3 लाख तक की साड़ी, बुनकर के हाथ 10 हजार; कैथून की ये महिलाएं बिना किसी डिग्री के कर रहीं कमाल

कोटा. फैशन डिजाइनर बनने के लिए आमतौर पर बड़े संस्थानों में पढ़ाई करनी पड़ती है. डिजाइन सीखने के लिए महंगे कोर्स और कंप्यूटर की मदद ली जाती है. लेकिन राजस्थान के कोटा से करीब 15 किलोमीटर दूर कैथून में कुछ महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने न तो किसी फैशन संस्थान में पढ़ाई की और न ही डिजाइनिंग की कोई डिग्री ली. इसके बावजूद उनके हाथों से तैयार साड़ियां देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंचती हैं.
ये महिलाएं अपने अनुभव और हुनर से कोटा डोरिया साड़ियां बुनती हैं. इनकी कीमत बाजार में एक हजार रुपये से लेकर तीन लाख रुपये तक पहुंच जाती है. कैथून की इन महिला बुनकरों की कहानी जितनी खास है, उतनी ही मेहनत भरी भी. किसी ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा तो कोई पांचवीं तक पढ़ी है. लेकिन धागों के रंग, डिजाइन और बुनाई की बारीकियों की समझ ऐसी है कि उनके हाथों से तैयार साड़ी देखते ही बनती है.
कैथून की महिला बुनकरों की खास बातें
कोटा से करीब 15 किलोमीटर दूर कैथून में कोटा डोरिया साड़ियों की बुनाई होती है.
यहां कई महिलाएं बिना किसी डिग्री या फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई के साड़ियां तैयार करती हैं.
एक साड़ी बनाने में करीब 30 दिन लगते हैं और बुनकर रोज लगभग 12 घंटे काम करती हैं.
एक साड़ी के बदले बुनकर महिला को करीब 10 हजार रुपये मिलते हैं.
बाजार में कोटा डोरिया साड़ियों की कीमत एक हजार से तीन लाख रुपये तक है.
कैथून और आसपास के गांवों में करीब छह हजार लोग इस कारोबार से जुड़े हैं.
बिना डिग्री के बनीं हुनरमंद डिजाइनरकैथून में तायरा बानो, अजिजन, नसीम और शबाना जैसी कई महिलाएं इस पारंपरिक बुनाई से जुड़ी हैं. 60 साल की तायरा बानो ने कभी स्कूल में पढ़ाई नहीं की. लेकिन हथकरघे पर उन्हें 45 साल का अनुभव है. धागों के रंग और डिजाइन को लेकर उनकी समझ इसी लंबे अनुभव से आई है. अजिजन भी पढ़ी-लिखी नहीं हैं, लेकिन पिछले 25 साल से बुनाई का काम कर रही हैं. उनके लिए हथकरघा ही स्कूल और धागे ही किताबें हैं. वहीं 40 साल की नसीम पांचवीं तक पढ़ी हैं और पिछले 15 साल से साड़ी की डिजाइनिंग और बुनाई कर रही हैं. शबाना भी पांचवीं तक पढ़ी हैं. उन्हें इस काम में 25 साल का अनुभव है. इन महिलाओं ने किसी कोर्स से नहीं, बल्कि रोज हथकरघे पर बैठकर और काम करते हुए यह हुनर सीखा है.
30 दिन की मेहनत, फिर भी करीब 10 हजार रुपये
इन महिलाओं की दिनचर्या आसान नहीं है. रोज करीब 12 घंटे हथकरघे पर बैठकर काम करना पड़ता है. हफ्ते में सिर्फ एक दिन छुट्टी मिलती है. एक साड़ी तैयार करने में करीब 30 दिन लग जाते हैं. इसके बाद बुनकर को लगभग 10 हजार रुपये मिलते हैं. अगर महीने भर की मेहनत का हिसाब लगाएं तो रोज की कमाई करीब 380 रुपये बैठती है. एक घंटे के हिसाब से यह रकम लगभग 32 रुपये होती है. दूसरी तरफ बाजार में कोटा डोरिया की खास साड़ियों की कीमत तीन लाख रुपये तक पहुंच जाती है. यानी जिस साड़ी को तैयार करने में बुनकर महिलाएं अपना पूरा महीना लगा देती हैं, वही साड़ी बाजार में काफी ऊंची कीमत पर बिक सकती है. हालांकि साड़ी की कीमत उसके डिजाइन, इस्तेमाल किए गए धागों और उस पर हुए काम के हिसाब से तय होती है.
