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विधानसभा चुनावों में 5 वो मौके, जब रिकॉर्ड वोटिंग हुई, तब क्या हुआ, कम वोटिंग के रिजल्ट भी जानें

बंगाल विधानसभा चुनावों के 152 सीटों के लिए हुए पहले चरण में बंपर वोटिंग हुई और रिकॉर्ड टूट गया. आंकड़े कहते हैं कि बंगाल में 92 फीसदी से ज्यादा लोगों ने वोट डाले. अब इतनी जबरदस्त वोटिंग के बाद पॉलिटिकल पार्टियां, चुनाव विश्लेषक अपने अपने तरीके से इसका विश्लेषण कर रहे हैं. आखिर क्या होता है जबकि किसी भी चुनाव में रिकॉर्ड वोटिंग होती है. ये ज्यादा पड़े वोट सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में होते हैं या उसके शासन के खिलाफ असंतोष.

विधानसभा चुनावों में “रिकॉर्ड वोटिंग” अक्सर एक संकेत होता है—या तो जनता में गुस्सा है, या बदलाव की तीव्र इच्छा या फिर कोई बड़ा राजनीतिक मोड़. दिलचस्प बात ये है कि कई बार भारी मतदान ने सत्ता पलट दी तो कुछ मामलों में उसी सरकार को और मजबूत कर दिया. ऐसे ही पांच मामलों पर नजर दौड़ाते हैं जबकि विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड वोटिंग हुई.

1. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021

यानि बंगाल में जब पिछली बार विधानसभा चुनाव हुए तो क्या हुआ था. उस समय 80% से ज्यादा वोटिंग हुई. इस ज्यादा वोटिंग ने तब भी वोटिंग का रिकॉर्ड तोड़ा. भारतीय चुनाव आयोग ने तब 82फीसदी टर्नआउट का आंकड़ा बताया. तब भी चुनाव राज्य की सत्ताधारी पार्टी यानि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और नरेंद्र मोदी की बीजेपी के बीच हुआ.

पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड वोटिंग दर्ज की गई.

ये चुनाव काफी कांटे का था. जब भारी वोटिंग हुई तो लोगों ने कहा कि ज्यादा वोटिंग एंटी एंकेंबेसी फैक्टर की वजह हो सकती है लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो पता लगा कि ये ज्यादा वोटिंग तृणमूल के खिलाफ थी. उसने और ज्यादा जोरदार तरीके से सत्ता को बरकरार रखा. इसने ये संदेश दिया कि ज्यादा वोटिंग हमेशा एंटी-एंकंबेंसी नहीं होती—कभी-कभी यह मौजूदा सरकार के पक्ष में भी लामबंदी होती है.

2. बिहार विधानसभा चुनाव 2015

ये वर्ष 2015 की बात है जबकि बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए. तब टोटल वोट टर्नआउट 57 फीसदी रहा. उस चुनावों में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड ने लालू प्रसाद यादव के साथ महागठबंधन के साथ गठबंधन किया था. उनका मुकाबला बीजेपी से था. मुकाबला जबरदस्त बताया जा रहा था. परिणाम आया तो पता लगा कि महागठबंधन ने भारी जीत हासिल की है. भारतीय जनता पार्टी को करारी हार हासिल हुई. उस चुनाव में ज्यादा मतदान ने सामाजिक समीकरणों को सक्रिय किया और सत्ता बदल दी.

3. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017

उस चुनाव में यूपी विधानसभा के लिए 61 फीसदी रिकॉर्ड वोट पड़े. भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और विकास बड़ा मुद्दा था. भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक तरीके से जीत हासिल की. तब अखिलेश यादव सत्ता में थे. उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा. उस साल रिकॉर्ड वोटों ने सत्ता बदलाव के लिए जनादेश दिया. इस चुनाव के बाद योगी यूपी के मुख्यमंत्री बने.

4. त्रिपुरा विधानसभा चुनाव 2018

इस चुनावों में 89% के करीब रिकॉर्ड मतदान हुआ. ये वोटिंग उस समय भारत में सबसे ज्यादा वोटिंग में एक मानी गई. त्रिपुरा में 25 सालों से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानि सीपीआई (एम) का शासन जारी था. जोरदार वोटिंग ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया. वहां बीजेपी ने जबरदस्त जीत के साथ सरकार बनाई. यानि चुनाव में रिकॉर्ड वोटिंग ने वामपंथी किला गिरा दिया. संदेश ये भी है कि जब वोटिंग बहुत ज्यादा होती है, तो यह “साइलेंट वेव” का संकेत हो सकता है.

जब भी ज्यादा वोटिंग होती है तो ये जरूरी नहीं है कि सत्ता बदलाव ही हो, कई बार इसका उल्टा भी हुआ है. (फाइल फोटो)

5. दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015

दिल्ली विधानसभा चुनावों में 67% मतदान हुआ. भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के बाद नई राजनीति का उभार हो रहा था. अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस आंदोलन से पैदा हुई. इस पार्टी को जनता के खूब वोट मिले. आम आदमी पार्टी की 70 में 67 सीटों पर जीत हुई. यानि दिल्ली में ज्यादा वोटिंग नेअरविंद केजरीवाल की ऐतिहासिक वापसी सुनिश्चित कर दी. यहां पर जाहिर होता है कि रिकॉर्ड वोटिंग का मतलब हमेशा एक जैसा नहीं होता, लेकिन कुछ पैटर्न साफ दिखते हैं.

