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खेती में नवाचार: रायल पाटीदार का जैविक घोल से लागत कम और उपज बढ़ी.

Last Updated:December 23, 2025, 19:16 IST

Agriculture News : झालावाड़ के किसान रायल पाटीदार ने जीवाणुओं से जैविक घोल बनाकर खेती में नवाचार किया, जिससे खाद और केंचुए की जरूरत खत्म हुई और 32 फलदार पौधों की खेती सफल रही. सुरसिंह तहसील के सनसिया गांव निवासी किसान रायल पाटीदार ने जीवाणुओं की मदद से एक विशेष जैविक घोल तैयार किया है.

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जयपुर. आज के दौर में जहां किसान महंगी खाद और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं, वहीं राजस्थान के झालावाड़ जिले के किसान ने खेती में नवाचार करके इस समस्या का समाधान किया है. दो साल की मेहनत और रिसर्च के बाद एक प्रगतिशील किसान ने जीवाणुओं से ऐसा घोल तैयार किया है, जिसने खेती की दिशा ही बदल दी है. अब न तो बाजार से बार-बार खाद लाने की जरूरत है और न ही केंचुए खरीदने की मजबूरी.

सुरसिंह तहसील के सनसिया गांव निवासी किसान रायल पाटीदार ने जीवाणुओं की मदद से एक विशेष जैविक घोल तैयार किया है. इस घोल के प्रयोग से खेत की मिट्टी खुद उपजाऊ हो जाती है और केंचुए खुद ही पैदा होने लगते हैं. यही कारण है कि किसान को अब बाहर से किसी भी तरह की रासायनिक खाद या वर्मी कम्पोस्ट लाने की आवश्यकता नहीं पड़ती.

बागवानी और पारंपरिक खेती में नवाचार रायल पाटीदार ने बताया कि उनके पास 25 एकड़ कृषि भूमि है, जहां वे बागवानी और पारंपरिक खेती करते हैं. पहले उन्हें हर साल खाद और केंचुओं पर लाखों रुपये खर्च करने पड़ते थे. इस समस्या का समाधान खोजते हुए उन्होंने कृषि विशेषज्ञों से संपर्क किया और जैविक जीवाणुओं पर प्रयोग शुरू किया. बाजार से जैविक बैक्टीरिया का एक पैकेट लाकर उसमें 100 लीटर पानी और एक किलो गुड़ मिलाया गया. इस मिश्रण को 5 से 7 दिन तक सुबह-शाम हिलाया गया, जिसके बाद घोल पूरी तरह तैयार हो गया.

इस घोल को खेत में ड्रिप या बाल्टी के माध्यम से पानी के साथ दिया गया. इसका असर कुछ ही महीनों में दिखने लगा. खेत की मिट्टी में नमी बढ़ी, केंचुओं की संख्या लाखों में पहुंच गई और फसलों की गुणवत्ता में भी स्पष्ट सुधार देखने को मिला. खास बात यह रही कि इस विधि में न तो अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पड़ी और न ही किसी महंगे उपकरण की.

32 प्रकार के फलदार पौधों की खेती किसान पाटीदार के खेत में इस समय आम, सेब, मौसमी, संतरा, नारंगी सहित करीब 32 प्रकार के फलदार पौधे लहलहा रहे हैं.कुछ पौधों पर यह प्रयोग पहले किया गया और सफलता मिलने के बाद पूरे खेत में इसे अपनाया गया. उनका कहना है कि एक बार यह घोल तैयार करने के बाद लंबे समय तक खाद और केंचुओं की चिंता खत्म हो जाती है. यह प्रयोग न केवल लागत कम करता है, बल्कि मिट्टी की सेहत को भी बेहतर बनाता है. रासायनिक खेती से होने वाले नुकसान से बचाते हुए यह विधि प्राकृतिक संतुलन बनाए रखती है. यही वजह है कि आसपास के किसान भी अब इस तकनीक को अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं. आज जब देश टिकाऊ और जैविक खेती की ओर बढ़ रहा है.

About the AuthorAnand Pandey

नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें

Location :

Jaipur,Rajasthan

First Published :

December 23, 2025, 19:16 IST

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