दिल्ली में रहते हैं तो फेफड़े नहीं अपनी किडनी भी बचाओ…रिसर्च ने चौंकाया अब डॉक्टर दे रहे सलाह

दिल्ली में अगले दो महीने बाद प्रदूषण का खतरनाक दौर शुरू होने वाला है. नवंबर आते ही दिल्ली में पार्टिकुलेट मैटर की एक चादर हवा में तन जाती है, जिससे सांस लेने में भी कठिनाइयां आती हैं. आमतौर पर लोगों को लगता है कि प्रदूषण से सांस लेने में दिक्कत होती है, फेफड़े खराब होते हैं, लेकिन हालिया स्टडी और डॉक्टरों के दावे अब एक और मुसीबत की ओर इशारा कर रहे हैं. डॉक्टरों की सलाह है कि दिल्ली में रह रहे हैं तो सिर्फ फेफड़े ही नहीं, बल्कि अपनी किडनियों को भी बचाओ.
हाल ही में स्टडी सेंटर फॉर क्रोनिक डिसीज के सिद्धार्थ मंडल के नेतृत्व में एक रिसर्च हुआ है जिसमें दिल्ली और चेन्नई के 12,271 वयस्कों को शामिल कर देखा गया कि प्रदूषण में रहने पर उनकी किडनी पर क्या असर पड़ता है. शोधकर्ताओं ने पांच साल के दौरान अलग-अलग समय पर उनकी किडनी की कार्यक्षमता जांची और उनके घर के आसपास के PM2.5 प्रदूषण के स्तर को भी जांचा. जिसमें कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं.
इस रिसर्च में पता चला है कि दिल्ली में रहने वाले लोगों की किडनी की क्षमता में चेन्नई में रहने वाले लोगों के मुकाबले 6 गुना ज्यादा गिरावट देखी गई. वहीं दिल्ली की हवा में मौजूद PM2.5 का स्तर कई गुना ज्यादा मिला है जो कि चेन्नई में कम है. रिसर्च में सामने आया है कि लगातार प्रदूषण में रहने के चलते किडनी की फिल्टर करने की क्षमता में कमी आती है और दिल्ली में इसका असर खासा खराब देखा गया है.
सिर्फ यह रिसर्च ही नहीं डॉक्टर भी लगातार इस चीज को लेकर चेतावनी देते रहे हैं. नेफ्रोलॉजिस्ट दिल्ली के प्रदूषण को किडनी के लिए खराब मानते हैं.
दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग के वाइस चेयरमेन डॉ. मनीष मलिक कहते हैं कि लोगों को लगता है कि प्रदूषण का असर सिर्फ रेस्पिरेटरी सिस्टम हार्ट या फेफड़ों पर ही पड़ता है. इससे सांस फूलती है, सांस की बीमारियां होती हैं लेकिन क्या आपको पता है कि ये आपकी किडनियों को भी चुपचाप खराब कर सकता है.
किडनी पर प्रदूषण के असर को लेकर ज्यादा बातें नहीं हुई हैं, हालांकि अभी एक शोध आया है, जिसमें बताया है कि यह किडनी को बुरी तरह डैमेज कर सकता है. आमतौर पर होता क्या है कि जो भी पार्टिकुलेट मेटर होते हैं या हैवी मैटल्स हवा में होते हैं, तो वे सांस के माध्यम से हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं. अब चूंकि जो भी गंदगी या अवशिष्ट हमारे शरीर में जाता है उसे या तो किडनी बाहर निकालती है या लिवर निकालता है.
