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सिगरेट छोड़ने के बाद भी लंग कैंसर का खतरा! जानिए किसे और कब करानी चाहिए ये खास जांच

फेफड़ों का कैंसर दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों की बड़ी वजहों में शामिल है. ऐसे में बीमारी को शुरुआती स्टेज पर पकड़ना काफी जरूरी माना जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर यानी IARC ने फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग को लेकर नई वैज्ञानिक समीक्षा की है. इसमें बताया गया है कि ज्यादा जोखिम वाले लोगों में लो-डोज CT स्कैन से बीमारी को जल्दी पकड़ने और फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने में मदद मिल सकती है.

24 सितंबर 2026 को इस समीक्षा का सार द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुआ. इसमें 17 देशों के 23 विशेषज्ञों ने फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग से जुड़े अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा की. इस समूह में भारत से AIIMS, नई दिल्ली के डॉ. अभिषेक शंकर भी शामिल थे.

लो-डोज CT स्कैन क्या होता है?

लो-डोज CT यानी कम रेडिएशन वाला कंप्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन. इसमें सामान्य CT की तुलना में रेडिएशन की मात्रा कम रखी जाती है. इस जांच से फेफड़ों में मौजूद बहुत छोटी गांठ या शुरुआती बदलाव भी दिखाई दे सकते हैं. IARC की समीक्षा के अनुसार, ज्यादा जोखिम वाले लोगों में इस तरह की स्क्रीनिंग से फेफड़ों के कैंसर को शुरुआती स्टेज में पकड़ने में मदद मिल सकती है. इससे बीमारी के बहुत आगे बढ़ जाने के मामले और कैंसर से होने वाली मौतें कम हो सकती हैं.

किसे लंग कैंसर की स्क्रीनिंग करानी चाहिए?

हर व्यक्ति को फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग कराने की जरूरत नहीं होती. इसका फायदा मुख्य रूप से उन लोगों में देखा गया है जिनमें बीमारी का खतरा ज्यादा है. अमेरिका की USPSTF गाइडलाइन के मुताबिक आम तौर पर 50 से 80 साल की उम्र के ऐसे लोगों को सालाना लो-डोज CT स्क्रीनिंग की सलाह दी जाती है जिनका कम से कम 20 पैक-ईयर का धूम्रपान इतिहास हो और जो अभी धूम्रपान करते हैं या पिछले 15 साल में इसे छोड़ चुके हैं.

पैक-ईयर क्या होता है?

पैक-ईयर से लंबे समय तक सिगरेट पीने की मात्रा का अंदाजा लगाया जाता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति रोज एक पैकेट सिगरेट 20 साल तक पीता है, तो उसका धूम्रपान इतिहास 20 पैक-ईयर माना जाएगा. हालांकि, स्क्रीनिंग की जरूरत व्यक्ति की उम्र, धूम्रपान के इतिहास और दूसरे जोखिमों को देखकर तय की जाती है. इसलिए खुद से CT स्कैन कराने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

स्क्रीनिंग से कितना फायदा मिल सकता है?

अमेरिका के नेशनल लंग स्क्रीनिंग ट्रायल में लो-डोज CT की तुलना छाती के एक्स-रे से की गई थी. सात साल के फॉलोअप में लो-डोज CT कराने वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर से मौत का जोखिम 16 प्रतिशत कम पाया गया. यूरोप के NELSON ट्रायल में भी फायदा देखा गया. करीब 10 साल के फॉलोअप में स्क्रीनिंग कराने वाले पुरुषों में फेफड़ों के कैंसर से मौत का जोखिम लगभग 24 प्रतिशत कम था. कुछ दूसरे अध्ययनों में भी लो-डोज CT के साथ मौतों में कमी देखी गई. हालांकि, ऐसे अध्ययनों के नतीजों पर दूसरे कारणों का असर हो सकता है. इसलिए सभी अध्ययनों के नतीजों को एक जैसा नहीं माना जा सकता.

क्या स्क्रीनिंग के नुकसान भी हैं?

हां. लो-डोज CT के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं. कई बार स्कैन में फेफड़ों में कोई गांठ दिखाई देती है, लेकिन वह कैंसर नहीं होती. इसे गलत पॉजिटिव परिणाम कहा जाता है. ऐसे मामलों में व्यक्ति को दोबारा स्कैन या दूसरी जांच करानी पड़ सकती है. कुछ मामलों में ऐसी प्रक्रिया भी करनी पड़ सकती है जिसकी बाद में जरूरत नहीं निकलती.

एक और समस्या ओवरडायग्नोसिस है. इसका मतलब है ऐसे कैंसर का पता चलना जो व्यक्ति की जिंदगी में कभी गंभीर परेशानी पैदा नहीं करता. इसके अलावा CT स्कैन में थोड़ी मात्रा में रेडिएशन होता है, इसलिए लंबे समय तक बार-बार जांच कराने से रेडिएशन से जुड़ा छोटा जोखिम भी रहता है.

क्या एक्स-रे भी काम करता है?

रिपोर्ट के मुताबिक, छाती के सामान्य एक्स-रे से फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने का साफ प्रमाण नहीं मिला है. अमेरिका के PLCO अध्ययन में लंबे समय तक लोगों की निगरानी की गई. इसमें नियमित छाती का एक्स-रे कराने और स्क्रीनिंग न कराने वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर से मौत के मामले में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया. इसलिए लो-डोज CT और सामान्य छाती के एक्स-रे को एक जैसा नहीं माना जाता.

AI से भी हो सकती है मदद

फेफड़ों की जांच में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के इस्तेमाल पर भी शोध हो रहा है. AI CT स्कैन में फेफड़ों की छोटी गांठों को पहचानने और उनकी माप करने में डॉक्टरों की मदद कर सकता है. लेकिन फिलहाल AI को डॉक्टर की जगह अकेले इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं. गलत रिपोर्ट और अनावश्यक जांच का खतरा भी हो सकता है.

सिगरेट छोड़ना सबसे जरूरी

फेफड़ों के कैंसर से बचने का सबसे जरूरी तरीका धूम्रपान छोड़ना है. स्क्रीनिंग बीमारी को जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती है, लेकिन यह धूम्रपान से होने वाले नुकसान को खत्म नहीं करती. इसीलिए विशेषज्ञ स्क्रीनिंग के साथ लोगों को धूम्रपान छोड़ने में मदद देने पर भी जोर देते हैं. कुछ अध्ययनों में व्यवहार संबंधी मदद और धूम्रपान छोड़ने वाली दवाओं से लोगों को लंबे समय तक सिगरेट छोड़ने में मदद मिली है.

बिना सलाह के CT स्कैन न कराएं

फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है. खासकर अगर किसी व्यक्ति को धूम्रपान का लंबा इतिहास रहा है, तो डॉक्टर से बात करके यह पता करना बेहतर है कि वह स्क्रीनिंग के लिए सही उम्मीदवार है या नहीं.

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