भीषण गर्मी, अनोखी परंपरा… एक दिन नहीं जलता घर का चूल्हा, खेतों में बनता है पूरे गांव का भोजन

Last Updated:April 29, 2026, 16:54 IST
Dhaulpur News: धौलपुर के लुहारी गांव में भीषण गर्मी के बावजूद एक दिन अनोखी परंपरा निभाई जाती है. इस दिन पूरे गांव के लोग खेतों में इकट्ठा होते हैं और वहीं चूल्हा बनाकर भोजन तैयार करते हैं. सभी परिवार मिलकर इसे प्रसादी के रूप में ग्रहण करते हैं. खास बात यह है कि इस दिन गांव के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता.
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धौलपुर. धौलपुर जिले के लुहारी गांव में वैशाख माह के अंतिम सोमवार को एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है. भीषण गर्मी के बीच, जब तापमान 40 डिग्री से ऊपर पहुंच जाता है, तब भी पूरा गांव अपने-अपने घरों से निकलकर खेतों में एकत्र होता है. इस दिन गांव के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता. सभी परिवार खेतों में ही अपने-अपने चूल्हे बनाते हैं और दाल, रोटी, सब्जी व खीर तैयार करते हैं. इसके बाद पूरा परिवार एक साथ बैठकर प्रसादी के रूप में भोजन ग्रहण करता है.
सदियों पुरानी आस्था से जुड़ी परंपराग्रामीण रामावतार शर्मा बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत करीब 1100 साल पहले मानी जाती है. यह परंपरा गहरी आस्था और मान्यता से जुड़ी हुई है. लोगों का विश्वास है कि इस दिन सामूहिक रूप से खेतों में भोजन बनाने और खाने से गांव पर आने वाली प्राकृतिक आपदाएं, बीमारियां और अन्य संकट टल जाते हैं. यही वजह है कि हर साल इस परंपरा को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाया जाता है.
संत रामपुरी बाबा से जुड़ी मान्यताग्रामीणों के अनुसार, संत रामपुरी बाबा ने यहां तपस्या की थी और उन्होंने ही लोगों को यह संदेश दिया था कि साल में एक दिन घरों से बाहर खेतों में भोजन बनाकर खाएं और जरूरतमंदों को भी खिलाएं. तभी से यह परंपरा लगातार जारी है. इस दिन सबसे पहले रामपुरी बाबा को भोग लगाया जाता है, उसके बाद सभी लोग प्रसादी ग्रहण करते हैं. यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे का भी प्रतीक है.
सामूहिकता और एकता की मिसालगांव में सभी जाति और धर्म के लोग, चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, इस परंपरा को मिलकर निभाते हैं. इससे आपसी सहयोग और प्रेम की भावना मजबूत होती है. इस परंपरा का महत्व इतना अधिक है कि यदि किसी घर में शादी-ब्याह जैसा कार्यक्रम भी हो, तो पहले परिवार इस परंपरा को निभाता है. जो लोग गांव से बाहर रहते हैं, वे भी इस दिन लौटने की कोशिश करते हैं. अगर कोई नहीं आ पाता, तो गांव के लोग उनके लिए प्रसादी पहुंचाते हैं.
आज भी बरकरार है परंपरा का प्रभावकोरोना काल में भी इस परंपरा ने लोगों का मनोबल बनाए रखा. गांव में कुछ लोग बीमार जरूर हुए, लेकिन सभी स्वस्थ हो गए, जिससे लोगों का विश्वास और मजबूत हुआ. रामावतार शर्मा के अनुसार, करीब 1100 साल पहले कसाना वंश के लोहा गुर्जर ने इस गांव को बसाया था, जिससे इसका नाम ‘लोहारी’ पड़ा, जो समय के साथ बदलकर ‘लुहारी’ हो गया. हालांकि सरकारी दस्तावेजों में आज भी इसका नाम लोहारी ही दर्ज है. यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और एकता का संदेश देती है.
About the AuthorAnand Pandey
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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Location :
Dhaulpur,Dhaulpur,Rajasthan
First Published :
April 29, 2026, 16:42 IST



