माता-पिता करते हैं मजदूरी, बेटी का सपना भारत के लिए फुटबॉल खेलना, जिंक एकेडमी ने बदली झारखंड की 15 साल की दांगी की जिंदगी

उदयपुर. जमशेदपुर से फुटबॉल के मैदान तक पहुंची दांगी मार्डी की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी के संघर्ष की कहानी नहीं है बल्कि उस सपने की कहानी है जिसे सुविधाओं की कमी भी रोक नहीं पाई. झारखंड के जमशेदपुर की रहने वाली 15 साल की दांगी आज जिंक फुटबॉल एकेडमी में अपने खेल को निखार रही हैं. उनका सपना साफ है पहले भारत के लिए फुटबॉल खेलना और फिर एक दिन कोच बनना है.
दांगी का परिवार बहुत साधारण है. उनके माता-पिता मजदूरी करते हैं. घर में एक भाई है जो पढ़ाई के साथ फुटबॉल भी खेलता है. दांगी ने फुटबॉल की शुरुआत किसी बड़ी अकादमी से नहीं की थी. उनके घर के पास एक मैदान था, जहां ज्यादातर लड़के फुटबॉल खेलते थे. दांगी और उनकी सहेलियों ने वहां खेलने की इच्छा जताई और धीरे-धीरे इसी मैदान से उनका फुटबॉल का सफर शुरू हुआ. शुरुआत में उनके पास न कोई बड़ी कोचिंग थी और न ही मैच खेलने के ज्यादा मौके. स्कूल टूर्नामेंट तक ही खेल सीमित था. 14 साल की उम्र में उन्हें एक ट्रायल के बारे में पता चला. उन्होंने ट्रायल दिया और सलेक्शन हो गया. इसके बाद जिंक फुटबॉल एकेडमी में भी ट्रायल हुआ और यहां भी उनका चयन हो गया.
जिंक फुटबॉल एकेडमी आकर बदली ट्रेनिंग और जिंदगीदांगी के लिए एकेडमी में आना सिर्फ फुटबॉल की ट्रेनिंग मिलने तक सीमित नहीं रहा. यहां उन्हें रहने, खाने, पढ़ाई और खेल की सुविधाएं एक साथ मिल रही हैं. वह बताती हैं कि पहले होम ग्राउंड पर प्रैक्टिस तो करती थीं, लेकिन मैच खेलने के ज्यादा मौके नहीं मिलते थे. एकेडमी आने के बाद उन्हें लगातार टूर्नामेंट खेलने का मौका मिला. वह बताती हैं कि टीम ने कई टूर्नामेंट जीते. यूथ लीग में टीम सेमीफाइनल तक पहुंची. इसके बाद दांगी को इंडिया कैंप में भी जाने का मौका मिला. हालांकि वहां उनका चयन नहीं हो सका. दांगी मानती हैं कि अलग जगह की ट्रेनिंग और माहौल को समझने में उन्हें थोड़ी परेशानी हुई लेकिन वह इसे अपने सफर का अंत नहीं मानतीं.
सुबह 4 बजे शुरू होता है दिनदांगी की जिंदगी में फुटबॉल के लिए मेहनत कितनी है. इसका अंदाजा उनके रोज के रूटीन से लगाया जा सकता है. सुबह करीब 4 बजे उठने के बाद वह 5:30 बजे ट्रेनिंग के लिए पहुंचती हैं. सुबह का सेशन करीब 7 बजे खत्म होता है. इसके बाद स्कूल की तैयारी और नाश्ता होता है. सुबह 8 बजे स्कूल जाने के बाद दोपहर करीब 2 बजे वापसी होती है. कुछ घंटे आराम करने के बाद शाम को फिर ट्रेनिंग के लिए मैदान पहुंचना होता है. शाम करीब 4:45 बजे सेशन शुरू होता है और 6 बजे तक चलता है. इसके बाद डिनर और फिर पढ़ाई. यानी जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे मोबाइल, दोस्तों और मनोरंजन के लिए समय निकालते हैं दांगी का अधिकांश दिन पढ़ाई और फुटबॉल के बीच गुजरता है.
मोबाइल भी है, लेकिन सपने से छोटाएकेडमी में मोबाइल का इस्तेमाल भी तय समय के मुताबिक होता है. दांगी के मुताबिक उन्हें सप्ताह में तीन दिन मोबाइल मिलता है. दो दिन करीब 20-20 मिनट और रविवार को करीब 30 मिनट के लिए. इसी दौरान वह परिवार से वीडियो कॉल पर बात कर पाती हैं. घर से दूर रहना आसान नहीं है, लेकिन दांगी का कहना है कि परिवार से बात होती रहती है. उनके पिता एक बार उन्हें देखने एकेडमी भी आए थे. राजस्थान लीग के बाद उन्हें करीब 10 दिन की छुट्टी मिली थी और वह घर जाकर आई थीं.
राजस्थान लीग में बनीं टॉप स्कोररदांगी के सफर में एकेडमी आने के बाद सबसे बड़ा बदलाव उनके खेल के स्तर में दिखाई दिया. राजस्थान लीग में उन्होंने बतौर विंगर शानदार प्रदर्शन किया और टूर्नामेंट की टॉप स्कोरर बनीं. यह उपलब्धि उस लड़की के लिए खास है, जिसने कभी अपने मोहल्ले के मैदान में लड़कों के साथ खेलने के लिए जगह मांगी थी. जिस खिलाड़ी को शुरुआत में मैच खेलने के ज्यादा मौके नहीं मिलते थे, वही अब बड़े स्तर के टूर्नामेंट में गोल कर अपनी पहचान बना रही है.
फुटबॉल के साथ पढ़ाई भीदांगी अभी नौवीं कक्षा में पढ़ रही हैं. फुटबॉल उनका पहला लक्ष्य है, लेकिन पढ़ाई को भी वह छोड़ना नहीं चाहतीं. आगे वह पहले भारत के लिए खेलना चाहती हैं और उसके बाद कोच बनने का सपना देखती हैं. जिंक फुटबॉल एकेडमी उनके लिए सिर्फ फुटबॉल का मैदान नहीं है. यहां उन्हें कोचिंग के साथ-साथ स्कूल, हॉस्टल, खाना और पोषण जैसी सुविधाएं मिल रही हैं. ट्रेनिंग में तकनीकी कौशल के साथ डाइट और खेल से जुड़ी दूसरी बारीकियों पर भी ध्यान दिया जाता है. दांगी जैसी खिलाड़ी के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके घर की आर्थिक स्थिति शायद उन्हें महंगी ट्रेनिंग, बेहतर डाइट और लगातार टूर्नामेंट खेलने के मौके आसानी से उपलब्ध नहीं करा सकती थी. एकेडमी ने उन्हें वह माहौल दिया, जहां उन्हें अपने खेल पर ध्यान देने का मौका मिल रहा है.



