मक्के की फसल में सूख रहा है रेशा, तो कृषि वैज्ञानिक से जानिए सही बचाव का तरीका वरना लापरवाही पड़ जाएगी भारी

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मक्के की फसल में रेशा सूख रहा है, तो कृषि वैज्ञानिक से जानिए सही बचाव का तरीका
Last Updated:June 17, 2026, 06:13 IST
मक्के के भुट्टों से निकलने वाला रेशा (सिल्क) दानों के विकास में अहम भूमिका निभाता है. यदि यह समय से पहले सूख जाए तो परागण प्रभावित होता है और भुट्टों में दाने कम बनते हैं. कृषि वैज्ञानिक डॉ. सी.के. त्रिपाठी ने बताया कि नमी की कमी, तेज गर्मी, पोषक तत्वों का अभाव, कीट और रोग इसके प्रमुख कारण हैं. जानिए मक्के के रेशे को सूखने से बचाने और बेहतर पैदावार पाने के प्रभावी उपाय.
कृषि विज्ञान केंद्र सुलतानपुर में कार्यरत कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर सी के त्रिपाठी लोकल 18 से बताते हैं कि मक्के के भुट्टों से निकलने वाला रेशा जिसे सिल्क भी कहा जाता है ये परागण में आवश्यक होते हैं. जब ये रेशे समय से पहले सूखने लगते हैं तो मक्के टे दानों का विकास पर गलत प्रभाव पड़ता है. जिसकी वजह से भुट्टों में दाने कम बनते हैं या फिर कई स्थान खाली रह जाते हैं.
मक्के में रेशा सूखने का सबसे साधारण कारण यह है कि खेत में नमी की कमी रहती है. भुट्टा बनने और रेशे निकलने के समय पौधों को पर्याप्त पानी चाहिए होता है. अगर इस समय सूखा पड़ जाए या सिंचाई समय पर न हो पाए तो रेशे जल्दी सूख जाते हैं. इससे परागण बनने में समस्या आती है और दाना नहीं बन पाता हैं. इसलिए खेत में उचित नमी बनाए रखने के लिए नियमित सिंचाई करना चाहिए.
मक्के के रेशे पर तापमान का भी काफी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि जब तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस और उससे अधिक हो जाता है, तो मक्के के रेशों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है. तेज धूप और गर्म हवाओं की वजह से रेशा जल्दी सुख जाता है. ऐसी स्थिति में परागण का समय कम हो जाती है और दाने बनने में समस्या आती है. इसलिए गर्मी के मौसम में फसल को पर्याप्त पानी देना जरूरी है. सुबह और शाम के समय सिंचाई करने से पौधों को राहत मिलती है और रेशों की नमी लंबे समय तक बनी रहती है.
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डॉक्टर सी के त्रिपाठी आगे बताते हैं कि मक्के में जिंक, बोरॉन और पोटाश जैसे पोषक तत्वों की कमी होने पर भी रेशे कमजोर हो जाते हैं और जल्दी सूख सकते हैं. यही वजह है कि संतुलित पोषण नहीं मिलने पर पौधों का विकास प्रभावित होने लगता है और भुट्टे अच्छी तरह विकसित नहीं हो पाते हैं . इसलिए मिट्टी का परीक्षण जश्रूर कराना चाहिए इसी आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए. जिंक सल्फेट और बोरॉन की सही मात्रा देने से पौधों की वृद्धि सही होती है. इसके साथ ही पोटाश का इस्तेमाल पौधों को तनाव सहन करने की क्षमता प्रदान करता है.
मक्के में कई तरह के कीट भी लगते हैं जैसे फॉल आर्मीवर्म, भुट्टा छेदक और अन्य रस चूसने वाले कीट. ये मक्के के पौधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. क्योंकि कुछ कीट भुट्टों और रेशों पर हमला कर उन्हें सुखा देते हैं. इससे परागण और दाना बनने में काफी समस्या आती है. इसलिए आवश्यक है कि खेत की नियमित निगरानी करते रहें. जब भी जरूरत पड़े कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए.
इससे कई फफूंदजनित और जीवाणुजनित रोग भी रेशों के सूखने का कारण बन सकते हैं. पौधों में संक्रमण होने पर भुट्टों का विकास रुक जाता है और रेशे भूरे होकर सूखने लगते हैं. रोगग्रस्त पौधों में पत्तियों पर धब्बे, सड़न या मुरझाने के लक्षण भी दिखाई देते हैं. रोग नियंत्रण के लिए सभी बीज का इस्तेमाल करना चाहिए और खेत में जलनिकासी का प्रबंध जरूर करें.
मक्के में रेशों का मुख्य कार्य पराग को ग्रहण करना होता है. अगर तेज वर्षा, गर्म हवा और असामान्य मौसम की वजह से परागण प्रभावित हो जाए तो रेशे बिना निषेचन के ही सूख जाता हैं. ऐसे भुट्टों में दानों की संख्या कम हो जाती है. इसलिए फसल की बुवाई सही समय पर करनी चाहिए जिससे फूल और रेशे निकलने की अवस्था अधिक गर्मी और प्रतिकूल मौसम में न आए. सही समय पर बोई गई फसल में परागण की सफलता अधिक रहती है.
कृषि वैज्ञानिक ने आगे बताया कि मक्के में रेशों के सूखने की समस्या से बचाव के लिए संतुलित उर्वरक का प्रबंधन, नियमित तरीके से सिंचाई, कीट और रोग का नियंत्रण और समय पर बुवाई करना आवश्यक है. जब रेशे निकल रहे हों तो ऐसी अवस्था में खेत में नमी की कमी बिल्कुल नहीं होने देना चाहिए. जिंक, बोरॉन और पोटाश का संतुलित प्रयोग करना चाहिए. खेत की लगातार निगरानी कर कीट और रोग के शुरुआती लक्षण पहचानना आवश्यक है.


