Rajasthan

करोड़ों का कारोबार छोड़ दंपती ने अपनाया संन्यास! दो बेटों संग ली दीक्षा, कहानी सुनकर रह जाएंगे हैरान

Last Updated:April 24, 2026, 13:20 IST

Jirawala Jain Tirth Diksha Mahotsav: राजस्थान के सिरोही जिले से एक प्रेरणादायक और अनोखी आध्यात्मिक कहानी सामने आई है, जहां एक कारोबारी दंपती ने अपने दो बेटों के साथ सांसारिक मोह-माया त्यागकर दीक्षा ग्रहण की. प्लास्टिक कारोबार से जुड़े दुग्गड़ परिवार ने जीरावाला जैन तीर्थ में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया. यह परिवार सिरोही के तीखी गांव का निवासी है और वर्षों से व्यवसाय में सक्रिय था. लेकिन वैराग्य भाव जागृत होने के बाद उन्होंने भौतिक जीवन को छोड़कर संयम और आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया. पूरे परिवार का एक साथ दीक्षा लेना समाज के लिए एक दुर्लभ और प्रेरणादायक उदाहरण है.

हर शुभभावों की गंगोत्री परमात्मा है| हर शुभकार्यो से ऊँचा हिमालय परमात्मा है. परमात्मा को पाने की साधना ही संयम जीवन है. आत्मा की पहचान परमात्मा ही करवाते हैं. आधि-व्याधि व उपाधियों से भरे संसार में शीतलता प्रदान करने वाला मार्ग संयम जीवन है. संयम भवसमुद्र से पार उतारने वाली नौका है. ये उद्गार थे 500 श्रमणी गणनायक जैनाचार्य श्री रश्मिरत्नसूरीश्वरजी म० सा० के जग जयवंत श्री जीरावला पार्श्वनाथ जैन तीर्थ में प्रथम बार हो रही परिवार दीक्षा निमित्त आयोजित त्रिदिवसीय दीक्षामहोत्सव के दूसरे दिन आयोजित परमात्मा भक्तिस्वरूप श्री शक्रस्तव अभिषेक में उपरोक्त उद्गार जैनाचार्य श्री रश्मिरत्नसूरीजी ने व्यक्त किये.

आध्यात्मिक प्रवचनकार पंन्यास श्री यशरत्न विजयजी ने बताया कि जीवन गाडी के ड्राइवर परमात्मा बनाना वो ही संयम जीवन है. संयम यानि जीवन गाड़ी की ब्रेक. जिस गाड़ी में ब्रेक न हो वह गाड़ी फेल है. आज निरंकुशता वैश्विक बिमारी है. अंकुश किसी को पसंद ही नहीं आता. सभी मुमुक्षु प्रभु के अंकुश को स्वीकारते हैं. तलैटी से ऊपर उठे बिना शिखर नहीं मिलता. संसार तलैटी है उसको छोड़े बिना परमात्मा का शिखर नहीं मिलता. विविध उत्तम औषधियों से परमात्मा श्री जीरावला पार्श्वनाथ दादा का अभिषेक किया| दोपहर में अंतिम वायणा व धर्मोपदेश हुआ| रात्रि में विदाय समारोह हुआ. मुमुक्षुओं ने अपने वक्तव्य में कहा कि श्रीसंघ के आशीर्वाद हमें ऐसे मिले कि हम जिसे छोड़ रहे हैं, उसकी याद न आये और जिसके लिये छोड़ रहे हैं, को लक्ष्य न भूले. गुरुवार को सुबह छ बजे दीक्षा की मंगल विधि का प्रारंभ होगा.

चारों मुमुक्षुओं का पावन परिचय: मुमुक्षु अनिल दुगड़ जैन राजस्थान के सिरोही के निवासी है. बीकॉम तक पढ़ने के बाद गदग के समताजी के साथ विवाहसूत्र में बंधे. मुंबई वाशी में वर्षों तक प्लासटिक उद्योग से जुड़े रहे| फिर जालोर में अपना व्यवसाय आगे बढ़ाया| दोनों पुत्र दक्ष व प्राकृत संस्कारी शिक्षण देने हेतु तपोवन जैन विद्यापीठ में पढाये वैराग्य भाव जगते ही पूरी फैमिली गुरुकुल वास में रहकर पांच प्रतिक्रमण, नवस्मरण, चार प्रकरण, वैराग्य शतक का अध्ययन किया. वैराग्य शतक की बात दिल को छू गई.

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“हर इंसान के पीछे तीन आतंकवादी हाथ धोकर पीछे पड़े हुए है. रोग, बुढ़ापा व मृत्यु” कोई इनसे बच नहीं सकते. जीवमात्र की रक्षा करने वाले संयम जीवन में अभय है. संयम जीवन में केशलुंचन व पाद विहार का कष्ट जरूर है परंतु जीवन पालन का अपार आनंद है.

मुमुक्षु का परिचय: सिरोही निवासी मुमुक्षु अनिल दुगड़ जैन बीकॉम शिक्षित हैं. उन्होंने मुंबई वाशी में प्लास्टिक उद्योग में कार्य करने के बाद जालोर में व्यवसाय स्थापित किया. वैराग्य भाव जागृत होने पर उन्होंने परिवार सहित गुरुकुल में रहकर धार्मिक अध्ययन किया. उन्होंने कहा कि जीवन में रोग, बुढ़ापा और मृत्यु जैसे तीन आतंक सदैव साथ रहते हैं. जिनसे कोई बच नहीं सकता. संयम जीवन ही सच्चे आनंद और आत्मकल्याण का मार्ग है.

कारोबारी दंपती ने त्यागी मोहमाया, दो बेटों के साथ ग्रहण की दीक्षा: सिरोही यह कहानी सिरोही के बिजनेसमैन की है. उन्होंने गुरुवार को मोहमाया सबकुछ छोड़कर अपने परिवार के साथ दीक्षा ग्रहण कर ली है. दंपती ने जीरावाला जैन तीर्थ में दीक्षा ग्रहण की है. प्लास्टिक के कारोबार से जुड़ा दुग्गड़ परिवार सिरोही के तीखी गांव का रहने वाला है.

First Published :

April 24, 2026, 13:20 IST

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