न जलाएंगे, न दफनाएंगे… मौत के बाद इंसानी शरीर से बनेगी खाद, भारत के दोस्त का अजीब फैसला

मौत के बाद शरीर को दफनाया जाता है या उसका अंतिम संस्कार किया जाता है, यह तो आपने सुना होगा. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मरने के बाद शरीर को खाद में भी बदला जा सकता है? सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में अब इस तरीके को कानूनी मंजूरी मिल गई है. इसे ‘ह्यूमन कंपोस्टिंग’ या ‘टेरामेशन’ कहा जाता है. इस प्रक्रिया में शरीर को खास परिस्थितियों में प्राकृतिक तरीके से विघटित करके खाद जैसे पदार्थ में बदला जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह प्रक्रिया कैसे काम करती है और क्या यह पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं.
क्या है ह्यूमन कंपोस्टिंग?
ह्यूमन कंपोस्टिंग में मृत शरीर को खास परिस्थितियों में रखा जाता है, जहां कीड़े या वायरस उसे धीरे-धीरे टुकड़ों में तोड़ देते हैं. इस प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में ‘नेचुरल ऑर्गेनिक रिडक्शन’ भी कहा जाता है.
ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स राज्य ने इस तरीके को कानूनी अनुमति दी है. इसके साथ ही वह ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है. हालांकि, वहां इस प्रक्रिया की सुविधाएं शुरू होने में अभी समय लगेगा. इसके 2029 से पहले शुरू होने की संभावना नहीं है.
कैसे काम करती है यह प्रक्रिया?
इस प्रक्रिया में मृत शरीर को प्राकृतिक कपड़े में लपेटकर एक खास पात्र में रखा जाता है. इस पात्र में लकड़ी के छोटे टुकड़े, सूखा भूसा और अल्फाल्फा जैसी जैविक सामग्री डाली जाती है. ये चीजें शरीर के विघटन के लिए जरूरी नमी और हवा बनाए रखने में मदद करती हैं.
इसके बाद तापमान को करीब 55 से 70 डिग्री सेल्सियस के बीच रखा जाता है. नमी और ऑक्सीजन को भी नियंत्रित किया जाता है. इससे शरीर के ऊतक तेजी से विघटित होते हैं. साथ ही, इस प्रक्रिया में बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों को खत्म करने में भी मदद मिलती है.
करीब दो से तीन महीने में खाद जैसा पदार्थ तैयार हो सकता है. इसमें पौधों के विकास में मदद करने वाले पोषक तत्व होते हैं. हालांकि, शरीर का हर हिस्सा पूरी तरह नहीं गलता. हड्डियों और दांतों को अलग से छोटे टुकड़ों में बदलना पड़ सकता है. शरीर में मौजूद कृत्रिम जोड़, स्क्रू और अन्य प्रत्यारोपण जैसी चीजों को भी हटाना जरूरी होता है.
पारंपरिक अंतिम संस्कार से कितना अलग
अब तक अंतिम संस्कार के लिए मुख्य रूप से शव को दफनाने और दाह संस्कार करने के तरीके अपनाए जाते रहे हैं. लेकिन इन तरीकों को लेकर पर्यावरण से जुड़ी कुछ चिंताएं भी हैं.
पारंपरिक दफन में ताबूत, शव को सुरक्षित रखने वाले रसायन और कब्रिस्तान के लिए जमीन की जरूरत पड़ती है. वहीं, दाह संस्कार में ईंधन का इस्तेमाल होता है और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें निकलती हैं.
प्राकृतिक दफन में शरीर को बिना रसायनों के मिट्टी में दफनाया जाता है. इसके लिए प्राकृतिक कपड़े या आसानी से मिट्टी में मिलने वाले ताबूत का इस्तेमाल किया जा सकता है.
टेरामेशन में भी शरीर के प्राकृतिक विघटन की प्रक्रिया का इस्तेमाल होता है, लेकिन इसे नियंत्रित परिस्थितियों में तेजी से पूरा किया जाता है. हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह तरीका बाकी सभी विकल्पों से बेहतर है.
कब शुरू हुई थी ह्यूमन कंपोस्टिंग?
ह्यूमन कंपोस्टिंग की शुरुआत अमेरिका में कैटरीना स्पेड ने की थी. उन्होंने 2014 में ‘अर्बन डेथ प्रोजेक्ट’ शुरू किया था. बाद में उन्होंने ‘रिकंपोज’ नाम से पर्यावरण-अनुकूल अंतिम संस्कार सेवा शुरू की.
अमेरिका के 14 राज्यों में अब मानव कंपोस्टिंग की अनुमति है. ऑस्ट्रेलिया में भी इस तरह की सुविधाएं शुरू करने की तैयारी चल रही है. न्यू साउथ वेल्स में कानून बनने के बाद इस विकल्प को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया है. हालांकि, इसके लिए जरूरी नियमों और विशेष सुविधाओं को तैयार करना होगा.
क्या यह पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प है?
इस सवाल का जवाब अभी पूरी तरह साफ नहीं है. पारंपरिक दफन, दाह संस्कार, प्राकृतिक दफन और टेरामेशन, सभी के अपने फायदे और नुकसान हैं. किसी एक तरीके को सबसे ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल बताने के लिए अभी पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.
टेरामेशन में शरीर से खाद जैसा पदार्थ बनता है, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभावों की दूसरे तरीकों से तुलना करना जरूरी है. इसके अलावा, धार्मिक मान्यताओं, सांस्कृतिक परंपराओं और परिवार की इच्छाओं का भी ध्यान रखना पड़ता है.
आखिरकार, मृत्यु के बाद शरीर के साथ क्या किया जाए, यह हर व्यक्ति का निजी फैसला है. जरूरी है कि लोग उपलब्ध विकल्पों के बारे में जानकारी रखें और अपनी इच्छा परिवार के साथ पहले ही साझा करें. इससे परिवार को मुश्किल समय में फैसला लेने में मदद मिल सकती है.



