Vietnam War: 51 साल बाद भी गूंज रही है वियतनाम युद्ध की चीखें छलनी हुई एक देश की आत्मा बंदूकें थकीं तो संगीत ने लड़ी जंग

Last Updated:April 30, 2026, 17:37 IST
Vietnam War: वियतनाम युद्ध (1955-1975) ने वैश्विक राजनीति, समाज और संस्कृति को जड़ से हिला दिया. इस युद्ध ने कला, साहित्य और मीडिया के नैरेटिव को बदलकर रख दिया और युद्ध के मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों, जैसे PTSD, को पहचान दिलाई. इसने अमेरिका की अपराजेयता के मिथक को तोड़ते हुए वैश्विक कूटनीति और पर्यावरण चेतना के नए युग की शुरुआत की.
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वियतनाम युद्ध ने दुनिया को हिला दिया.
तारीख थी 30 अप्रैल, 1975. सायगॉन से जब आखिरी अमेरिकी विमान ने उड़ान भरी, तो वह सिर्फ एक युद्ध का अंत नहीं था. वह एक ऐसे दौर की शुरुआत थी जिसने आने वाली पीढ़ियों के सोचने का तरीका बदल दिया. लगभग दो दशकों तक चला यह संघर्ष 20वीं सदी के सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक रहा है. इसने न केवल देशों के राजनीतिक नक्शे बदले, बल्कि कला, संगीत, चिकित्सा और समाज की रूह तक को प्रभावित किया. आज 51 साल बाद भी वियतनाम युद्ध की गूंज दुनिया के हर कोने में सुनाई देती है.
कला और साहित्य में सम्मान की जगह सदमा कैसे आया?
वियतनाम युद्ध से पहले युद्ध की कहानियों में वीरता और देशभक्ति का गुणगान होता था. लेकिन इस युद्ध ने कलाकारों और लेखकों को सोचने पर मजबूर कर दिया. पारंपरिक पेंटिंग और मूर्तिकला इस युद्ध की विभीषिका को दिखाने में नाकाम रहीं. इसके बाद परफॉर्मेंस आर्ट और वीडियो इंस्टॉलेशन जैसे नए प्रयोग सामने आए. किम जोन्स का ‘मडमैन स्ट्रक्चर’ इसका बड़ा उदाहरण है, जो युद्ध के बाद के मानसिक बिखराव को दर्शाता है.
साहित्य के क्षेत्र में भी ‘द थिंग्स दे कैरीड’ और ‘द सॉरो ऑफ वॉर’ जैसी किताबों ने नई राह दिखाई. टिम ओ’ब्रायन ने सैनिकों के मानसिक बोझ को शब्दों में पिरोया, तो बाओ निन्ह ने उत्तर वियतनाम के नजरिए से नुकसान और यादों की दास्तां बयां की. अब कहानियों में सम्मान नहीं, बल्कि नैतिक दुविधा और ट्रॉमा मुख्य विषय बन गए थे.
क्या संगीत ने युद्ध के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बनाया?
वियतनाम युद्ध के दौरान संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि विरोध का सबसे प्रभावी जरिया बन गया था. रॉक और लोक संगीत ने शांति की मांग को तेज किया. जॉन लेनन का ‘गिव पीस ए चांस’ युद्ध विरोधी आंदोलन का राष्ट्रगान बन गया. अमेरिकी सड़कों पर प्रदर्शन करते युवा इस गाने के जरिए शांति की गुहार लगा रहे थे. इसी तरह क्रीडेंस क्लियरवॉटर रिवाइवल का ‘फॉर्च्युनेट सन’ उन लोगों की आवाज बना, जो अमीरों और ताकतवर लोगों के स्वार्थ के लिए युद्ध में झोंके जा रहे थे. इन गानों ने समाज में एक ऐसी लहर पैदा की, जिसने सरकारों के लिए युद्ध को जारी रखना मुश्किल कर दिया.
मानसिक स्वास्थ्य: PTSD की पहचान वियतनाम से कैसे जुड़ी?
वियतनाम युद्ध से पहले युद्ध के मानसिक जख्मों को कमजोरी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता था. लेकिन इस युद्ध ने दुनिया को यह समझने पर मजबूर किया कि गोलियां शरीर के साथ-साथ दिमाग को भी छलनी करती हैं. 1972 में मनोचिकित्सक चैम एफ शतान ने ‘पोस्ट-वियतनाम सिंड्रोम’ शब्द का इस्तेमाल किया. यही शब्द आगे चलकर पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) के रूप में जाना गया. 1980 में इसे औपचारिक रूप से मान्यता मिली. इसके बाद से समाज का नजरिया बदला और न केवल सैनिकों, बल्कि हिंसा या आपदा से प्रभावित आम नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया जाने लगा.
मीडिया और सरकारी दावों के बीच विरोधाभास क्यों बढ़ा?
वियतनाम को दुनिया का पहला ‘टेलीविजन वॉर’ कहा जाता है. पहली बार युद्ध की नृशंसता सीधे लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुंच रही थी. जब लोगों ने टीवी पर खून-खराबा और लाशें देखीं, तो अमेरिकी सरकार के ‘जीत’ वाले दावों पर से उनका भरोसा उठ गया. फोटो जर्नलिस्ट निक उट की ‘नापाम गर्ल’ वाली तस्वीर ने दुनिया को हिला कर रख दिया. इस फोटो ने युद्ध के प्रति सार्वजनिक संवेदना को पूरी तरह बदल दिया. इसने मीडिया के काम करने के तरीके को भी प्रभावित किया. अब पत्रकार सरकारी बयानों के बजाय जमीनी हकीकत और मानवीय संवेदनाओं पर ज्यादा जोर देने लगे.
कूटनीति और पर्यावरण पर इस युद्ध का क्या असर रहा?
वियतनाम में मिली नाकामी ने अमेरिका को अपनी वैश्विक रणनीति बदलने पर मजबूर किया. अब सीधी सैन्य दखलंदाजी के बजाय प्रॉक्सी वॉर और कूटनीति को प्राथमिकता दी जाने लगी. इससे अमेरिका-सोवियत तनाव में कमी आई और चीन के साथ रिश्तों में सुधार की राह खुली. पर्यावरण के लिहाज से भी यह युद्ध बेहद विनाशकारी रहा.
अमेरिकी सेना द्वारा इस्तेमाल किए गए ‘एजेंट ऑरेंज’ जैसे रसायनों ने वियतनाम के जंगलों और पानी को जहरीला बना दिया. इसका असर आज भी वहां की मिट्टी और लोगों की सेहत पर दिख रहा है. इसी तबाही ने आधुनिक पर्यावरण आंदोलन को जन्म दिया, जिसने युद्ध में प्रकृति के नुकसान को मानवाधिकारों से जोड़कर देखा.
About the AuthorPrateeti Pandey
में इंटरनेशनल डेस्क पर कार्यरत हैं. टीवी पत्रकारिता का भी अनुभव है और इससे पहले Zee Media Ltd. में कार्य किया. डिजिटल वीडियो प्रोडक्शन की जानकारी है. टीवी पत्रकारिता के दौरान कला-साहित्य के साथ-साथ अंतरर…और पढ़ें
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First Published :
April 30, 2026, 17:37 IST



