गांधी परिवार की बहू से लेकर कांग्रेस की सबसे ताकतवर नेता तक… सोनिया गांधी पहली बार अपनी जुबानी बताएंगी पूरी कहानी

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के बारे में पिछले 50 सालों में इतना कुछ लिखा और कहा जा चुका है कि उनकी जिंदगी अब एक खुली किताब जैसी बन गई है. उन पर लिखी गईं जीवनियों की कमी नहीं है. लेकिन यह पहला मौका है, जब सोनिया गांधी ने अपनी जिंदगी के बारे में लिखने के लिए खुद कलम उठाई है. सोनिया गांधी की आत्मकथात्मक जीवनी ‘बिलॉन्गिंग : ए जर्नी ऑफ लव’ इसी साल 10 नवंबर को रिलीज होने जा रही है, जिसकी घोषणा प्रकाशक ‘अल्फ्रेड ए. नॉप्फ’ ने की है.
बीते 5 दशकों में सोनिया गांधी का एक घरेलू महिला से एक परिपक्व भारतीय राजनेता के रूप में कायाकल्प कई लोगों को ताज्जुब में डालने वाला रहा. लेकिन उनके बेहद करीबी लोग जानते हैं कि यह बदलाव कोई यकायक नहीं हुआ. बेशक, सक्रिय राजनीतिक जीवन सोनिया की पहली पसंद कभी नहीं था. यहां तक कि वे अपने पति राजीव गांधी के राजनीति में उतरने को लेकर भी लंबे अरसे तक सहज नहीं रहीं. लेकिन इसके बावजूद यह कहना कि वे अपने शुरुआती वर्षों में सार्वजनिक जीवन की गहमा-गहमी से पूरी तरह विलग ही रही, उनके प्रति न्याय नहीं करता.
फरवरी 1968 में देश के सबसे प्रभावशाली परिवार की बहू बनते ही सोनिया गांधी का सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक प्रशिक्षण एक साथ शुरू हो गया था. अपने कड़े अनुशासन के लिए जानी जाने वालीं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की छत्रछाया में उन्होंने जो सबक सीखे, कालान्तर में वही उनकी राजनीति का सबसे बड़ा संबल बने. उस दौर में देश-दुनिया के बड़े-बड़े सियासी दिग्गज इंदिरा गांधी से मिलने उनके आवास पर आया करते थे. उन्हीं के बीच सोनिया गांधी का भी कांग्रेस के अनेक शीर्ष नेताओं से औपचारिक परिचय और मिलना-जुलना शुरू हुआ. इनमें से कई नेता ऐसे थे, जो दशकों बाद खुद सोनिया के पार्टी की कमान संभालने के समय तक सक्रिय थे.
जब पहली बार रैली में हुई थीं शामिल
वैसे तो सोनिया गांधी प्रधानमंत्री आवास में आने वाले विभिन्न राजनेताओं से यदा-कदा मिलती रहीं, लेकिन उनका असल में भारतीय राजनीति से पहली बार वास्ता 20 जून 1975 को पड़ा था. वे उस दिन दिल्ली के बोट क्लब पर करीब एक लाख लोगों की भीड़ से रूबरू हो रही थीं. यह इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस चर्चित फैसले के आठ दिन बाद का मंजर था, जिसमें रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया गया था. इंदिरा गांधी के पक्ष में एकजुटता दिखाने के मकसद से आयोजित इस रैली के मुख्य आयोजक संजय गांधी थे. उनकी दलील थी कि इस मौके पर पूरे परिवार को एकसाथ दिखना चाहिए और इसके लिए हर किसी को रैली में उपस्थित होना पड़ेगा. वहां सोनिया यह देखकर चकित थीं कि कैसे इंदिरा ने नेहरू-गांधी परिवार की सेवाओं को याद करते हुए और अपनी आखिरी सांस तक लोगों की सेवा करते रहने का संकल्प जताकर हजारों लोगों की भीड़ को मंत्रमुग्ध कर दिया था.
फ्रंटियर गांधी बने थे पहले खास मेहमान
प्रधानमंत्री आवास पर आने वाले विदेशी अतिथियों की आवभगत करने की जिम्मेदारी शुरू से ही सोनिया ने संभाल ली थी. सोनिया को भारत आए अभी केवल डेढ़ साल ही हुआ था. यह अक्टूबर 1969 की बात थी. महात्मा गांधी जन्म शताब्दी समारोह के सिलसिले में फ्रंटियर गांधी (खान अब्दुल गफ्फार खान) भारत आए थे. तब इंदिरा ने इस वयोवृद्ध गांधीवादी नेता की आवभगत और उनके भोजन आदि की देखरेख करने का खास जिम्मा सोनिया को ही सौंपा था.
