जन्म के 24 घंटे में नवजात को इस बीमारी का खतरा, लापरवाही से हो सकता है नुकसान, डॉक्टर ने दी खास सलाह

Last Updated:August 28, 2026, 15:20 IST
Dehradun News: जन्म के 24 घंटे के भीतर उभरने वाले पीलिया को पैथोलॉजिकल जॉन्डिस कहा जाता है. यह किसी अंदरूनी बीमारी, संक्रमण या मां और बच्चे के ब्लड ग्रुप के न मिलने के कारण होता है. दूसरी ओर, जन्म के 2 से 4 दिनों में दिखने वाला और 3 से 7 दिनों तक रहने वाला पीलिया फिजियोलॉजिकल जॉन्डिस कहलाता है.
देहरादून: नवजात शिशुओं में जन्म के तुरंत बाद पीलिया होना एक बेहद आम समस्या है लेकिन इसे अनदेखा करना बच्चे के स्वास्थ्य के लिए गंभीर साबित हो सकता है. यह मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है फिजियोलॉजिकल और पैथोलॉजिकल जॉन्डिस. फिजियोलॉजिकल जॉन्डिस आमतौर पर जन्म के 2 से 4 दिनों के भीतर दिखाई देता है, जो बच्चे का लिवर पूरी तरह विकसित न होने के कारण लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से बनता है और सही देखभाल या धूप सेकने से 1-2 सप्ताह में अपने आप ठीक हो जाता है.
इसके विपरीत, पैथोलॉजिकल जॉन्डिस जन्म के पहले 24 घंटों के भीतर ही उभर आता है, जो किसी अंदरूनी बीमारी, मां और बच्चे के ब्लड ग्रुप के न मिलने आरएच असंगतता या संक्रमण का संकेत होता है. नवजात शिशुओं में पीलिया की समस्या नवजात शिशुओं में जन्म के तुरंत बाद पीलिया होना एक बेहद आम समस्या है, लेकिन इसे अनदेखा करना बच्चे के स्वास्थ्य के लिए गंभीर साबित हो सकता है. अगर समय पर ध्यान न दिया जाए, तो लापरवाही के कारण शिशु को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है.
पीलिया के प्रकार और उनके कारण देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के बाल रोग विभाग के एचओडी डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि नवजात शिशुओं में मुख्य रूप से दो प्रकार का पीलिया देखा जाता है फिजियोलॉजिकल और पैथोलॉजिकल जॉन्डिस. डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि जन्म के 24 घंटे के भीतर उभरने वाले पीलिया को पैथोलॉजिकल जॉन्डिस कहा जाता है. यह किसी अंदरूनी बीमारी, संक्रमण या माँ और बच्चे के ब्लड ग्रुप के न मिलने के कारण होता है. दूसरी ओर जन्म के 2 से 4 दिनों में दिखने वाला और 3 से 7 दिनों तक रहने वाला पीलिया फिजियोलॉजिकल जॉन्डिस कहलाता है. यह नवजात का लिवर पूरी तरह विकसित न होने और लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से बनता है, जो सही देखभाल और हल्की धूप सेकने से 1-2 सप्ताह में अपने आप ठीक हो जाता है.
अभिभावकों के लिए जरूरी सावधानी और जांच डॉक्टरों के अनुसार, ज़्यादातर मामलों में यह खुद ठीक हो जाता है, लेकिन 40 से 50 प्रतिशत बच्चों में पीलिया का स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. ऐसे में इलाज की सख्त जरूरत होती है. इसी वजह से विशेषज्ञों की सलाह है कि बच्चे के जन्म के 5 दिनों के भीतर उसे बाल रोग विशेषज्ञ को जरूर दिखाएं, ताकि बिलीरुबिन के स्तर का सही समय पर आकलन किया जा सके.
गंभीर लक्षण और मस्तिष्क पर खतरा डॉ. कुमार ने बताया कि अगर शिशु की त्वचा, चेहरे या आंखों में पीलापन अधिक दिखे, बच्चा बहुत सुस्त रहे या ठीक से दूध न पी रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. शरीर में बिलीरुबिन का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाने से यह बच्चे के लिवर को प्रभावित करने के साथ-साथ मस्तिष्क को भी स्थाई नुकसान पहुंचा सकता है, जिसे ‘केर्निकटेरस’ कहा जाता है. इस स्थिति से बचाव के लिए फोटोथेरेपी जैसे उपचार समय पर शुरू करना बेहद जरूरी है.
सामाजिक भ्रांतियों और अंधविश्वास से बचें डॉ. कुमार बताते हैं कि समाज में इस बीमारी को लेकर कई मिथक फैले हुए हैं. जैसे कुछ लोगों का मानना है कि बच्चे को पीले कपड़े पहनाने से पीलिया होता है, जो पूरी तरह गलत है. इसके अलावा, कई लोग डॉक्टर के पास जाने के बजाय झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं. इस दौरान लक्षण अस्थायी रूप से कम दिखने पर लोग सोचते हैं कि बच्चा ठीक हो रहा है, जिससे इलाज में देरी होती है और स्थिति जानलेवा हो सकती है. सही जानकारी और चिकित्सीय परामर्श ही शिशु की सुरक्षा की कुंजी है.
About the Authorआर्यन सेठ
आर्यन सेठ, Hindi में डिजिटल डेस्क पर जुड़े हैं और जनवरी 2026 से उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध, प्रशासन, वायरल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर खबरें लिखते हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली से साल 2024 में…
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Dehradun,Uttarakhand
First Published :
August 28, 2026, 15:20 IST
Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.


