धौलपुर की पुरानी परंपरा छप्पर उठाना

Last Updated:May 01, 2026, 09:11 IST
Dholpur Fading Tradition of Thatched Roofs: धौलपुर के गांवों में छप्पर उठाने की सामूहिक परंपरा अब विलुप्त होने के कगार पर है. पहले छप्पर डालने के लिए पूरे गांव को निमंत्रण दिया जाता था और लोग मिलकर भारी छप्पर को दीवारों पर रखते थे, जिसके बाद गुड़ बांटा जाता था. ये प्राकृतिक छप्पर गर्मियों में घरों को ठंडा रखते थे. अब पक्के मकानों और सीमेंट की छतों के बढ़ते चलन के कारण गांव की यह पुरानी संस्कृति और आपसी सहयोग की भावना अब केवल यादों का हिस्सा बनती जा रही है.
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Dholpur Fading Tradition of Thatched Roofs: राजस्थान के धौलपुर जिले के गांवों में कभी छप्पर डालने की प्रक्रिया केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्सव हुआ करती थी. पहले लोग अपने घरों में पक्की छत की बजाय घास-फूस और लकड़ी से बने छप्पर डालते थे. यह काम अकेले करना असंभव था, इसलिए जब किसी के घर छप्पर डालना होता, तो पूरे गांव को निमंत्रण दिया जाता था. इसके बाद बुजुर्ग, युवा और बच्चे सभी मिलकर इस काम में जुट जाते थे. छप्पर उठाने और दीवारों पर रखने का काम काफी मेहनत वाला होता था, लेकिन गांव के लोग मिलकर इसे आसानी से पूरा कर लेते थे. यह परंपरा आपसी एकता, सहयोग और भाईचारे का प्रतीक मानी जाती थी.
ग्रामीण विशंभर दयाल शर्मा बताते हैं कि करीब 15 साल पहले तक गांवों में ज्यादातर घरों पर छप्पर ही डाले जाते थे. ये छप्पर गोबर से बनी दीवारों पर रखे जाते थे, जो गर्मियों में घर को ठंडा रखने में मदद करते थे. उस समय गांवों में एसी और कूलर जैसी सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए छप्पर ही लोगों को तेज गर्मी और लू से बचाते थे. छप्पर और झोपड़ी बनाने में पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री का उपयोग होता था, जो गांवों में आसानी से मिल जाती थी और कम खर्च में तैयार हो जाती थी. इनकी खासियत यह थी कि ये अंदर से हमेशा ठंडी रहती थीं. जब तेज गर्म हवाएं चलती थीं, तो घास-फूस की मोटी परत उन्हें अंदर आने से रोक देती थी, जिससे अंदर का तापमान कम बना रहता था.
परंपरा और आधुनिकता का टकरावआज समय बदल चुका है और गांवों की तस्वीर भी बदल गई है. अब गांवों में पक्के मकान, सीमेंट और कंक्रीट की छतें बनने लगी हैं. इसी वजह से छप्पर बनाने की परंपरा लगभग खत्म होती जा रही है. आधुनिकता के इस दौर में जहां सुविधाएं बढ़ी हैं, वहीं पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे खोती जा रही हैं. काम पूरा होने के बाद गांव में गुड़ बांटकर खुशी मनाई जाती थी, वह मिठास अब केवल बुजुर्गों की यादों तक सीमित रह गई है.
यादों में सिमटी ग्रामीण संस्कृतिहालांकि आज भी कुछ खेतों, खलिहानों और गांव के नुक्कड़ों पर छप्पर या झोपड़ियां देखने को मिल जाती हैं, जहां किसान आराम करते नजर आते हैं. लेकिन सामूहिक रूप से छप्पर उठाने का वह उत्साह और एकता अब दुर्लभ हो गई है. छप्पर केवल एक छत नहीं था, बल्कि गांव की एकता और परंपरा का प्रतीक भी था, जिसे अब यादों में ही देखा जा रहा है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
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Dhaulpur,Dhaulpur,Rajasthan