डॉ. मलिक कहते हैं कि जब ये पीएम 2.5, पीएम 10 और हैवी मैटल्स हमारी किडनी में पहुंचते हैं तो ये सिर्फ बाहर ही नहीं निकलते, बल्कि धीरे-धीरे हमारी किडनी को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं. दूसरी एक चीज है इन्फ्लेमेशन. हवा में मौजूद प्रदूषण तत्व और धातु जब शरीर में घुसते हैं तो ये इन्फ्लेमेशन पैदा करते हैं. यानि जलन पैदा करते हैं. इससे किडनी पर लोड पड़ता है. जैसा कि शुगर से भी किडनी खराब होती है तो उसकी भी मुख्य वजह इन्फ्लेमेशन ही है.
हो सकता है कि शुरुआत में ये प्रदूषण किडनी पर इतना असर न डाले, या बहुतायत में न डाले लेकिन जो लोग नाजुक हैं, जिन्हें डायबिटीज है, बीपी की समस्या है या जिनकी उम्र ज्यादा है, उनमें ये इन्फ्लेमेशन बढ़ाने के साथ ही इन अंगों को डैमेज करने की गति बढ़ जाती है.
डॉ. मलिक कहते हैं कि प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारी के लक्षण जल्दी ही दिख जाते हैं और लोग जल्दी ही अस्पताल भी पहुंच जाते हैं, लेकिन किडनी की बीमारी के लक्षण आसानी से पता नहीं चलते और हो सकता है कि ये 2, 5 या 10 साल में जाकर पता चलें. इसलिए जरूरी है कि प्रदूषण में किडनी का भी ध्यान रखना बेहद जरूरी है. अगर आप ऐसी परिस्थितियों में रह रहे हैं तो पानी पर्याप्त मात्रा में पीएं और सालाना किडनी की जांच भी कराते रहें.
आरएमएल अस्पताल में प्रदूषण क्लीनिक देख रहे डॉ. अमित जिंदल ने बताया कि आरएमएल में पहला और एकमात्र प्रदूषण क्लीनिक संचालित किया जा रहा है. इसमें सिर्फ रेस्पिरेटरी और पल्मोनरी विभागों के डॉक्टर ही नहीं बल्कि कार्डियोलॉजी और साइकेट्री विभागों से भी एक्सपर्ट बैठते हैं. उन्होंने कहा कि दिल्ली में प्रदूषण का स्तर अभी भी काफी ज्यादा है और एक्यूआई अभी भी बहुत खराब श्रेणी में है लेकिन 1 दिसंबर को सोमवार को लगे पॉल्यूशन क्लीनिक में एक भी मरीज दिखाने नहीं आया. जबकि मंगलवार की सुबह रेस्पिरेटरी विभाग की ओपीडी में 100 से भी ज्यादा मरीज उनके सामने दिखाने के लिए खड़े थे.
ऐसे में संभव है कि प्रदूषण से सिर्फ सांसों और फेफड़ों की ही समस्या पैदा नहीं हो रही बल्कि हार्ट, न्यूरो, रूमेटोलॉजिकल और साइकोलॉजिकल असर भी पड़ रहा है लेकिन लोगों को इस बात का अंदाजा ही नहीं है कि ये सभी बीमारियां खराब हवा की वजह से भी हो सकती हैं. यही वजह है कि मरीज पॉल्यूशन क्लिनिक में इलाज लेने के बजाय पर्टिकुलर ओपीडी में पहुंच रहे हैं. मरीजों को लगता है कि पॉल्यूशन क्लीनिक में सिर्फ सांसों के ही मरीजों को जाना है.
डॉ. जिंदल कहते हैं कि इस क्लीनिक में पॉल्यूशन के असर से होने वाली किसी भी प्रकार की बीमारी के लिए एक्सपर्ट मौजूद हैं, फिर चाहे वह हार्ट की बीमारी है या आंखों के रोग या मन और स्किन की बीमारियां. कुछ रिसर्च भी बताती हैं कि खराब हवा में सांस लेने और लगातार प्रदूषक तत्वों व जहरीली गैसों को इन्हेल करने से हार्ट, ब्रेन, किडनी, लिवर सहित शरीर के सभी अंगों पर असर पड़ रहा है.