मैसूर से कैथून तक पहुंची बुनाई की परंपराकैथून में कोटा डोरिया की बुनाई कोई नया काम नहीं है. इसका इतिहास सौ साल से भी पुराना माना जाता है. बताया जाता है कि मैसूर से आए कुछ परिवारों ने यहां इस बुनाई की शुरुआत की थी. बाद में कोटा राजपरिवार का संरक्षण मिलने से इसे पहचान मिली. धीरे-धीरे यह कला कैथून की पहचान बन गई और पीढ़ी दर पीढ़ी लोग इससे जुड़ते चले गए. कोटा डोरिया साड़ी की सबसे बड़ी पहचान उसका हल्कापन और चौखानेदार बुनावट है. इसमें कपास और रेशम के धागों का इस्तेमाल किया जाता है. मशीनों के बजाय पारंपरिक हथकरघे पर बुनकर अपने हाथों से इसका डिजाइन तैयार करते हैं. यही वजह है कि इसकी बुनाई में समय और मेहनत दोनों लगते हैं.
चावल और प्याज के पेस्ट से शुरू होती है तैयारीसाड़ी तैयार करने का काम सीधे हथकरघे पर बुनाई से शुरू नहीं होता. सबसे पहले धागों को तैयार किया जाता है. इसके बाद उन्हें तान पर चढ़ाया जाता है. धागों को मजबूती देने के लिए चावल और प्याज से बने पारंपरिक पेस्ट का इस्तेमाल किया जाता है. फिर रंग और डिजाइन के हिसाब से धागों को हथकरघे पर लगाया जाता है. इसके बाद शुरू होता है सबसे मेहनत वाला काम. बुनकर एक-एक धागे को जोड़कर साड़ी में चौखानेदार डिजाइन तैयार करती हैं. साड़ी के प्रकार के हिसाब से इसे तैयार होने में अलग-अलग समय लगता है.
सामान्य साड़ी बनाने में 15 से 20 दिन लगते हैं.
डिजाइनर साड़ी तैयार करने में 20 से 25 दिन का समय लगता है.
सोने और चांदी के तारों वाली जरिया साड़ी बनाने में करीब तीन महीने लगते हैं.
जरिया साड़ी पर तीन से चार बुनकर मिलकर काम करती हैं. कई बार परिवार के दूसरे सदस्य भी इसमें हाथ बंटाते हैं.
करीब छह हजार लोगों की रोजी-रोटी का सहाराकैथून में कोटा डोरिया का काम सिर्फ एक पारंपरिक कला नहीं, बल्कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया भी है. यहां करीब छह हजार लोग इस कारोबार से जुड़े हैं. आसपास के 12 गांवों में लगभग तीन हजार हथकरघे चलते हैं. यहां रोज करीब 400 से 500 साड़ियां तैयार होती हैं. कई परिवारों की आमदनी पूरी तरह इसी काम पर निर्भर है. महिलाएं भी घर की जिम्मेदारी निभाने के साथ बुनाई करके परिवार की कमाई में योगदान देती हैं.
एक हजार से तीन लाख रुपये तक है साड़ी की कीमतकोटा डोरिया की मांग राजस्थान तक सीमित नहीं है. देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा विदेशों में रहने वाले लोग भी अपने रिश्तेदारों के जरिए कैथून से साड़ियां मंगवाते हैं. साड़ी की कीमत उसके डिजाइन, बुनाई और इस्तेमाल किए गए धागों पर निर्भर करती है. सामान्य साड़ियां करीब एक हजार रुपये से मिलना शुरू होती हैं, जबकि खास जरिया साड़ियों की कीमत तीन लाख रुपये तक पहुंच सकती हैं. असली कोटा डोरिया की पहचान के लिए इसे GI टैग भी मिला हुआ है. यह टैग भारत सरकार की ओर से किसी खास इलाके से जुड़ी पारंपरिक चीज की पहचान बताता है. ऐसे में कोटा डोरिया के नाम पर बाजार में मिलने वाली साड़ियों में असली उत्पाद की पहचान के लिए यह टैग अहम है.
बिना किसी डिग्री के अनुभव के दम पर कर रहीं कमालकैथून की इन महिलाओं के हाथों में ऐसा हुनर है, जिसे सीखने के लिए किसी बड़ी डिग्री की जरूरत नहीं पड़ी. दशकों का अनुभव और रोज की मेहनत ही इनकी असली पूंजी है. लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी है. तीन लाख रुपये तक बिकने वाली साड़ी बनाने वाली महिला को एक महीने की मेहनत के बदले करीब 10 हजार रुपये मिलते हैं. यही सवाल छोड़ जाता है कि इतनी पुरानी कला को जिंदा रखने वाली इन हुनरमंद महिलाओं को उनकी मेहनत की सही कीमत कब मिलेगी.



