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साउथ अफ्रीका के पास थे 6-6 परमाणु बम, फिर कैसे चली गई इतनी बड़ी ताकत? आज पछतावा तो जरूर होता होगा

साल 1989 की एक सर्द रात थी. दक्षिण अफ्रीका के एक बेहद सुरक्षित और गुप्त सैन्य ठिकाने पेलिंडाबा में कुछ ऐसा होने जा रहा था जिसकी कल्पना आधुनिक इतिहास में किसी ने नहीं की थी. वहां कतार में रखे थे 6 घातक परमाणु बम. वो ताकत जो पलक झपकते ही किसी भी शहर को राख के ढेर में बदल सकती थी. लेकिन तभी राष्ट्रपति एफ.डब्ल्यू. डी क्लर्क का एक आदेश आता है और दुनिया के रक्षा विशेषज्ञ सन्न रह जाते हैं. आदेश था इन सबको अभी और इसी वक्त नष्ट कर दो.

एक ऐसा मुल्क जिसने चोरी-छिपे दुनिया की नजरों से बचकर और दशकों की मेहनत से परमाणु संपन्न होने का गौरव हासिल किया हो, वह अचानक अपनी सबसे बड़ी सुरक्षा दीवार को खुद ही ढहाने पर उतारू हो जाए. यह न तो किसी युद्ध की हार थी और न ही किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का दबाव; यह थी एक ऐसी ‘पॉलिटिकल चाल’ जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया. दक्षिण अफ्रीका ने आखिर ऐसा क्यों किया? क्या उसे अपनी ही आने वाली सरकार (नेल्सन मंडेला) पर भरोसा नहीं था या फिर इसके पीछे वाइट हाउस की कोई गुप्त स्क्रिप्ट थी? परमाणु शक्ति से शून्य तक के इस सफर की कहानी किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है. आइए इस पूरे घटनाक्रम को समझते हैं.

परमाणु शक्ति बनने का सफर: क्यों और कैसे?दक्षिण अफ्रीका ने 1970 के दशक में अपने परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत की थी. इसके पीछे मुख्य रूप से तीन कारण थे:

· अकेलेपन का डर: उस समय दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति लागू थी, जिसके कारण दुनिया के अधिकांश देशों ने उसका बहिष्कार कर दिया था.

· कम्युनिज्म का खतरा: सोवियत संघ समर्थित क्यूबा के सैनिक पड़ोसी देश अंगोला में मौजूद थे. दक्षिण अफ्रीका को डर था कि उसे चारों तरफ से घेरा जा रहा है.

· सुरक्षा की गारंटी: तत्कालीन सरकार चाहती थी कि अगर देश पर बड़ा संकट आए तो परमाणु हथियार होने से अमेरिका या पश्चिमी देश उसकी मदद को मजबूर हो जाएंगे.

कैसे बनाया परमाणु बम?दक्षिण अफ्रीका के पास यूरेनियम का विशाल भंडार था. उन्होंने इज़राइल के साथ तकनीकी सहयोग और अपनी एयरोडायनेमिक नोजल तकनीक का इस्तेमाल कर यूरेनियम को समृद्ध  किया. प्रिटोरिया के पास पेलिंडाबा नाम की जगह पर बेहद गुप्त तरीके से 6 परमाणु बम तैयार किए गए और सातवां निर्माणाधीन था.

अचानक परमाणु त्याग का फैसला1989 में जब एफ. डब्ल्यू. डी क्लर्क राष्ट्रपति बने तो उन्होंने परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला लिया. इसकी मुख्य वजहें ये थीं:

1. बदलती जियोपॉलिटिक्स: 1989 तक बर्लिन की दीवार गिर चुकी थी और शीत युद्ध खत्म हो रहा था. अंगोला से क्यूबा के सैनिक वापस जा रहे थे, जिससे दक्षिण अफ्रीका पर मंडरा रहा बाहरी खतरा टल गया.

2. सत्ता हस्तांतरण का डर: यह सबसे महत्वपूर्ण और गहरा पहलू है. डी क्लर्क जानते थे कि अब रंगभेद खत्म होने वाला है और सत्ता नेल्सन मंडेला और उनकी पार्टी ANC (African National Congress) के हाथों में जाएगी. गोरी सरकार नहीं चाहती थी कि एक अश्वेत सरकार के पास परमाणु बम जैसा विनाशकारी हथियार हो.

3. अंतरराष्ट्रीय वापसी: दक्षिण अफ्रीका अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करना चाहता था. परमाणु हथियार नष्ट करना दुनिया को यह दिखाने का जरिया था कि देश अब लोकतंत्र और शांति की राह पर है.

कैसे छिनी यह ताकत?यह छिनना नहीं बल्कि स्वेच्छा से विसर्जन था. 1990 में मंडेला की रिहाई से ठीक पहले डी क्लर्क ने परमाणु हथियारों को नष्ट करने का आदेश दिया.

· गोपनीयता और पारदर्शिता: 1991 में दक्षिण अफ्रीका ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद IAEA (इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी) के निरीक्षकों को बुलाया गया.

· पूरी तरह सफाया: 1993 तक दक्षिण अफ्रीका ने साबित कर दिया कि उसने अपने सभी 6 बमों को पिघला दिया है और उनके ब्लूप्रिंट्स भी जला दिए हैं.

एक अनोखी मिसालदक्षिण अफ्रीका का यह कदम इतिहास में परमाणु निरस्त्रीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है. जहां आज के दौर में उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देश परमाणु शक्ति बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, वहीं दक्षिण अफ्रीका ने अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु बम के बजाय लोकतंत्र और डिप्लोमेसी को चुनना बेहतर समझा. आज दक्षिण अफ्रीका परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग तो करता है लेकिन वह एक परमाणु हथियार मुक्त राष्ट्र है. यह बताता है कि हथियार केवल सुरक्षा नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारी बोझ भी बन सकते हैं.

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