रूस से रही खास आत्मीयता
खान अब्दुल गफ्फार खान के बाद सोनिया को इंदिरा और फिर राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में विश्व के अनेकानेक महत्वपूर्ण नेताओं और राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात करने अवसर मिला, जिनमें रोनाल्ड रीगन, मार्गरेट थेचर, यासेर अराफात, फिदेल कास्त्रो से लेकर बेनजीर भुट्टो तक शामिल रहे. उन्होंने इन सभी की कार्यप्रणाली को काफी नजदीक से देखा और समझा. इनके साथ इंदिरा कैसे मिलतीं, कैसे बात करतीं, इसका साक्षात अनुभव सोनिया को मिला.
लेकिन सोनिया खासतौर पर रूस (सोवियत संघ) से काफी निकटता से जुड़ी रहीं. इसकी दो वजहें थीं. एक तो उनके पिता जिन पर रूस का गहरा प्रभाव पड़ा था. उन्होंने अपनी तीनों बेटियों को रूसी नाम दिए थे – सोनिया, नादिया और अनुष्का.
दूसरी वजह थी शीत युद्धकाल में भारत सरकार के सोवियत संघ से मधुर संबंध. सोनिया को लियोनिद ब्रेझ़नेव से लेकर मिखाइल गोर्बाचेव तक, अनेक रूसी नेताओं के साथ बेहद सौहार्दपूर्ण वातावरण में मेल-मुलाकात करने का अवसर मिला. आज से करीब 15 वर्ष पहले सोनिया गांधी को तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने जन्मदिन पर एक विशेष संदेश भेजा था. मेदवेदेव, जो आज रूस की सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष और पुतिन के प्रमुख समर्थकों में गिने जाते हैं, ने अपने संदेश में लिखा था, ‘आप गांधी परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए लोकतंत्र को मजबूत करने, भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास को गति देने तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था और वैश्विक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लगातार काम कर रही हैं. इन प्रयासों के कारण आप अपने देशवासियों का विश्वास और दुनिया भर में सम्मान हासिल करने में सफल रही हैं.’
जब रूस के अनजान कस्बे की यात्रा पर गई थीं सोनिया…
कूटनीतिज्ञ से राजनेता बने नटवर सिंह ने अपनी किताब ‘वॉकिंग विद लॉयन्स : टेल्स फ्रॉम अ डिप्लोमेटिक पास्ट’ (2013 में प्रकाशित) में साल 2005 में सोनिया गांधी के साथ रूस की अपनी यात्रा का जिक्र किया है. उस समय नटवर सिंह विदेश मंत्री थे. उन्होंने बताया कि एक बैठक के बाद दोनों हेलीकॉप्टर से व्लादिमीर नाम के एक छोटे से कस्बे में गए. नटवर सिंह इस बात से हैरान थे कि सोनिया ने आखिर इस अनजाने से शहर को अपनी यात्रा के लिए क्यों चुना.
लेकिन वहां जाने के बाद उन्हें इसकी वजह समझ में आ गई. वे एक ऐसी जगह पहुंचे, जहां की मुख्य इमारत कभी एक चर्च हुआ करती थी और जिसे अब संग्रहालय में बदल दिया गया था. अंदर एक अष्टकोणीय कमरा था. उसकी एक दीवार पर कागज की छोटी-छोटी पर्चियां चिपकी हुई थीं. सोनिया उनमें बेहद रुचि ले रही थीं. वे रूसी पढ़ सकती थीं और जाहिर तौर पर किसी खास चीज की तलाश कर रही थीं.
बकौल नटवर सिंह, सोनिया ने उनसे कहा, ‘नटवर, मेरे पिता द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहां युद्धबंदी रहे थे. वे यहां से निकलकर पैदल ही इटली पहुंचे थे.’ सिंह लिखते हैं कि सोनिया उस क्षण बेहद भावुक थीं. मैं चुपचाप सुनता रहा. उस समय कोई भी टिप्पणी करना अनुचित होता.
समर्थकों और आलोचकों, दोनों को पुस्तक का इंतजार
जैसा कि अमेजन पर किताब के बारे में दी गई संक्षिप्त विषय वस्तु में इशारा किया गया है, सोनिया की यह किताब उन पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालेगी कि कैसे उनका निजी और सार्वजनिक जीवन एक-दूसर में सहजता से घुल-मिल गए.
इटली के एक छोटे-से गांव की लड़की भारत की राजनीति में कैसे आई और दुनिया भर में चर्चित शख्सियत बन गई, इसको लेकर सोनिया ने बड़ी आत्मीयता और बेबाकी से अपनी असाधारण जीवन-यात्रा को सामने रखा है. निश्चित ही, सोनिया के बारे में और भी अधिक जानने के लिए उनके समर्थकों और आलोचकों, दोनों को इस पुस्तक का इंतजार रहेगा.



