भैरूं बाबा के दरबार में उमड़ेगा आस्था का सैलाब, 14 सितंबर से लक्खी मेला, दूर-दूर से पहुंच रहे भक्त

Last Updated:September 12, 2026, 16:05 IST
Sikar Bhairu Baba Dham: सीकर के रींगस स्थित 557 साल पुराने भैरूं बाबा धाम में 14 सितंबर से आठ दिवसीय वार्षिक लक्खी मेला शुरू होगा. मेले के लिए प्रशासन और मंदिर कमेटी तैयारियों में जुट गए हैं, जिसमें सुरक्षा और दर्शन व्यवस्था को सुगम बनाने पर जोर दिया जा रहा है.
ख़बरें फटाफट
Sikar News: राजस्थान के प्रसिद्ध मंदिरों में शामिल रींगस के भैरूं बाबा के आठ दिवसीय वार्षिक लक्खी 14 सितंबर से शुरू होगा. मेले को लेकर प्रशासन और मंदिर कमेटी तैयारियों में जुट हुआ है. इस बार भैरूं बाबा की पवित्र जोहड़ी में श्रद्धालुओं के नहाने के लिए सफाई और दूसरी सुविधाओं को बढ़ाया जाएगा. पुलिस प्रशासन को वाहनों के आने-जाने के लिए रूट तय करने और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए गए. वहीं, दर्शन व्यवस्था को आसान बनाने को लेकर भी योजना बनाई गई है.
इसके अलावा पार्किंग और भैरूं बाबा जोहड़ी व मेला परिसर में आवारा पशुओं को रोक लगाई गई है. पालिका प्रशासन को सफाई, पार्किंग व मेले में लगने वाली अस्थायी दुकानों के लिए विशेष निर्देश सहित मेडिकल कैंप लगाने के निर्देश दिए गए. मेले के लिए अभी से हरियाणा, दिल्ली, पंजाब समेत कई राज्यों और अलवर, अजमेर, जयपुर से भक्त आने लगे हैं. आपको बता दें कि रींगस का भैरूं मंदिर खाटूश्याम जी से नजदीक एक बड़ा धार्मिक स्थल होने से कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां मेले में पहुंचते हैं.
550 साल पुराना रहस्य, झोली से नहीं उठी भैरू बाबा की मूर्तिरींगस कस्बे में भैरू बाबा का मंदिर करीब 557 साल पुराना बताया जाता है. मान्यता है कि यहां भैरव बाबा की मूर्ति एक रात पूजा के बाद ऐसी जगह स्थापित हुई कि उसे उठाने की कोशिश करने पर भी वह टस से मस नहीं हुई. इसके बाद हुई आकाशवाणी ने इस स्थान को भैरव बाबा का स्थायी धाम बना दिया. यही वजह है कि कालाष्टमी समेत विशेष अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. इसके अलावा साल में एक बार यहां वार्षिक लक्खी मेले का भी आयोजन होता है.
ब्रह्मा के पांचवें मुख से जुड़ी मान्यताहिंदू मान्यता के अनुसार ब्रह्मा जी के पांचवें मुख से भगवान शिव की आलोचना होने पर शिवजी ने पांचवें रुद्रावतार के रूप में भैरव का रूप धारण किया. मान्यता है कि भैरव बाबा ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का पांचवां मुख अलग कर दिया. इसके बाद उन पर ब्रह्महत्या का दोष लगा. इस दोष से मुक्ति के लिए भैरव बाबा ने तीनों लोकों की यात्रा की. लोकमान्यता है कि पृथ्वी लोक की उनकी यात्रा रींगस से शुरू हुई थी.
गाय चराते थे पूर्वज, झोली में रखते थे पत्थर की मूर्तिमंदिर के पुजारी के अनुसार उनके गुर्जर प्रतिहार पूर्वज मूल रूप से मंडोर में रहते थे और गाय चराने का काम करते थे. उनके पास पत्थर की गोलाकार मूर्ति थी, जिसे वे भैरू बाबा मानकर झोली में रखते थे. गाय चराते समय जिस तालाब के किनारे रुकते, वहां मूर्ति निकालकर पूजा करते और आगे बढ़ते समय उसे फिर झोली में रख लेते. मंडोर से चलते हुए पूर्वज रींगस पहुंचे और तालाब किनारे रात में ठहरे. पूजा के बाद जब सुबह मूर्ति को वापस उठाने लगे तो वह नहीं उठी. इसी दौरान आकाशवाणी हुई “जहां से मैंने ब्रह्महत्या के प्रायश्चित के लिए पृथ्वी लोक की यात्रा शुरू की थी, मैं उसी स्थान पर आ गया हूं और अब यहीं निवास करना चाहता हूं.” इसके बाद पूर्वज वहीं रुक गए और भैरू बाबा की पूजा शुरू कर दी.
1669 की छतरी बनी इतिहास की गवाहमंदिर का तीसरी बार जीर्णोद्धार वर्ष 2013 से शुरू हुआ. पुजारी बताते हैं कि पहले मंदिर चारों तरफ से श्मशान से घिरा और खुले स्वरूप में था. मंदिर के बाहर बनी सती माता की छतरी पर 1669 ईस्वी अंकित है, जिसे मंदिर के प्राचीन इतिहास से जोड़कर देखा जाता है. भैरव बाबा को पुआ-पापड़ी, बाटी-बाकले और लौंग-पतासे का भोग लगाने की परंपरा है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
और पढ़ेंLocation :
Sikar,Rajasthan
First Published :
September 12, 2026, 16:05 IST



