23 साल की उम्र में पिता को खोया, सिर पर था 1 करोड़ का कर्ज, 20 साल बाद बेटे ने ऐसे निभाया वादा

झुंझुनूं. कुछ वादे वक्त के साथ धुंधले पड़ जाते हैं, लेकिन कुछ वादे ऐसे होते हैं, जिन्हें इंसान अपनी जिंदगी का मकसद बना लेता है. झुंझुनूं के मधुसूदन खेतान की कहानी भी एक ऐसे ही वादे की कहानी है. एक बेटा, जिसने महज 23 साल की उम्र में पिता को खो दिया. पीछे रह गया परिवार, आर्थिक संकट और करीब एक करोड़ रुपए की देनदारी. ऐसे मुश्किल दौर में उसने पिता की चिता के सामने एक संकल्प लिया कि एक दिन वह उनका पूरा कर्ज चुकाकर ही दम लेगा.
इस संकल्प को पूरा करने में उसे 20 साल लग गए. इस दौरान हालात बदले, संघर्ष के रास्ते खुले और जिंदगी ने कई इम्तिहान लिए, लेकिन मधुसूदन अपने वादे से पीछे नहीं हटे. जब पिता की देनदारी पूरी तरह चुका दी तो परिवार ने इसे सिर्फ खुशी का अवसर नहीं, बल्कि पिता के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में मनाया. इसी भावना के साथ अनूठा ‘ऋणमुक्ति महोत्सव’ आयोजित किया गया.
23 साल की उम्र में सिर पर आ गई परिवार और जिम्मेदारियों की छांववर्ष 2006 में मधुसूदन के पिता संतोष कुमार खेतान का निधन हो गया. पिता के जाने के बाद परिवार के सामने करीब एक करोड़ रुपए की देनदारी थी. उस समय मधुसूदन की उम्र महज 23 साल थी. यह वह उम्र थी, जब युवा अपने भविष्य के सपने बुनता है, लेकिन मधुसूदन के सामने परिवार को संभालने और पिता की जिम्मेदारी निभाने की चुनौती थी. पिता की संपत्ति बेचकर 69 लेनदारों को उनकी बकाया रकम का करीब 10 प्रतिशत भुगतान किया गया. परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए लेनदारों ने शेष 90 प्रतिशत कर्ज माफ कर दिया. यह परिवार के लिए बड़ी राहत थी, लेकिन मधुसूदन के मन में एक बात लगातार बनी रही कि पिता ने जिन लोगों से पैसा लिया था, उनकी रकम लौटाना उनकी जिम्मेदारी है.
अपनी जरूरतें छोटी कीं, लेकिन संकल्प को कभी छोटा नहीं होने दियाकर्ज चुकाने के संकल्प को पूरा करना आसान नहीं था. मधुसूदन ने अपना काम शुरू किया, सरकारी टेंडर लिए और धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की. उन्होंने अपनी जरूरतों को सीमित रखा और कमाई का बड़ा हिस्सा पिता की देनदारी चुकाने के लिए बचाते रहे. इस सफर में उनकी बड़ी बहन सुधा अग्रवाल और मनसा माता मंदिर के पुजारी राजेंद्र पांडे ने भी सहयोग और मार्गदर्शन दिया. परिचितों की मदद से 69 लेनदारों के पते तलाशे गए. इसके बाद मधुसूदन खुद एक-एक लेनदार तक पहुंचे और अपनी कमाई से वह रकम लौटाई, जिसे वे वर्षों पहले माफ कर चुके थे. कुछ लेनदारों ने तो माफ की गई रकम लेने से भी इनकार कर दिया, लेकिन मधुसूदन के लिए यह केवल पैसों का लेन-देन नहीं था. यह पिता से किया गया वादा और उनके प्रति अपने दायित्व को पूरा करने का भाव था.
संपत्ति ही नहीं, पूर्वजों की जिम्मेदारी भी विरासत में मिलती हैऋणमुक्ति महोत्सव में मौजूद एडीजे डॉ. महेंद्र के. सिंह सोलंकी ने मधुसूदन के इस प्रयास को समाज के लिए प्रेरणादायक बताया. उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार में बच्चों को संपत्ति मिलती है तो उन्हें अपने पूर्वजों की वास्तविक और प्रमाणित देनदारियों का भी ध्यान रखना चाहिए. केवल संपत्ति का उपभोग करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझना भी जरूरी है. उन्होंने इस पहल को भारतीय पारिवारिक संस्कारों और नैतिक जिम्मेदारी से जुड़ा उदाहरण बताते हुए कहा कि इससे आने वाली पीढ़ियों को भी अपने माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कर्तव्य निभाने की प्रेरणा मिलेगी.
बहनों की आंखों में आंसू, भाई के संघर्ष को मिला स्नेह का सम्मानमहोत्सव का सबसे भावुक पल तब आया, जब मधुसूदन की बड़ी बहन मधु अग्रवाल ने भाई के संघर्ष को याद किया. उन्होंने कहा कि पिता के निधन के बाद छोटे भाई ने परिवार के लिए पिता की भूमिका निभाई. कठिन परिस्थितियों में परिवार को संभाला और हर कदम पर साथ दिया. भाई के प्रति अपना स्नेह जताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान सभी को ऐसा पुत्र और भाई दे. उनके इन शब्दों के साथ समारोह का माहौल भावुक हो गया. इस दौरान मां सुमित्रा देवी और दोनों बहनों सुधा अग्रवाल एवं मधु अग्रवाल का सम्मान किया गया. यह सम्मान उन रिश्तों और सहयोग के नाम भी था, जिन्होंने मधुसूदन के संघर्ष के सफर में उनका साथ दिया.
पिता की याद को समाजसेवा से भी जोड़ापिता की देनदारी चुकाने के बाद परिवार ने इस आयोजन को समाजसेवा से भी जोड़ा. गौसेवा के लिए एक लाख 50 हजार रुपए और श्री चावोसदी दादी मंदिर सेवा के लिए एक लाख रुपए के चेक भेंट किए गए. मधुसूदन की यह कहानी केवल कर्ज चुकाने की कहानी नहीं है. यह उस सोच की कहानी है, जिसमें इंसान अपनी सुविधा से पहले अपने संस्कारों और जिम्मेदारियों को रखता है. 69 लेनदारों तक पहुंचना, माफ की गई रकम भी लौटाना और इसके लिए 20 साल तक लगातार प्रयास करना आसान नहीं था.? गुलाबी ठंड शुरू, बारिश पर आया विभाग का बड़ा अपडेट



