शादी भारत में, तलाक ब्रिटेन में… क्या विदेशी अदालत का फैसला मान्य होगा? सुप्रीम कोर्ट ने किया साफ

विदेश जाकर तलाक लेना और फिर भारत में उस आदेश को मान्य मान लेना आसान नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में साफ किया कि अगर किसी विदेशी अदालत ने वैवाहिक संबंधों में सुधार की कोई उम्मीद नहीं होने के आधार पर तलाक दिया है, तो ऐसा आदेश अपने आप भारत में कानूनी मान्यता हासिल नहीं कर सकता. अदालत ने कहा कि विदेश में मिली तलाक की डिक्री को भारत में लागू होने के लिए यहां के कानूनों और कानूनी शर्तों पर खरा उतरना होगा.
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने यह टिप्पणी एक ऐसे व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए की, जिसने अपने खिलाफ दर्ज दो शादियों और आपराधिक साजिश के मामले को रद्द करने की मांग की थी. पति की दलील थी कि ब्रिटेन की अदालत से तलाक मिलने के बाद दूसरी शादी को द्विविवाह का अपराध नहीं माना जाना चाहिए. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया.
भारत में हुई पहली शादी, फिर ब्रिटेन में जाकर लिया तलाक
दरअसल इस शख्स ने 18 अप्रैल 2003 को आंध्र प्रदेश के सत्तेनपल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार पहली पत्नी से शादी की थी. शादी के बाद दोनों हैदराबाद में रहने लगे. उस समय पति उस्मानिया मेडिकल कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा था.
4 फरवरी 2005 को वह डॉक्टर के रूप में अपना करियर बनाने के लिए ब्रिटेन चला गया. कुछ समय बाद उसकी पत्नी भी वहां पहुंच गई. हालांकि, अगस्त 2007 में पहली पत्नी बच्चे को जन्म देने के लिए भारत में अपने मायके लौट आई. पति का दावा था कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद पत्नी ब्रिटेन वापस नहीं आई. इसके बाद दोनों के बीच वैवाहिक संबंध लगातार खराब होते चले गए.
भारत की अदालत से नहीं मिली राहत
वैवाहिक विवाद बढ़ने पर पति ने आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के नरसारावपेट की सक्षम अदालत में तलाक और बच्चे की अभिरक्षा को लेकर याचिका दायर की. हालांकि, उसकी याचिका खारिज कर दी गई. इसके बाद उसने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया.
इस बीच, 1 फरवरी 2013 को पति को ब्रिटेन की नागरिकता मिल गई. इसके बाद उसने इंग्लैंड की कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट में पहली पत्नी के खिलाफ तलाक की कार्यवाही शुरू की. ब्रिटेन की अदालत ने 2014 में तलाक का आदेश दे दिया. पति ने इसी विदेशी आदेश को आधार बनाकर भारत में अपने खिलाफ दर्ज द्विविवाह के मामले को चुनौती दी थी.
SC ने क्यों नहीं मानी विदेशी अदालत की तलाक की डिक्री?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली शादी भारत में हिंदू रीति-रिवाजों के तहत हुई थी. ऐसे में उस विवाह पर लागू भारतीय कानूनों को नजरअंदाज करके विदेशी अदालत से मिला तलाक भारत में स्वतः मान्य नहीं हो सकता.
पीठ के मुताबिक, विदेशी अदालत ने जिस आधार पर तलाक दिया, उसे भारतीय कानून में कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं थी. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विदेशी तलाक की डिक्री को भारत में मान्यता मिलने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 13 में तय कानूनी कसौटियों पर खरा उतरना जरूरी है.
अदालत ने कहा कि जब पहली शादी भारत में हुई थी, तो दूसरी शादी विदेश में होने भर से भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत द्विविवाह के आरोप कमजोर नहीं पड़ जाते. इस अपराध की जांच करते समय सिर्फ दूसरी शादी कहां हुई, यह देखना पर्याप्त नहीं है. पहले से मौजूद वैवाहिक संबंधों को भी ध्यान में रखना होगा.
इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि विदेश में हासिल किया गया तलाक का आदेश भारत में कानूनी रूप से तभी प्रभावी होगा, जब वह भारतीय कानून की निर्धारित शर्तों को पूरा करता हो.



