आगे खड़े वसीम जाफर की कैसे छूट गई सेलेक्शन कमेटी की बस, क्या ज्यादा टेस्ट खेलना पड़ गया भारी, कैसे पवार ने जीता बाजी?

नई दिल्ली. बिना किसी अथक प्रयास के आपको बहुत कुछ मिल जाए तो किस्मत का खेल कहा जाता है और अचानक अप्रत्याशित रूप से आपको ऐसी ताकत मिल जाए जहां आप दूसरों के भविष्य को तय करने लगे तो उसे राजयोग का मिलना कहा जाता है. ऐसे में कोई ऐसा शख्स जो दोनों ताकत पाने की काबिलियत रखता हो और वो किसी ऐसे व्यक्ति को मिल जाए तो उसे क्या कहेंगे. सारे खाने टिक करने के बाद भी फैसला आपके पक्ष में ना हो तो फिर इस किसमत की मार ही कहा जाए तो गलत ना होगा.
भारत के पूर्व ओपनर वसीम जाफ़र भारतीय क्रिकेट के उन्हीं किरदारों में से एक हैं. घरेलू क्रिकेट में रनों का पहाड़ खड़ा किया, मगर टीम इंडिया में जगह कभी पक्की नहीं हुई. अब राष्ट्रीय चयन समिति का दरवाज़ा खुला, तो इस बार भी वे बाहर रह गए. उनके रिकॉर्ड ही उनके आड़े आ गए. कम खेले होते, कम रन बनाए होते तो शायद चयन समिति में होते पर शायद यहीं नियति है आप बेस्ट देकर भी पीछे रह जाते है.
सेलेक्शन कमेटी की गणित को समझिए
वसीम जाफर पर रमेश पवार कैसे भारी पड़े इसको समझने के लिए बोर्ड की गणित को समझना पड़ेगा. बीसीसीआई के नियमों के मुताबिक़ इस समिति में सबसे ज़्यादा टेस्ट खेला सदस्य अध्यक्ष होता है विज्ञप्ति में साफ़ लिखा है कि वरिष्ठता, यानी सबसे ज़्यादा टेस्ट के आधार पर प्रज्ञान ओझा समिति की अध्यक्षता करेंगे. जाफ़र के 31 टेस्ट ओझा के 24 से ज़्यादा थे. वे चुने जाते तो नियम के तहत अपने-आप अध्यक्ष बन जाते. ख़बरों के मुताबिक़ क्रिकेट एडवाइज़री कमेटी (CAC) को लगा कि विश्व कप से एक साल पहले नया अध्यक्ष आया तो समिति की मौजूदा सोच और निरंतरता पर असर पड़ेगा. चुने गए रमेश पोवार, जिनके नाम दो टेस्ट और 31 वनडे हैं. रमेश पोवार का राष्ट्रीय चयनकर्ता बनाना कई लोगों को रास नहीं आएगा. वे पहले भारतीय महिला टीम के साथ काम कर चुके हैं और तब मिताली राज के साथ उनका टकराव हुआ था. उनके कोचिंग कार्यकाल का वह वाक़ई विवादित अध्याय था, और उस फ़ज़ीहत के बाद उन्हें हटाया गय। तो इस नियुक्ति पर कुछ सवालिया निशान तो रहेंगे.
फ्यूचर में फैसले पर होगा सवाल
कुछ लोगों का मानना है कि वे पुराने ख़यालात के हैं, सोच का तरीक़ा पुराना है, इसलिए यह दाँव उल्टा भी पड़ सकता है. मुद्दा पोवार को ग़लत या जाफ़र को सही ठहराने का नहीं है मुद्दा यह है कि जब कसौटी साफ़ न हो, तो सबसे ज़्यादा नुक़सान उसी का होता है जिसके पास सबसे ठोस काग़ज़ात हों. जाफ़र ने कभी शिकायतों का शोर नहीं मचाया. खेलते हुए भी उन्होंने बस रन बनाए, और रनों से ही जवाब दिया. 2027 का विश्व कप बताएगा कि बोर्ड का दाँव सही था या नहीं पर इतिहास यह भी दर्ज करेगा कि चयनकर्ता की बस पकड़ने के लिए जो सबसे आगे खड़ा था उसी की बस छूट गई.
रिकॉर्ड्स की लड़ाई किस्मत से
बैक फुट के शानदार खिलाड़ी रहे वसीम जाफ़र को किस्मत ने कभी फ्रंटफुट पर आने ही नहीं दिया. वसीम जाफर ने भारत के लिए 31 टेस्ट खेले. 1,944 रन बने, 34.10 की औसत से, पाँच शतक और 11 अर्धशतक के साथ, जिनमें एक दोहरा शतक (212) भी शामिल है. वनडे में उन्हें सिर्फ़ दो मौक़े मिले और दो पारियों में सिर्फ 10 रन यानी इस फ़ॉर्मेट में उन्हें परखने का मौक़ा ही नहीं मिला. असली तस्वीर घरेलू क्रिकेट में दिखती है. 260 प्रथम श्रेणी मैचों में 19,410 रन, 50.67 की औसत से, 57 शतक और 91 अर्धशतक, सर्वोच्च स्कोर नाबाद 314। रणजी ट्रॉफ़ी में मुंबई से लेकर विदर्भ तक यह निरंतरता उनकी पहचान रही. घरेलू क्रिकेट में जिसकी क़द्र सबसे ज़्यादा हुई, बड़े मंच पर उसे जगह सबसे कम मिली. यह सच है कि टीम संयोजन और उस दौर की प्रतिस्पर्धा भी भूमिका निभाती है फिर भी सवाल बचता है कि इतने रनों के बाद भी जाफ़र को टिककर खेलने का भरोसा क्यों नहीं मिला.