यानि ये जाहिर है कि हर बार चुनावों में जब ज्यादा वोट पड़ते हैं तो वो सत्ता बदलने के लिए भी होते हैं. कई बार सत्ताधारी पार्टी को और मजबूती देने के लिए भी.

लोकसभा चुनावों में ऐसे 3 मौके

– वर्ष 2019 में लोकसभा चुनावों में रिकॉर्डतोड़ 67.40 फीसदी वोट पड़े. जिसके चलिए केंद्र बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए 353 सीटें जीतीं. खुद बीजेपी ने 303 सीटें पाईं. नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बने. वोट ज्यादा पड़े और बीजेपी की सीटें और ज्यादा हो गईं.

– वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में 66.44 फीसदी वोट पड़े, जो एक रिकॉर्ड था. इसके जरिए बीजेपी ने 282 सीटें जीतकर क्लियर मेजोरिटी हासिल की और एनडीए (336) के साथ मिलकर सरकार बनाई. नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने. ये वोट बदलाव के लिए पड़े. केंद्र में कांंग्रेस सरकार का सफाया हो गया.

– 1984 के चुनावों में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस की जबरदस्त जीत हुई. कुल मिलकर 64.1 फीसदी वोट पड़े. कांग्रेस ने रिकॉर्ड 414 सीटें जीतीं. इस बार कांग्रेस को जनता ने कहीं ज्यादा ताकत देकर बहुमत से जिताया.

तो क्या कहती है ज्यादा वोटिंग

भारत के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड वोटिंग के रिजल्ट मिलेजुले रहे हैं – कभी सत्ताधारी पार्टी मजबूत हुई तो कभी सत्ता बदली. मतलब ये है कि हाई वोटिंग का ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है, क्योंकि यह असंतोष या उत्साह दोनों से जुड़ा हो सकता है. हालांकि इस बार बंगाल की ज्यादा वोटिंग की वजह एसआईआर, वोटिंग लिस्ट से नाम कटने का भय, राज्य सरकार के खिलाफ असंतोष आदि बताया जा रहा है.

– लोकसभा – 2014 (66.4%) और 2019 (67.4%) में बीजेपी की भारी जीत हुई, जबकि 1984 (64%) में कांग्रेस ने सफाया ही कर दिया था. 1977 और 2014 जैसे मामलों में सत्ता परिवर्तन भी हुआ.

विधानसभा – विधानसभा चुनावों में इस बार सभी राज्यों यानि पुदुच्चेरी (89.9%), असम और बंगाल में रिकॉर्ड टर्नआउट सामने आया है, इनके रिजल्ट आने हैं. ऐसे मामलों में 2025 में बिहार (66.9%) में एनडीए जीता, 2023 मध्य प्रदेश (76%) में बीजेपी की जबरदस्त जीत हुई.

कम वोटिंग में क्या हुआ

भारत के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कम वोटिंग वाले मामलों में भी सरकारें कभी बदलीं, कभी नहीं. कोई निश्चित पैटर्न नहीं दिखा. लिहाजा कम टर्नआउट सत्ताधारी पार्टी के पक्ष या विपक्ष दोनों में जा सकता है.

लोकसभा1971: सबसे कम वोटिंग (41.33%, 1967 से 5.7% गिरावट हुई). फिर भी कांग्रेस (इंदिरा गांधी) सत्ता में बनी रही.1980: 56.9% वोटिंग, जनता पार्टी हारी, कांग्रेस (इंदिरा) वापस आई, सरकार बदली.1989: वोटिंग घटी, वी.पी. सिंह सरकार बनी यानि सत्ता में बदलाव हुआ.1991: फिर घटी, कांग्रेस सत्ता में लौटी.कुल मिलाकर, पिछले 12 लोकसभा चुनावों में 5 बार वोटिंग घटी, जिनमें 4 बार सरकार बदली लेकिन 1 बार सत्ताधारी पार्टी बनी रही.

विधानसभाकम टर्नआउट वाले राज्य चुनावों में भी मिश्रित परिणाम देखने को मिले.कई मामलों में सत्ताधारी पार्टी हारी, जैसे 2018-19 के कुछ राज्यों में 50-55% टर्नआउट पर सत्ता बदल गई, लेकिन 2000 पहले दो दशकों में कुछ चुनावों में कम वोटिंग के बावजूद सत्ताधारी जीती. विश्लेषण बताते हैं कि विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे ज्यादा मायने रखते हैं.

कम वोटिंग अक्सर सत्ताधारी के खिलाफ असंतोष का संकेत मानी जाती है. लेकिन अपवाद भी है. लिहाजा गारंटी कुछ नहीं है.

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