न बोल सकते हैं, न देख सकते हैं, फिर भी हुनर में नहीं किसी से कम, कोटा के बच्चों की अनोखी दिवाली

Last Updated:November 06, 2026, 06:51 IST
Kota Disabilities Children Talent: दीपावली पर बाजारों में तरह-तरह के सजावटी सामान बिक रहे हैं, लेकिन कोटा में कुछ ऐसे बच्चे भी हैं जो अपने हाथों से तैयार किए सामान के जरिए लोगों के घर रोशन करना चाहते हैं. एलबीएस शिक्षा समूह के मूक-बधिर और दृष्टिहीन बच्चे इस बार फैंसी दीपक, पूजा थालियां, झालर और बंदरवाल बना रहे हैं. इन उत्पादों को बाजार से कम कीमत पर बेचा जा रहा है. खास बात यह है कि बिक्री से मिलने वाली राशि सीधे बच्चों के बैंक खातों में जमा होती है. संस्था बच्चों को निशुल्क शिक्षा, किताबें, यूनिफॉर्म और व्यावसायिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराती है. मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए आर्ट थेरेपी भी कराई जाती है. कोविड काल में शुरू हुई इस पहल का मकसद विशेष बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है. संस्था ने लोगों से अपील की है कि वे बच्चों के बनाए दीपक और सजावटी सामान खरीदकर उनका हौसला बढ़ाएं.
कोटा. शहर में दीपावली की रौनक चरम पर है. बाजार सजे हैं और लोग खरीदारी में जुटे हैं. इसी बीच महावीर नगर विस्तार योजना क्षेत्र के एक विशेष स्कूल में बच्चे चुपचाप दूसरों के घर रोशन करने की तैयारी में लगे हैं. कोई रंगों से खेल रहा है, कोई दीपक गढ़ रहा है, तो कोई पूजा थाली सजा रहा है. एलबीएस शिक्षा समूह के चेयरमैन कुलदीप माथुर ने बताया कि समूह की ओर से संचालित मूक बधिर और दृष्टिहीन बच्चे हैं जो कक्षा 1 से 8 तक है शिक्षा, खेलकूद और व्यावसायिक प्रशिक्षण पूरी तरह नि:शुल्क रहता हैं. संस्था बच्चों को यूनिफॉर्म और किताबें भी नि:शुल्क उपलब्ध कराती है.
साथ ही बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए आर्ट थेरेपी का सहारा लिया जाता है, जिससे उनका छिपा हुनर सामने आता है. रक्षाबंधन पर बच्चों के बनाई हुई राखियां बेचीं गई, पिछले साल भी दीपावली पर दीपक और सजावटी सामान की बिक्री से 11,000 रुपए की आय हुई थी ओर अभी यह बच्चे दिवाली के लिए दिए तैयार कर रहे हैं, जिससे यह दूसरों के घरों को रोशन करेंगे. दीपकों को बेचकर जो राशि आती है वो सीधे बच्चों के बैंक खातों में जमा कराई जाती है. बच्चों ने इस बार फैंसी दीपक, पूजा थालियां, झालर, बंदरवाल और अन्य डेकोरेटिव आइटम तैयार किए हैं, जो बाजार से कम दरों पर बेचे जा रहे हैं.
कोविड काल में आया सेवा का विचार
कुलदीप माथुर ने बताया कि समूह का एक पुराना भवन खाली पड़ा था. कोविड के दौरान कई घरों में जाने पर उन्होंने देखा कि कई परिवार गरीबी में जी रहे थे और कुछ माता-पिता अपने विशेष बच्चों को समाज से छुपाकर रखते थे. इसके बाद यहां विशेष स्कूल शुरू किया गया, जो अब तेजी से बढ़ा है. उन्होंने कहा कि क्षेत्र में ऐसे स्कूल का अभाव था, जबकि ओर शहर से स्कूल काफी दूर पड़ते हैं. नि:शुल्क शिक्षा के कारण अभिभावक संस्था को आशीर्वाद देते हैं. स्कूल में प्रवेश के लिए बच्चे का यूआईडी कार्ड, आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, बैंक डायरी, दो पासपोर्ट साइज फोटो और माता-पिता के आधार कार्ड की फोटोकॉपी लानी होती है.
दिव्यांग सेवा के लिए किए जा रहे हैं कई प्रयास
स्कूल, कॉलेज और स्किल के साथ सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय है. दिव्यांगों के लिए स्किल डेवलपमेंट कोर्स संचालित होता है. रेलवे स्टेशन पर आने-जाने वाले दिव्यांगों की सहायता के लिए एमओयू के तहत नि:शुल्क सुविधा भी दी जा रही है. माथुर ने बताया कि इन बच्चों को छिपाने की नहीं, सहेजने की जरूरत है. ये कोई अभिशाप नहीं, भगवान का वरदान हैं. उन्होंने अपील की कि आसपास कोई मूक-बधिर या दृष्टिहीन बच्चा हो तो उसे स्कूल में पढ़ने भेजें. साथ ही दीपावली पर इन बच्चों के बनाए दीपक और सजावटी सामान खरीदकर उनका हौसला बढ़ाएं.
About the Authorदीप रंजन सिंह Content Producer
दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…
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November 06, 2026, 06:51 IST



