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तेलंगाना की पोचमपल्ली-गडवाल साड़ियों को मिला GI टैग और पहचान

Last Updated:January 10, 2026, 16:34 IST

तेलंगाना की पोचमपल्ली और गडवाल साड़ियां न केवल भारत की बल्कि विश्व की हस्तकला धरोहर का हिस्सा हैं. पोचमपल्ली की इक्कत कला और गडवाल की सिक्को बुनाई न सिर्फ पारंपरिक सौंदर्य को दर्शाती हैं, बल्कि GI टैग की सुरक्षा के साथ आज भी हजारों परिवारों की जीविका का स्रोत हैं. ये साड़ियां केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध रेशमी विरासत का प्रतीक हैं.

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हैदराबाद. भारतीय हथकरघा उद्योग में तेलंगाना का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, यहां की दो विरासतें—पोचमपल्ली और गडवाल, न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं. जहां एक तरफ पोचमपल्ली की इक्कत कला को यूनेस्को तक ने सराहा है, वहीं गडवाल की साड़ियां दक्षिण भारतीय परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं. पोचमपल्ली, भारत की सिल्क सिटी कहलाती है. तेलंगाना के यदाद्रि भुवनगिरी जिले में स्थित पोचमपल्ली को भारत की सिल्क सिटी कहा जाता है. यहां की पहचान इक्कत (Ikat) शैली की टाई-एंड-डाई कला है.

पोचमपल्ली साड़ियों की खासियत यह है कि इसमें धागों को बुनने से पहले ही रंगों से रंगा जाता है. यह एक गणितीय सटीकता वाला काम है, जिसमें ताने-बाने को इस तरह बुना जाता है कि कपड़े पर Geometric डिज़ाइन उभर आते हैं. पोचमपल्ली को 2004 में भारत का पहला GI टैग प्राप्त हुआ था. इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन (UNWTO) ने पोचमपल्ली को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांवों में से एक चुना है.

जोगुलम्बा गडवाल

तेलंगाना के जोगुलम्बा गडवाल जिले की गडवाल साड़ियां अपनी अनूठी बुनाई तकनीक के लिए जानी जाती हैं. इनकी सबसे बड़ी विशेषता सिक्को है, जो सूती और रेशम का एक अद्भुत मिश्रण है. गडवाल साड़ियों में साड़ी का मुख्य भाग सूती का होता है, जबकि उसका बॉर्डर और पल्लू शुद्ध रेशम और सुनहरी ज़री से बना होता है. इन दोनों अलग-अलग कपड़ों को कुट्टम तकनीक से जोड़ा जाता है, जो इसे मजबूती और खूबसूरती प्रदान करता है. इन साड़ियों के बॉर्डर पर अक्सर मंदिर के गोपुरम और पारंपरिक आकृतियां उकेरी जाती हैं, जो दक्षिण भारतीय संस्कृति को दर्शाती हैं.

GI टैग की भूमिका

इन दोनों ही कलाओं को GI टैग प्राप्त है, जो नकल को रोकने और असली बुनकरों के हितों की रक्षा करने में मदद करता है. आज के समय में, जब मशीनरी का बोलबाला है, पोचमपल्ली और गडवाल के हजारों परिवार आज भी इस पारंपरिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं. तेलंगाना की ये साड़ियां केवल वस्त्र नहीं बल्कि भारत की उस समृद्ध वस्त्र विरासत का प्रमाण हैं, जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हो रही है.

About the AuthorMonali Paul

Hello I am Monali, born and brought up in Jaipur. Working in media industry from last 9 years as an News presenter cum news editor. Came so far worked with media houses like First India News, Etv Bharat and NEW…और पढ़ें

Location :

Hyderabad,Telangana

First Published :

January 10, 2026, 16:34 IST

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