूरी गेंदबाज और बल्लेबाज के बीच ऐसा अंतर पैदा करती है जिसमें गेंद को पर्याप्त गति, उछाल, स्विंग और स्पिन मिलने का मौका मिलता है, जबकि बल्लेबाज के पास गेंद को पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए बेहद सीमित समय होता है. खासकर तेज गेंदबाजों के खिलाफ यह दूरी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. गेंद लगभग 20 मीटर का सफर कुछ ही क्षणों में पूरा करती है. बल्लेबाज को गेंद की लाइन, लेंथ, गति और मूवमेंट को समझकर शॉट खेलने का फैसला लगभग तुरंत करना पड़ता है. यही वजह है कि 22 यार्ड क्रिकेट के संतुलन का एक अहम हिस्सा बन चुका है.
20 गजकी पिच होती तो?
अब जरा कल्पना कीजिए कि पिच की लंबाई 22 की बजाय 20 यार्ड कर दी जाए. गेंद बल्लेबाज तक थोड़ी जल्दी पहुंचेगी. तेज गेंदबाजों के खिलाफ बल्लेबाज के पास प्रतिक्रिया देने का समय और कम हो जाएगा. शॉर्ट लेंथ की गेंदें और ज्यादा खतरनाक लग सकती हैं, जबकि बल्लेबाजों के फुटवर्क और तकनीक की चुनौती भी बढ़ सकती है. स्पिनरों के लिए भी खेल बदल सकता है, क्योंकि गेंद के बल्लेबाज तक पहुंचने की दूरी कम होने से बल्लेबाज के पास गेंद को पढ़ने और आगे बढ़कर खेलने का समय घट जाएगा.
अगर पिच 25 गज की होती?
इसके उलट 25 यार्ड की पिच होती तो गेंद को बल्लेबाज तक पहुंचने में ज्यादा समय मिलता. बल्लेबाज को गेंद को पढ़ने के लिए थोड़ा ज्यादा वक्त मिल सकता था. तेज गेंदबाज की गति का असर कुछ हद तक अलग महसूस होता और स्पिनरों को भी गेंद को ज्यादा दूरी तय करानी पड़ती. इससे बल्लेबाज और गेंदबाज के बीच मौजूदा संतुलन बदल सकता था. यानी पिच की सिर्फ 2-3 यार्ड की लंबाई में बदलाव क्रिकेट के पूरे चरित्र को प्रभावित कर सकता है.
22 गज है पिच है गेम की जान
क्रिकेट की खूबसूरती यही है कि यहां बल्लेबाज और गेंदबाज के बीच मुकाबला बेहद छोटे से क्षेत्र में होता है. 22 यार्ड की यह दूरी सदियों के क्रिकेट इतिहास का हिस्सा बन चुकी है. आज क्रिकेट की रणनीति, तकनीक, फिटनेस और उपकरणों में कितना भी बदलाव क्यों न आ जाए, पिच की यह लंबाई अब खेल की पहचान बन चुकी है. तो अगली बार जब टीवी पर क्रिकेट मैच देखते हुए कैमरा 22 यार्ड लंबी पिच पर जाए, तो याद रखिएगा यह सिर्फ मिट्टी की एक पट्टी नहीं है. इसके पीछे 18वीं सदी के इंग्लैंड की जमीन नापने वाली एक चेन की कहानी है, जिसने क्रिकेट के सबसे अहम मुकाबले की दूरी हमेशा के लिए तय कर दी.



