रूस-चीन में हथियारों की रेस, मौका पाते ही तुर्कमेनिस्तान में घुसा ड्रैगन मगर दखल बर्दाश्त नहीं करेंगे पुतिन

सेंट्रल एशिया के देश अपनी सुरक्षा के लिए मास्को पर निर्भर रहे हैं. रूस ने दशकों तक इस इलाके को मिसाइलें और रडार सिस्टम सप्लाई किए हैं. रूस आज भी तुर्कमेनिस्तान को हथियार बेच रहा है और कई पुराने प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और यूक्रेन युद्ध के कारण रूस की हथियार उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा है. इसका फायदा चीन उठा रहा है. चीन ने साइलेंट तरीके से इस बाजार में सेंधमारी की है. बीजिंग का टारगेट रूस के उस डिफेंस मार्केट पर कब्जा करना है जो अब कमजोर पड़ रहा है. चीन हथियारों के मामले में तुर्कमेनिस्तान को अपने पर निर्भर बनाना चाहता है. हालांकि, रूस यहां चीन का दखल बर्दाश्त नहीं करना चाहता. चीन की आक्रामक कूटनीति के कारण अब सेंट्रल एशिया में हथियारों की एक नई रेस शुरू हो गई है.
तुर्कमेनिस्तान के लिए भी यह एक मौका है कि वह सिर्फ एक देश पर निर्भर रहने के बजाय नए विकल्प तलाशे. लेकिन चीन की नीयत सिर्फ विकल्प बनने की नहीं बल्कि इस बाजार का नया बॉस बनने की है.
तुर्कमेनिस्तान को कौन-कौन से हथियार बेच चुका है चीन?
तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अश्गाबात में 27 सितंबर को स्वतंत्रता दिवस पर एक भव्य परेड आयोजित की गई थी. इस परेड ने पूरी दुनिया को चौंका दिया क्योंकि इसमें रूस के बजाय चीन के हथियारों का दबदबा दिखा. परेड के वीडियो फुटेज में चीन के घातक एफके-2000 एयर डिफेंस सिस्टम के कम से कम 10 वाहन दिखाई दिए. यह इस बात का सबूत है कि चीन ने तुर्कमेनिस्तान की सेना में पैठ बना ली है.
चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड इंडस्ट्री कॉरपोरेशन ने इस मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम को डेवलप किया है. इस सिस्टम में मिसाइलों के साथ 30 मिलीमीटर की जुड़वा तोप भी लगी हुई है. यह दुश्मन के विमानों को 1.2 किलोमीटर से लेकर 25 किलोमीटर तक की दूरी पर आसानी से तबाह कर सकता है. इसके अलावा क्रूज मिसाइल जैसे गाइडेड हथियारों को भी यह 10 किलोमीटर दूर ही मार गिराने की ताकत रखता है.
परेड में चीन के डीजेआई मैट्रिस 30टी ड्रोन और स्काई सेकर एफएक्स80 अनमैन्ड एरियल व्हीकल भी शामिल थे. एक खास रडार भी नजर आया जिसे वाईएलएस-18ए बताया गया है. चीन का डीडब्ल्यूएल-002 इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम भी तुर्कमेनिस्तान की सेना का हिस्सा बन चुका है. इससे पता चलता है कि ड्रैगन ने किस हद तक इस देश के एयर डिफेंस को अपने कंट्रोल में ले लिया है.
ईरान और इजरायल के तनाव ने हथियारों की इस होड़ को और भड़काया
तुर्कमेनिस्तान की लंबी सीमा ईरान के साथ लगती है. ईरान इस समय अमेरिका और इजरायल के साथ जंग लड़ रहा है. फरवरी से ही यहां ड्रोन और मिसाइलें आसमान में मंडरा रही हैं. ईरान पर अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी अभी भी जारी है और हालात कभी भी बिगड़ सकते हैं. इसी डर के कारण तुर्कमेनिस्तान अपनी सेना को जल्द से जल्द आधुनिक बनाने में जुटा है. वह अपने एयर डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा है.
चीन ने इसी डर को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है. चीन तुरंत डिलीवरी का वादा करके तुर्कमेनिस्तान को अपने हथियार बेच रहा है. इस पूरे रीजन में सुरक्षा का डर चीन के हथियारों के बाजार को और बड़ा कर रहा है. चीन की कोशिश है कि इस डर के माहौल में कोई भी दूसरा देश तुर्कमेनिस्तान को हथियार न बेच सके.
सेंट्रल एशिया का बॉस बनने का चीन का सपना टूटेगा, रूस अपने हथियारों के बाजार में किसी को नहीं घुसने देगा. (AI Generated Image)
सेंट्रल एशिया में रूस को किनारे करने के लिए चीन क्या चाल चल रहा है?
