Paniya Nada Temple | जालौर पनिया नाडा मंदिर का इतिहास और चमत्कार

Last Updated:April 26, 2026, 06:30 IST
Paniya Nada Temple Jalore History and Miracles: जालौर की पहाड़ियों में स्थित पनिया नाडा मंदिर अपनी चमत्कारिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. इसकी स्थापना करणा राम देवासी ने संत रूपनाथ जी के स्वप्न दर्शन के बाद की थी. यह मंदिर नाथ संप्रदाय की तपोभूमि है और यहाँ मन्नत मांगने व फेरी लगाने से रोगों के ठीक होने की मान्यता है. हर महीने शुक्ल पक्ष की दूज को यहाँ विशाल मेला और जागरण आयोजित होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं. शांतिनाथ जी महाराज के सहयोग से निर्मित यह मंदिर आज आस्था और उम्मीद का बड़ा केंद्र बन चुका है.
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जालौर. राजस्थान के जालौर जिले की दुर्गम पहाड़ियों और स्वर्णागिरी की वादियों में स्थित ‘पनिया नाडा मंदिर’ आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन चुका है. यह स्थान न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि नाथ संप्रदाय की तपोभूमि के रूप में भी इसकी विशेष पहचान है. यहाँ की हर चट्टान और रास्ता किसी न किसी चमत्कारिक कहानी से जुड़ा हुआ है, जो वर्षों से भक्तों को अपनी ओर खींच रहा है. इस धाम की स्थापना की कहानी एक साधारण भक्त की निस्वार्थ भक्ति और अलौकिक आदेश से जुड़ी है.
इस मंदिर की स्थापना का श्रेय देवासी समाज के करणा राम को जाता है. स्थानीय जानकारों के अनुसार, करणा राम कभी इन पहाड़ियों में अपनी भेड़-बकरियां चराया करते थे. इसी दौरान उनके जीवन में एक आध्यात्मिक मोड़ आया. मान्यता है कि नाथ संप्रदाय के महान संत रूपनाथ जी महाराज ने करणा राम को सपने में दर्शन दिए और इस निर्जन स्थान पर अपने धाम की स्थापना करने का आदेश दिया. अपने गुरु के आदेश को शिरोधार्य करते हुए करणा राम ने यहाँ भक्ति और तपस्या शुरू की, जिससे यह स्थान धीरे-धीरे एक बड़े धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो गया.
फेरी लगाने से बीमारियां होने का दावापनिया नाडा मंदिर के प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा का सबसे बड़ा कारण यहाँ होने वाले चमत्कारिक सुधार हैं. स्थानीय भक्तों का अटूट विश्वास है कि जो भी व्यक्ति यहाँ सच्चे मन से आता है और मंदिर की फेरी लगाता है, उसे शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है. स्थानीय निवासी बताते हैं कि कई ऐसे रोगी जिन्हें दवाइयों से लाभ नहीं मिल रहा था, वे यहाँ फेरी लगाकर पूरी तरह स्वस्थ हुए हैं. मंदिर के विस्तार में नाथ संप्रदाय के पीर 1008 श्री शांतिनाथ जी महाराज का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने इस पवित्र कार्य के लिए भूमि उपलब्ध करवाई.
धार्मिक आयोजन और परंपराएंहर महीने शुक्ल पक्ष की दूज (द्वितीया) को यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें राजस्थान ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु पहुँचते हैं. मेले से पूर्व एकम की रात को भव्य भजन संध्या और जागरण का आयोजन किया जाता है, जहाँ भक्त भक्ति रस में सराबोर होते हैं. अगले दिन दूज पर विशेष पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद के रूप में पारंपरिक ‘दाल-बाटी चूरमा’ वितरित किया जाता है. शांति और सुकून की तलाश में आने वाले लोगों के लिए यह पहाड़ी धाम अब एक अनिवार्य पड़ाव बन गया है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
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Location :
Jalor,Jalor,Rajasthan
First Published :
April 26, 2026, 06:30 IST



