National

38 दिन की बच्ची को नदी में फेंका था, उम्रकैद काट रही मां को हाईकोर्ट ने क्यों किया बरी? फैसले की इनसाइड स्टोरी

गुवाहाटी: एक 38 दिन की बच्ची की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा भुगत रही एक मां को गौहाटी हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है. यह फैसला सिर्फ एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं रहा. कोर्ट ने इस केस में पोस्टपार्टम साइकोसिस जैसी गंभीर मानसिक स्थिति की संभावना को अहम माना. अदालत ने कहा कि प्रसव के बाद कुछ महिलाओं में ऐसी मानसिक परेशानी तेजी से विकसित हो सकती है. इसमें वास्तविकता से संपर्क टूटना भी संभव है. कोर्ट ने यह भी माना कि मामले की सुनवाई के दौरान इस पहलू पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए था. साथ ही अदालत ने पुलिस के सामने दिए गए महिला के कथित कबूलनामे की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया. कोर्ट के अनुसार यह बयान पुलिस प्रभाव की आशंका के कारण सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता था. इसी आधार पर महिला की दोषसिद्धि टिक नहीं सकी और उसे हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया.

10 साल पुराना यह केस क्या है?

मामला साल 2016 का है. महिला के पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी एक महीने और आठ दिन की बच्ची रात के समय घर से गायब हो गई है. बच्ची के अचानक लापता होने के बाद पुलिस ने परिवार के लोगों से पूछताछ शुरू की. इसी दौरान महिला ने कथित तौर पर पुलिस के सामने कहा कि उसने बच्ची की हत्या कर दी थी.

पुलिस के अनुसार महिला ने यह भी बताया था कि बच्ची को उसने दिकोह नदी में फेंक दिया. इस कथित बयान के बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया. हालांकि पति के बयान में एक अलग बात सामने आई. उसने कहा कि जब उसने पत्नी से बच्ची के बारे में पूछा था तो उसने यह कहा था कि उसे नहीं पता कि बच्ची कहां है.

मामले की सुनवाई आगे बढ़ी और सितंबर 2023 में ट्रायल कोर्ट ने महिला को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी. इसके बाद महिला ने इस फैसले को गौहाटी हाईकोर्ट में चुनौती दी. महिला की ओर से वकील डी बरुआ ने अदालत के सामने पक्ष रखा.

6 अक्टूबर को जस्टिस एम जोथांगखुमा और जस्टिस राजेश मजूमदार की पीठ ने महिला की अपील मंजूर कर ली. हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस के सामने दिया गया कथित कबूलनामा कानूनी तौर पर स्वीकार्य नहीं है. कोर्ट ने खास तौर पर इस बात का उल्लेख किया कि बयान दर्ज होने के समय एक महिला हेड कांस्टेबल वहां मौजूद थी और उसी ने उस बयान पर हस्ताक्षर किए थे.

अदालत के अनुसार ऐसे हालात में यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी महिला पुलिस के दबाव या प्रभाव से पूरी तरह मुक्त थी. इसलिए उस कथित कबूलनामे को साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने साफ किया कि जब मुख्य आधार ही कानूनी तौर पर स्वीकार्य नहीं है तो केवल उसी के आधार पर हत्या की सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती.

इस केस में कोर्ट ने पोस्टपार्टम साइकोसिस को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में एक मां अपने नवजात बच्चे को पसंद नहीं करने की बात कहती है तो इसके पीछे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कारणों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

क्या होता है ‘पोस्टपार्टम साइकोसिस’?

पोस्टपार्टम साइकोसिस एक दुर्लभ लेकिन बेहद गंभीर मानसिक स्थिति है. यह बच्चे के जन्म के बाद तेजी से विकसित हो सकती है. यह सामान्य पोस्टपार्टम डिप्रेशन से अलग होती है. इसमें भ्रम, गलत धारणाएं, मतिभ्रम, तेज मूड बदलाव और सोचने समझने की क्षमता में गंभीर बदलाव दिखाई दे सकते हैं.

