यूपी चुनाव: अखिलेश-राहुल के लिए खतरे की घंटी है मोदी-शाह के भरोसेमंद विनोद तावड़े का ‘मिशन 100’

नई दिल्ली/लखनऊ: बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और नए यूपी चुनाव प्रभारी विनोद तावड़े ने अपना काम शुरू कर दिया है. उनका पहला बड़ा टास्क यूपी की उन 100 सीटों को जीतना है. ये वो विधानसभा सीटें हैं जहां लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था. तावड़े सितंबर के पहले हफ्ते से यूपी का अपना पहला दौरा शुरू करने जा रहे हैं. वो जमीनी स्तर पर चुनावी माहौल भांपने की कोशिश करेंगे. इस दौरान वो कार्यकर्ताओं से लेकर स्थानीय नेताओं की बात सुनेंगे. इसका मकसद पार्टी की कमजोरियों को समझना और उन्हें दूर करना है. वो लगातार पंचायत प्रधानों और सांसदों से मुलाकात कर रहे हैं. यह बताता है कि यूपी फतह के लिए उनका प्लान पूरी तरह तैयार है. तावड़े की यह रणनीति सीएम योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय नेतृत्व को शानदार नतीजे दिलवा सकती है.
जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से मिलना विनोद तावड़े की सबसे बड़ी ताकत
विनोद तावड़े के लिए यूपी का चुनाव एक बड़ा टास्क है. उन्होंने अपनी रणनीति पर अमल भी शुरू कर दिया है. यूपी भर से सैकड़ों कार्यकर्ता और नेता उनके ऑफिस पहुंच रहे हैं. इनमें सांसद और विधायक से लेकर पंचायत प्रधान तक शामिल हैं. तावड़े हर किसी से मिल रहे हैं और उनका फीडबैक ले रहे हैं. वो ग्राउंड लेवल की हकीकत को समझना चाहते हैं. उनकी यह स्टाइल पार्टी में काफी पसंद की जा रही है. बीजेपी वर्कर्स के लिए सीधे प्रभारी से मिलना एक बड़ी बात है. वो बिना किसी रोकटोक के अपनी बात रख पा रहे हैं.
‘हम राज्य का गहराई से असेसमेंट करेंगे और एक बड़ी जीत दिलाने के लिए मिलकर काम करेंगे’.
यह बयान उनके मजबूत इरादों को दिखाता है. यह यूपी में उनके सबसे अहम संगठनात्मक असाइनमेंट की शुरुआत है.
महाराष्ट्र और बिहार के बाद क्या यूपी में भी चलेगा विनोद तावड़े का मैजिक?
विनोद तावड़े संगठन के नेता भर नहीं हैं. उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है. उनके पास संघ परिवार का लंबा अनुभव भी है. उन्होंने हाल ही में महाराष्ट्र चुनाव में अपना हुनर दिखाया था. वहां लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी गठबंधन बैकफुट पर आ गया था. लेकिन पार्टी ने शानदार वापसी की और मजबूत जनादेश हासिल किया. उस समय जातिगत समीकरणों को संभालना आसान नहीं था.
बिहार चुनाव में भी उन्होंने अहम रोल निभाया था. अब उसी सक्सेस फॉर्मूले को यूपी में लागू करने की तैयारी है. यूपी का सियासी मैदान महाराष्ट्र से काफी अलग और बड़ा है. यहां 403 विधानसभा सीटें हैं जो इसे बेहद जटिल बनाती हैं. यहां सिर्फ सीट जीतना ही टारगेट नहीं है. बल्कि विधायकों और प्रशासन की परफॉरमेंस को भी सुधारना होगा.
क्या यूपी के जटिल जातिगत समीकरणों को साधने में कामयाब हो पाएगी बीजेपी?
2024 लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन बीजेपी के लिए एक चेतावनी था. पार्टी की कुछ कमजोरियां खुलकर सामने आ गई हैं. अब इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.
बीजेपी को अपना पुराना सोशल बेस फिर से मजबूत करना होगा. इसके लिए कोर वोटर को अपने साथ बनाए रखना जरूरी है. इस पूरी कवायद में जाति समीकरण सबसे अहम रोल निभाएंगे.
बीजेपी को ब्राह्मण और राजपूत वोटर्स के साथ ही ओबीसी को भी साधना होगा.
नॉन-यादव ओबीसी ग्रुप्स पर भी खास फोकस करने की जरूरत है.
सीएम योगी आदित्यनाथ की राजपूत समाज में मजबूत पकड़ है. यह पार्टी के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है. लेकिन चुनाव जीतने के लिए सिर्फ एक वर्ग पर निर्भर नहीं रहा जा सकता.
तावड़े को सभी जातियों के बीच एक बैलेंस बनाना होगा. यह उनकी चुनाव स्ट्रैटेजी का सबसे अहम हिस्सा रहने वाला है.
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े. (File Photo : PTI)
सीएम योगी आदित्यनाथ और विनोद तावड़े का तालमेल चुनाव में कैसे काम करेगा?
विनोद तावड़े और सीएम योगी का तालमेल चुनाव के लिए काफी अहम होगा. तावड़े की दिल्ली दरबार और संघ में बहुत अच्छी पकड़ है. उनका संगठनात्मक अनुभव इस चुनाव में बहुत काम आने वाला है. वो दिल्ली और लखनऊ के बीच एक मजबूत ब्रिज का काम कर सकते हैं. इससे पार्टी नेटवर्क को और ज्यादा पावरफुल बनाया जा सकेगा.
बीजेपी का मकसद सिर्फ डैमेज कंट्रोल करना नहीं है. पार्टी यूपी में अपना पुराना दबदबा फिर से कायम करना चाहती है. तावड़े का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि वो मुश्किल हालात में भी गेम पलट सकते हैं. उन्होंने बैकफुट से खेलकर पार्टी को जिताने का हुनर साबित किया है. ऐसे में योगी आदित्यनाथ की पॉपुलैरिटी और तावड़े का मैनेजमेंट मिलकर एक विनिंग फॉर्मूला तैयार कर सकते हैं.
क्या सहयोगी दलों के साथ सीट शेयरिंग बीजेपी के लिए चुनौती बनेगा?
बीजेपी के लिए यूपी में गठबंधन को मैनेज करना भी एक बड़ा टास्क है. जयंत चौधरी की आरएलडी अब बीजेपी गठबंधन का हिस्सा है. लोकसभा चुनाव में आरएलडी ने खास पॉकेट्स में अपनी अहमियत साबित की है. अब सवाल यह है कि गठबंधन का गणित विधानसभा चुनाव में कितना फायदा पहुंचाएगा. तावड़े को यह तय करना होगा कि कहां सहयोगी दल पर निर्भर रहना है और कहां खुद का संगठन काम आएगा.
सीट शेयरिंग का फॉर्मूला ऐसा होना चाहिए जिससे पार्टी के पुराने नेता भी खुश रहें. गठबंधन के नए साथियों को खुश रखना भी जरूरी है. इसके लिए बहुत ही स्मार्ट कैलकुलेशन की जरूरत होगी. अगर सब कुछ सही रहा तो बीजेपी यूपी में फिर से इतिहास रच सकती है. तावड़े के लिए यह चुनाव उनकी लीडरशिप का सबसे बड़ा टेस्ट साबित होने वाला है.



