भजनलाल सरकार में अब तक 7 बड़े हुक्मरानों पर गिर चुकी है गाज, 2 को तो विदेश में मिली सूचना

जयपुर. राजस्थान की भजनलाल सरकार के करीब 30 महीने के कार्यकाल में सात बड़े आईएएस अधिकारियों को एपीओ किए जाने के मामले चर्चा में रहे हैं. इनमें एसीएस शिखर अग्रवाल से लेकर संभागीय आयुक्त, जिला कलेक्टर और विभागीय सचिव स्तर के अधिकारी शामिल हैं. खास बात यह है कि दो अधिकारियों को उस समय एपीओ किया गया, जब वे विदेश में थे. पहले खाद्य विभाग के पूर्व सचिव अंबरीश कुमार को विदेश में रहते हुए एपीओ किया गया था. अब एसीएस शिखर अग्रवाल के खिलाफ भी विदेश दौरे के दौरान कार्रवाई हुई है. इन दोनों मामलों ने प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है.
हालांकि सरकार की ओर से अलग-अलग अधिकारियों को हटाने के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां रही हैं. किसी के मामले में कार्यालय से अनुपस्थित रहने का मुद्दा सामने आया, तो किसी के खिलाफ जमीन आवंटन में कथित अनियमितताओं की शिकायतें थीं. वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम में तकनीकी गड़बड़ी के बाद भी एक वरिष्ठ अधिकारी को एपीओ किया गया था. आइए जानते हैं वे सात अधिकारी कौन हैं और उनके मामले क्यों सुर्खियों में आए.
विदेश दौरे के बीच एपीओ हुए शिखर अग्रवाल
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल को विदेश दौरे के दौरान एपीओ किया गया. उनका विदेश दौरा 10 नवंबर तक प्रस्तावित है. बताया जा रहा है कि वे 15 दिन से अधिक अवधि के विदेश दौरे पर हैं. वहीं यह भी दावा किया गया है कि दिल्ली में उनके खिलाफ कार्रवाई से जुड़े दस्तावेज पेश किए गए थे. सीबीआई से जुड़ी संभावित कार्रवाई की चर्चा के बीच राज्य सरकार ने उन्हें एपीओ कर दिया. हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
मंजूरी नहीं मिली फिर भी विदेश गए अंबरीश कुमार
खाद्य विभाग के पूर्व सचिव अंबरीश कुमार को करीब तीन महीने पहले एपीओ किया गया था. उन्होंने निजी काम से विदेश जाने के लिए कार्मिक विभाग से अनुमति मांगी थी, लेकिन उच्च स्तर से स्वीकृति नहीं मिली. इसके बावजूद वे विदेश चले गए. आरोप है कि विदेश में रहते हुए उन्होंने कार्यालय की फाइलें ऑनलाइन मंगवाईं और उन पर मंजूरी दी. मामला सामने आने के बाद उन्हें एपीओ किया गया.
औचक निरीक्षण में उपस्थित नहीं मिलीं थीं नलिनी कठोतिया
आईएएस नलिनी कठोतिया का मामला भी चर्चा में रहा. तत्कालीन मुख्य सचिव सुधांश पंत ने जयपुर विकास प्राधिकरण कार्यालय का औचक निरीक्षण किया था. इस दौरान कठोतिया कार्यालय में मौजूद नहीं मिली थीं. इसके अलावा लैंड टू लैंड पॉलिसी के क्रियान्वयन और कथित अनियमितताओं से जुड़ी शिकायतें भी सामने आई थीं. इन्हीं परिस्थितियों के बीच उन्हें एपीओ किया गया.
जमीन आवंटन विवाद में हटाए गए थे ललित गोयल
आईएएस ललित गोयल को मई 2026 में भीलवाड़ा यूआईटी के सचिव पद से हटाकर एपीओ किया गया. उनके कार्यकाल में नेहरू विहार प्रोजेक्ट के तहत जमीन आवंटन से जुड़ी कथित अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं. इस मामले के चर्चा में आने के बाद सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया.
25 लाख की रिश्वत मांगने का हनुमानमल ढाका पर लगा था आरोप
दूदू के तत्कालीन जिला कलेक्टर हनुमानमल ढाका को वर्ष 2024 में एपीओ किया गया था. उनके खिलाफ जमीन के भू-रूपांतरण के बदले 25 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप सामने आया था. जिला कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई उस समय काफी चर्चा में रही.
पीएम मोदी की सभा में तकनीकी गड़बड़ी के चलते एपीओ हुईं अर्चना सिंह
सितंबर 2025 में बांसवाड़ा के नपला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा के दौरान वीडियो प्रसारण में तकनीकी समस्या आई थी. करीब दस मिनट तक वीडियो स्क्रीन पर प्रसारण बाधित रहा, जबकि ऑडियो चालू था. इससे प्रधानमंत्री का किसानों के साथ संवाद प्रभावित हुआ. कार्यक्रम की तकनीकी व्यवस्था की जिम्मेदारी डीओआईटी विभाग के पास थी. उस समय विभाग की सचिव आईएएस अर्चना सिंह थीं. इसके बाद सरकार ने उन्हें एपीओ कर दिया.
कोटा के संभागीय आयुक्त पद से हटाए गए थे राजेंद्र विजय
कोटा के पूर्व संभागीय आयुक्त राजेंद्र विजय को एपीओ किए जाने का मामला भी सुर्खियों में रहा. वरिष्ठ प्रशासनिक पद पर तैनात अधिकारी को हटाने का फैसला चर्चा का विषय बना था. हालांकि उपलब्ध जानकारी में उन्हें एपीओ किए जाने का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है.
एपीओ होने पर अधिकारी के साथ क्या होता है?
एपीओ का मतलब Awaiting Posting Orders है. आसान भाषा में इसका मतलब है कि अधिकारी को उसके वर्तमान पद से हटाकर अगली नियुक्ति के आदेशों की प्रतीक्षा में रखा गया है. इस दौरान अधिकारी को सरकार के निर्देशों के अनुसार निर्धारित कार्यालय में उपस्थिति देनी पड़ सकती है. नई पोस्टिंग मिलने पर वह दोबारा जिम्मेदारी संभाल सकता है. एपीओ कोई आपराधिक सजा नहीं है. इसे निलंबन या बर्खास्तगी के समान भी नहीं माना जाता. इसलिए किसी अधिकारी के एपीओ होने से उसके खिलाफ लगे आरोप सही साबित होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.
प्रशासनिक फैसलों पर क्यों रहती है नजर?
आईएएस अधिकारी जिलों और विभागों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते हैं. ऐसे में किसी कलेक्टर, संभागीय आयुक्त या विभागीय प्रमुख को अचानक एपीओ करने पर सवाल उठना स्वाभाविक है. सरकार के ऐसे फैसलों के पीछे प्रशासनिक जरूरत, कार्यशैली से जुड़ी शिकायतें या अन्य कारण हो सकते हैं. भजनलाल सरकार के कार्यकाल में सात आईएएस अधिकारियों के एपीओ होने का आंकड़ा इसलिए चर्चा में है, क्योंकि इनमें वरिष्ठ पदों पर तैनात अधिकारी भी शामिल रहे हैं.