6 अक्टूबर को जस्टिस एम जोथांगखुमा और जस्टिस राजेश मजूमदार की पीठ ने महिला की अपील मंजूर कर ली. हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस के सामने दिया गया कथित कबूलनामा कानूनी तौर पर स्वीकार्य नहीं है. कोर्ट ने खास तौर पर इस बात का उल्लेख किया कि बयान दर्ज होने के समय एक महिला हेड कांस्टेबल वहां मौजूद थी और उसी ने उस बयान पर हस्ताक्षर किए थे.

अदालत के अनुसार ऐसे हालात में यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी महिला पुलिस के दबाव या प्रभाव से पूरी तरह मुक्त थी. इसलिए उस कथित कबूलनामे को साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने साफ किया कि जब मुख्य आधार ही कानूनी तौर पर स्वीकार्य नहीं है तो केवल उसी के आधार पर हत्या की सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती.

ये भी पढ़ें: जायदाद के झगड़े में रिश्ते का खून, राइफल की एक गोली और बदल गई पूरी कहानी, 83 साल के दादा पर पोते को मारने का आरोप

इस केस में कोर्ट ने पोस्टपार्टम साइकोसिस को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में एक मां अपने नवजात बच्चे को पसंद नहीं करने की बात कहती है तो इसके पीछे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कारणों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

क्या होता है ‘पोस्टपार्टम साइकोसिस’?

पोस्टपार्टम साइकोसिस एक दुर्लभ लेकिन बेहद गंभीर मानसिक स्थिति है. यह बच्चे के जन्म के बाद तेजी से विकसित हो सकती है. यह सामान्य पोस्टपार्टम डिप्रेशन से अलग होती है. इसमें भ्रम, गलत धारणाएं, मतिभ्रम, तेज मूड बदलाव और सोचने समझने की क्षमता में गंभीर बदलाव दिखाई दे सकते हैं.

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस स्थिति के कुछ लक्षण बहुत थोड़े समय के लिए सामने आ सकते हैं और फिर बदल सकते हैं. ऐसी हालत में प्रभावित महिला अपने बच्चे की देखभाल ठीक तरीके से नहीं कर पाती. कुछ मामलों में वह गलत विश्वासों के आधार पर खतरनाक कदम भी उठा सकती है.

अदालत ने रिसर्च का हवाला देते हुए बताया कि पोस्टपार्टम साइकोसिस बहुत दुर्लभ है. यह करीब एक से दो हजार महिलाओं में दिखाई देने की बात कही गई है. इसके बावजूद इसकी गंभीरता बहुत अधिक हो सकती है. यह मां और नवजात दोनों की जान के लिए खतरा पैदा कर सकती है.

ये भी पढ़ें: 4 साल फ्रीजर में डेड बॉडी, डे-केयर और महीने का क‍िराया 1.30 लाख रुपये, रहस्यमयी लाश तक आख‍िर कैसे पहुंची पुल‍िस

हालांकि हाईकोर्ट ने यह फैसला नहीं दिया कि इस महिला को वास्तव में पोस्टपार्टम साइकोसिस था. अदालत ने सिर्फ इतना कहा कि ट्रायल कोर्ट को इस संभावना पर विचार करना चाहिए था. यानी हाईकोर्ट का फैसला मानसिक बीमारी को लेकर अंतिम मेडिकल निष्कर्ष नहीं है.

कोर्ट ने सजा के दौरान महिला की ओर से कही गई किसी बात को भी हत्या के आरोप का अतिरिक्त सबूत मानने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि ऐसी बात को दोष साबित करने के लिए अलग से ठोस साक्ष्य नहीं माना जा सकता.

आखिर में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया. महिला को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया.

img

खबरें पढ़ने का बेहतरीन अनुभव

QR स्कैन करें, डाउनलोड करें ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें

QR Codelogin

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj