‘नेता का बेटा नेतागिरी नहीं करेगा तो कौन करेगा’, कांग्रेस सांसद मुराली लाल के बयान से मचा सियासी बवाल

जयपुर. राजस्थान में पंचायतीराज चुनाव के बीच परिवारवाद को लेकर सियासत गरमा गई है. कांग्रेस और भाजपा के दिग्गज नेताओं के बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों के चुनावी मैदान में उतरने के बीच दौसा से कांग्रेस सांसद मुरारी लाल मीणा ने ऐसा बयान दिया है, जिसने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. शनिवार को दौसा जिले के सिकराय क्षेत्र में आयोजित एक चुनावी सभा में सांसद ने राजनीति में परिवारवाद का बचाव करते हुए कहा कि ‘किसान का बेटा खेती नहीं करेगा तो और कौन करेगा, नेता का बेटा नेतागिरी नहीं करेगा तो और कौन करेगा, आईएएस का बेटा आईएएस क्यों नहीं बनेगा, बनेगा’. सांसद का यह बयान अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.
उनके इस बयान को लेकर लोग अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. खास बात यह है कि मुरारी लाल मीणा इससे पहले अक्सर कहा करते थे कि जब तक किसान का बेटा नीति निर्माण में नहीं पहुंचेगा, तब तक किसानों का भला नहीं होगा. लेकिन अब नेताओं के परिवारों को चुनाव में टिकट देने के सवाल पर उनका यह बयान चर्चा में आ गया है. उधर, डूंगरपुर में पंचायत चुनाव के नतीजों ने भी राजनीतिक परिवारों की ताकत को लेकर दिलचस्प तस्वीर पेश की है. यहां एक विधायक के बेटे ने परिवार का तीन दशक पुराना दबदबा कायम रखा, जबकि भारत आदिवासी पार्टी के सांसद राजकुमार रोत के चाचा को उनकी गृह पंचायत में ही हार का सामना करना पड़ा.
‘नेता का बेटा नेतागिरी नहीं करेगा तो कौन करेगा’
दौसा सांसद मुरारी लाल मीणा ने सिकराय क्षेत्र में चुनावी सभा के दौरान नेताओं के परिवारों को कांग्रेस से टिकट मिलने के सवाल पर प्रतिक्रिया दी. उन्होंने किसान, नेता और आईएएस अधिकारी के बेटों का उदाहरण देते हुए राजनीति में परिवार के सदस्यों की भागीदारी का समर्थन किया. उनके बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इस पर अलग-अलग टिप्पणियां सामने आ रही हैं.
डूंगरपुर में विधायक के बेटे ने बचाया परिवार का गढ़
डूंगरपुर जिले की सागवाड़ा पंचायत समिति की डेचा ग्राम पंचायत में विधायक शंकरलाल डेचा के परिवार का दबदबा बरकरार रहा. सरपंच चुनाव में विधायक के बेटे राहुल डामोर ने जीत दर्ज की है. स्थानीय जानकारी के अनुसार, पिछले करीब 30 वर्षों से डेचा ग्राम पंचायत में विधायक शंकरलाल डेचा के परिवार का प्रभाव रहा है. राहुल डामोर की जीत के साथ परिवार ने एक बार फिर पंचायत की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी है.
सांसद राजकुमार रोत के चाचा को मिली हार
दूसरी ओर, डूंगरपुर में भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के सांसद राजकुमार रोत के परिवार को चुनावी झटका लगा है. सांसद के चाचा सोहनलाल खरवर खुनिया ग्राम पंचायत से सरपंच पद का चुनाव हार गए. उन्हें भगवतीलाल खराड़ी ने महज 15 मतों के अंतर से शिकस्त दी. खास बात यह है कि खरवर खुनिया सांसद राजकुमार रोत की गृह पंचायत है. इसके बावजूद उनके चाचा चुनाव जीतने में सफल नहीं हो सके.
पंचायत चुनाव में परिवारवाद पर छिड़ी नई बहस
राजस्थान के पंचायत चुनाव में सामने आए ये मामले राजनीतिक परिवारों की भूमिका को लेकर अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं. एक तरफ विधायक के बेटे ने परिवार का पुराना राजनीतिक गढ़ बचा लिया, तो दूसरी तरफ सांसद के चाचा को उनकी गृह पंचायत में हार मिली. इसी बीच कांग्रेस सांसद मुरारी लाल मीणा का बयान परिवारवाद की बहस को और तेज कर रहा है. इन नतीजों से यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीतिक पहचान के बावजूद चुनाव में जीत की गारंटी नहीं होती.