रूस का ध्यान इस समय अपने खुद के एयर डिफेंस सिस्टम को बचाने पर लगा है. रूस को यूक्रेन के लंबे दूरी के हमलों से अपने शहरों को बचाना है. कैस्पियन पॉलिसी सेंटर की एक ताजा रिपोर्ट इस स्थिति को साफ करती है. रिपोर्ट के मुताबिक 2021 से 2023 के बीच सेंट्रल एशिया में रूस के हथियारों की सप्लाई में 23 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट का डेटा भी रूस के डिफेंस एक्सपोर्ट में कमी की पुष्टि करता है. चीन ने इसी खाली जगह को भरने के लिए अपनी चाल चली है. चीन ने सिर्फ तुर्कमेनिस्तान ही नहीं बल्कि उज्बेकिस्तान को भी अपने हथियारों के जाल में फंसा लिया है. उज्बेकिस्तान ने हाल ही में चीन से जे-10सीई फाइटर जेट्स खरीदे हैं.
ताजिकिस्तान भी अब चीन का एचक्यू-17एई शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम इस्तेमाल कर रहा है. कजाकिस्तान के आसमान में भी चीन के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट उड़ते हुए देखे गए हैं. चीन की कूटनीति है कि वह सस्ते और एडवांस हथियार देकर रूस के पुराने कस्टमर्स को पूरी तरह से तोड़ ले. चीन किसी भी हालत में इस इलाके में अपनी मोनोपोली स्थापित करना चाहता है.
भारत की आकाश मिसाइल की शानदार एंट्री से चीन अचानक क्यों बौखला गया है?
सेंट्रल एशिया के इस डिफेंस मार्केट में अब तक सिर्फ रूस और चीन की ही लड़ाई चल रही थी. लेकिन अब भारत ने अपने आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम के साथ इस बाजार में जोरदार एंट्री की है. भारत ने ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को अपना यह स्वदेशी हथियार बेचा है. यह चीन के लिए बड़ा झटका है. ड्रैगन कभी नहीं चाहता कि सेंट्रल एशिया में कोई तीसरा देश हथियार बेचे.
आकाश सिस्टम एक बहुत ही शानदार शॉर्ट रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल है. यह 100 मीटर से लेकर 20 किलोमीटर तक की ऊंचाई वाले टारगेट को आसानी से हिट कर सकता है. इसकी ऑपरेशनल रेंज 25 किलोमीटर तक है और इसमें जैमिंग से बचने के लिए खास प्रोटेक्शन लगा है.
चीन खुद को इस इलाके का इकलौता बॉस मानता है और भारत की एंट्री ने उसकी पूरी रणनीति को हिला कर रख दिया है.
रूस क्यों चाहता है कि तुर्कमेनिस्तान के हथियारों के बाजार में भारत आगे आए?
रूस अपने सबसे पुराने बाजार में चीन का बढ़ता दखल देखकर अंदर ही अंदर परेशान है. रूस अभी तुर्कमेनिस्तान को हथियार बेच तो रहा है लेकिन उसकी सप्लाई बहुत धीमी हो गई है. ऐसे में रूस कभी नहीं चाहेगा कि सेंट्रल एशिया के देश हथियारों के लिए नाटो या चीन के गुलाम बन जाएं.
आर्मेनिया का उदाहरण सबके सामने है जिसने रूस से हथियार न मिलने पर भारत का रुख किया था. आर्मेनिया 2022 में आकाश सिस्टम का पहला इंटरनेशनल खरीदार बना था.
रूस जानता है कि भारत हथियार बेचकर किसी देश पर दबाव नहीं बनाता है. इसलिए रूस के लिए भारत का आगे आना चीन के खतरे को बैलेंस करने का शानदार तरीका है. ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान भी सिर्फ चीन पर निर्भर रहने के बजाय अपने विकल्प खुले रखना चाहते हैं. वे अपने डिफेंस सिस्टम में डायवर्सिटी लाना चाहते हैं और भारत उनके लिए सबसे सुरक्षित विकल्प है.
चीन की रणनीति हमेशा से कर्ज और हथियारों के जाल में फंसाकर छोटे देशों पर कंट्रोल करने की रही है. लेकिन भारत का हथियार बाजार में आना सेंट्रल एशिया के लिए एक बड़ी राहत है.
भारत की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग लाइन मजबूत है जिससे सप्लाई की कोई चिंता नहीं होती है. भारत सेंट्रल एशिया के देशों को रूस के पुराने हथियारों का मेंटेनेंस सपोर्ट भी ऑफर कर सकता है.



