रेडियो सुनने का पुराना लाइसेंस बीकानेर

Last Updated:April 22, 2026, 10:16 IST
Rare 1970 Radio TV License Document Bikaner: बीकानेर के संग्रहकर्ता किशन सोनी ने अपने संग्रह में 50 साल पुराना रेडियो-टेलीविजन लाइसेंस साझा किया है, जो उस दौर की याद दिलाता है जब मनोरंजन के लिए भी सरकारी अनुमति अनिवार्य थी. 1927 में शुरू हुई यह लाइसेंस प्रणाली पोस्ट ऑफिस के माध्यम से संचालित होती थी और हर साल इसका नवीनीकरण कराना पड़ता था. 1980 के दशक में तकनीकी विस्तार के साथ इस व्यवस्था को खत्म किया गया.
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Bikaner: आज के डिजिटल दौर में जहाँ मोबाइल और इंटरनेट पर मनोरंजन की कोई सीमा नहीं है, वहीं राजस्थान के बीकानेर से एक ऐसा दस्तावेज सामने आया है जो हमें संचार के एक अलग युग में ले जाता है. बीकानेर के प्रसिद्ध संग्रहकर्ता किशन सोनी ने अपने संग्रह में 50 साल से भी अधिक पुराना ‘रेडियो-टेलीविजन लाइसेंस’ सुरक्षित रखा है. यह दस्तावेज उस दौर की याद दिलाता है जब घर में रेडियो रखना या टीवी देखना केवल अमीरी की निशानी नहीं था, बल्कि इसके लिए सरकार से बाकायदा अनुमति लेनी पड़ती थी. आज की पीढ़ी के लिए यह विश्वास करना कठिन है कि कभी संगीत सुनने के लिए भी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, लेकिन यह इतिहास की एक ठोस हकीकत है.
संग्रहकर्ता किशन सोनी के अनुसार भारत में रेडियो लाइसेंस प्रणाली की शुरुआत वर्ष 1927 में हुई थी. उस समय रेडियो सूचना के आदान-प्रदान का एक बेहद महत्वपूर्ण और सीमित साधन था, इसलिए ब्रिटिश हुकूमत ने इसके उपयोग पर नियंत्रण रखने के लिए लाइसेंस अनिवार्य किया था. आजादी के बाद भी यह व्यवस्था जारी रही और जब टेलीविजन का आगमन हुआ, तो उसे भी इसी श्रेणी में शामिल कर लिया गया. किशन सोनी के पास मौजूद वर्ष 1970 का लाइसेंस उस दौर की प्रशासनिक व्यवस्था का सजीव प्रमाण है. बिना लाइसेंस के रेडियो सुनना नियमों का उल्लंघन माना जाता था और इसके लिए जुर्माने का भी प्रावधान था.
8 से 10 पन्नों की ‘रेडियो डायरी’ और नवीनीकरणयह पुराना लाइसेंस कोई साधारण कागज नहीं, बल्कि 8 से 10 पृष्ठों की एक छोटी पुस्तिका होती थी. इसमें लाइसेंसधारी का नाम, पूरा पता, रेडियो या टीवी का मॉडल और उससे जुड़ी तकनीकी जानकारी दर्ज की जाती थी. दिलचस्प बात यह है कि यह लाइसेंस केवल एक वर्ष के लिए वैध होता था. हर साल व्यक्ति को पोस्ट ऑफिस (डाकघर) जाकर इसे रिन्यू करवाना पड़ता था. जिस तरह आज हम अपने वाहनों का रजिस्ट्रेशन या ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू करवाते हैं, ठीक वैसी ही प्रक्रिया उस समय रेडियो के लिए अपनाई जाती थी. पोस्ट ऑफिस की मुहर और रसीद इस बात का सबूत होती थी कि संबंधित व्यक्ति कानूनन रेडियो सुनने का हकदार है.
तकनीकी विस्तार और 1980 के दशक में अंतसंचार माध्यमों में आई क्रांति और रेडियो-टीवी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण 1980 के दशक के मध्य तक सरकार ने महसूस किया कि इस व्यवस्था को जारी रखना कठिन और अनावश्यक है. तकनीकी विस्तार और उदार नीतियों के चलते अंततः इस लाइसेंस प्रणाली को समाप्त कर दिया गया. इसके बाद रेडियो और टीवी आम जनता के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र उपकरण बन गए. किशन सोनी जैसे संग्रहकर्ताओं की मेहनत के कारण ही आज की युवा पीढ़ी इन रोचक तथ्यों से रू-ब-रू हो पा रही है. उनका यह संग्रह न केवल तकनीक के विकास को दर्शाता है, बल्कि समाज के बदलते नियमों और प्रशासनिक इतिहास की एक अनूठी कहानी भी पेश करता है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें
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Location :
Bikaner,Bikaner,Rajasthan
First Published :
April 22, 2026, 10:15 IST



